80 किलो सोना और 750 किलो का हौदा लेकर जब निकला 54 साल का 'प्रशांत', मैसूर के शाही दशहरे को देखने उमड़ा जनसैलाब
कर्नाटक के मैसूर में मनाया जाने वाले दशहरा उत्सव की देश-दुनिया में धूम रहती है. इस बार भी शहर में इस उत्सव को देखने के लिए हजारों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा.
उत्तर भारत में तो रामलीलाओ और दशहरा दहन के प्रति लोगों की दीवानगी है ही, दक्षिण भारत भी इस मामले में पीछे नहीं है. खासकर अगर बात कर्नाटक के मैसूर की हो तो. इस शहर में मनाया जाने वाला दशहरा पर्व की देशभर में धूम रहती है, जिसे देखने के लिए हजारों लोग इस शहर में उमड़ते हैं. इस बार भी दशहरे में 54 साल के हाथी प्रशांत ने जुलूस की अगुवाई की. खास बात ये है कि इस बार यह हाथी 750 किलोग्राम वजनी सोने का हौदा लेकर चला. कहा जा रहा है कि हौदे की लकड़ी के भीतर का हिस्सा 80 किलो सोने से ढका हुआ था. इसके बाद प्रशांत के नेतृत्व में शहर में 'जंबू सवारी' जुलूस निकला, जिससे पूरे शहर का माहौल उत्सवमय हो गया.
'प्रशांत' के नेतृत्व में मना दशहरा उत्सव
रिपोर्ट के मुताबिक, यह हाथी मैसूर शहर की आराध्य देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति को हौदे में विराजमान करके चला. उसके साथ सजे-धजे हाथियों का एक अन्य दल भी था. हाथियों के इस काफिले ने अंबा विलास पैलेस से बन्लीमंतपा तक करीब 5 किमी लंबे रूट पर मार्च किया. इस दौरान सड़क के दोनों ओर हजारों लोगों इस भव्य नजारे का दीदार किया.
सेना की तीनों टुकड़ियों ने भी किया मार्च
'प्रशांत' के साथ ही 'धनुष' नाम के हाथी को रिजर्व में रखा गया है. जबकि, 'अभिमन्यु' निशान हाथी के रूप में आगे-आगे एस्कार्ट करता हुआ चलेगा. 'प्रशांत' के साथ 'कावेरी', 'रूपा' और 'कुमकी' नामक हथिनियां भी थीं. इस जुलूस में कर्नाटक के सांस्कृतिक दल भी साथ रहे, जिन्होंने वहां की क्षेत्रीय परंपराओं और विरासत को प्रदर्शित किया. देश की तीनों सेनाओं की टुकड़ियों ने भी मार्च करके इस भव्य उत्सव को यादगार बना दिया.
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क्राउड कंट्रोल के लिए पुलिस ने की मशक्कत
इस भव्य उत्सव को देखने के लिए हजारों लोग उमड़े, जिन्हें कंट्रोल करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी. जुलूस रवाना होने से मैसूर के वाडियार राजपरिवार ने हथियारों, वाहनों और जानवरों की पूजा की. इसके साथ ही राजमहल को भी भव्य तरीके से सजाया गया. इसके बाद सीएम डी. के. शिवकुमार ने तिलक लगाकर और हाथियों को गुड़ खिलाकर इस जुलूस की शुरुआत की. उत्सव के दौरान रास्ते में ड्रोन शो भी किया गया, जिसने आसमान में तरह-तरह की आकृतियां बनाईं.
आज से करीब 400 साल पहले हुई थी शुरुआत
बताते चलें कि मैसूर के राजा वाडियार प्रथम ने 1610 में इस उत्सव की शुरुआत की थी. इसके बाद उनके वंश के शासक हाथी के हौदे पर बैठकर दशहरा के अवसर पर शहर में निकलते थे. श्री जयचामराजेंद्र वाडियार हौदे पर सवारी करने वाले मैसूर के अंतिम शासक थे. हालांकि, वक्त के साथ धीरे-धीरे यह परंपरा बदल दी गई है और राजपरिवार के बजाय चामुंडेश्वरी मां की प्रतिमा को हाथी के हौदे पर बिठाया जाता है.