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दो दशकों से जेल में बंद अंडरवर्ल्ड डॉन ओम प्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव को लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने बरी कर दिया. बबलू श्रीवास्तव को 20 साल पुराने अपहरण मामले 20 सालों से जेल में बंद था. ये मामला पश्चिम बंगाल के एक होटल व्यवसायी के अपहरण से जुड़ा हुआ है जिसमें बबलू श्रीवास्तव को आरोपी बनाया गया था. अब सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बबलू श्रीवास्तव को बरी किया. मौजूदा समय वो उत्तर प्रदेश की बरेली जेल में बंद है. यूपी के गाजीपुर जिले का रहने वाला वो युवक जो आईएएस बनने के ख्वाब सजाए हुए घर से निकला लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.
यूपी के गाजीपुर की मिट्टी ने कई सूरमा पैदा किए, लेकिन उनमें से एक ऐसा नाम भी निकला जिसने देश के अंडरवर्ल्ड की दुनिया में तहलका मचा दिया. एक मामूली परिवार में जन्मा ओमप्रकाश श्रीवास्तव, जिसे आज दुनिया 'बबलू श्रीवास्तव' के नाम से जानती है, कभी जुर्म की ऐसी बेताज बादशाहत चलाता था कि पाकिस्तान में बैठा खूंखार आतंकी हाफिज सईद भी उसके नाम से कांपता था. अंडरवर्ल्ड से लेकर सियासत के गलियारों तक अपनी गहरी पैठ रखने वाला यह कुख्यात डॉन एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर अपराध जगत के शिखर पर पहुंचने और फिर जेल तक की यह दास्तां हैरान करने वाली है.
ये उन दिनों की बात है जब बबलू श्रीवास्तव अपराध की दुनिया से कोसों दूर था. कॉलेज के दिनों में एक रामलीला के मंच पर उसकी नजर 'सीता' का किरदार निभा रही एक खूबसूरत लड़की पर पड़ी. पहली ही नजर में बबलू अपना दिल उस पर हार बैठा. यह मोहब्बत ऐसी परवान चढ़ी कि उसने उस लड़की को अपनी जिंदगी मान लिया. लेकिन, कहते हैं ना कि हर खूबसूरत कहानी का अंत सुखद नहीं होता. प्यार की तलाश में निकला एक आशिक कब जुर्म के अंधेरे समंदर में डूब गया, उसे खुद पता नहीं चला. यह कहानी सिर्फ एक डॉन के बनने की नहीं है, बल्कि उस अधूरी मोहब्बत और दर्द की दास्तां है, जिसने एक हंसते-खेलते युवक को अपराध के दलदल में हमेशा के लिए धकेल दिया.
बबलू श्रीवास्तव की इस खौफनाक दास्तान का एक और दिलचस्प और हैरान करने वाला मोड़ तब आया, जब उसकी जिंदगी में अर्चना शर्मा नाम की एक लड़की की एंट्री हुई. मध्य प्रदेश के उज्जैन की रहने वाली अर्चना के पिता एमपी पुलिस में हेड कांस्टेबल थे. पिता चाहते थे कि बेटी खूब पढ़े-लिखे और एक काबिल वकील बने, इसलिए उन्होंने अर्चना का एडमिशन भी लखनऊ यूनिवर्सिटी में ही कराया था.
लेकिन अर्चना की आंखों में तो मुंबई की फिल्मी दुनिया और बॉलीवुड की हीरोइन बनने के सुनहरे सपने पल रहे थे. वह अपनी पढ़ाई का आखिरी साल बीच में ही छोड़कर सीधे मुंबई आ गई. शुरुआती संघर्ष के बाद उसे एक फिल्म में छोटा सा रोल तो मिला, लेकिन उसके बाद काम मिलना पूरी तरह बंद हो गया. मुंबई की चकाचौंध और अमीर बनने की लालसा ने उसे धीरे-धीरे अपराध के रास्ते पर धकेल दिया.
दिसंबर 1993 में अर्चना एक म्यूजिक ग्रुप के साथ दुबई गई. वहां उसकी मुलाकात पीतांबरा मिगलानी नाम के एक बिजनेसमैन से हुई. दोनों में प्यार हुआ, सगाई हुई और साल 1995 में दोनों ने शादी कर ली. लेकिन जब अर्चना को यह सच पता चला कि पीतांबरा पहले से ही शादीशुदा है, तो उसने शातिर चाल चली. उसने चालाकी से पीतांबरा के बोरीवली वाले आलीशान मकान की 'पावर ऑफ अटॉर्नी' अपने नाम करवा ली और उससे अलग हो गई. इसके बाद अर्चना की मुलाकात दाऊद के शातिर गुर्गे इरफान गोगा से हुई. गोगा ने उसे इंदौर के मशहूर व्यापारी जगदीश मोतीरमवानी के अपहरण की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी. अर्चना ने इस किडनैपिंग को इतनी सफाई और चालाकी से अंजाम दिया कि अंडरवर्ल्ड की दुनिया में उसे 'किडनैपिंग क्वीन' कहा जाने लगा.
अपराध की दुनिया में काम करते-करते अर्चना को यह बात समझ आ गई कि इरफान गोगा तो महज एक छोटा मोहरा है, इस पूरे खेल का असली आका और मास्टरमाइंड कोई और नहीं बल्कि बबलू श्रीवास्तव है. साल 1997 में पहली बार अर्चना ने फोन पर बबलू की आवाज सुनी. दोनों के बीच फोन पर लंबी बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ और देखते ही देखते यह रिश्ता जुर्म और प्यार का एक ऐसा अनोखा संगम बन गया जिसकी चर्चा आज भी होती है.
बबलू के इशारे और प्लानिंग पर अर्चना ने देश के कई नामी-गिरामी उद्योगपतियों-जैसे गौतम अडानी, सतीश शेट्टी, सागर लखतक और रमाकांत दुबे के अपहरण की साजिशों में मुख्य भूमिका निभाई. कभी बचपन में रामलीला के मंच पर 'सीता' का पवित्र किरदार निभाने वाली वह सीधी-साधी लड़की अब जुर्म की दुनिया की पहली खूंखार 'लेडी डॉन' बन चुकी थी. पुलिस और एजेंसियों से अपनी पहचान छिपाने के लिए वह पप्पी शर्मा, महक, मनीषा, मीनाक्षी और सलमा जैसे दर्जनों फर्जी नामों का इस्तेमाल किया करती थी.
नेपाल के माफिया और पाकिस्तान के मददगार मिर्जा दिलशाद बेग की सनसनीखेज हत्या में भी बबलू का ही हाथ माना जाता है, जिसमें उसने अर्चना का ही इस्तेमाल किया था. हालांकि, कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं और आखिरकार वे बबलू तक पहुंच ही गए. साल 1995 में बबलू श्रीवास्तव को सिंगापुर से गिरफ्तार करके भारत लाया गया. तब से लेकर आज तक वह उत्तर प्रदेश की बरेली सेंट्रल जेल में ही बंद है.
दूसरी तरफ, बेहद शातिर और दिमाग की तेज मानी जाने वाली अर्चना शर्मा के खिलाफ भारत सहित दुनिया के 10 अलग-अलग देशों में रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया. लेकिन हैरानी और देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ा सवाल यह है कि पिछले 26 सालों से अर्चना शर्मा का आज तक कोई सुराग नहीं मिला है. पुलिस और खुफिया विभागों की फाइलों में वह आज भी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी मोस्ट वॉन्टेड अपराधी और एक रहस्यमयी फरार पहेली बनी हुई है.
बबलू श्रीवास्तव बचपन से ही पढ़ाई में काफी तेज और होशियार था. उसका शुरुआती और सबसे बड़ा सपना देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा पास कर एक आईएएस (IAS) अफसर बनने का था. घर-परिवार में भी पढ़ाई का माहौल था. हालांकि, कुछ समय बाद उसके बड़े भाई विकास श्रीवास्तव भारतीय सेना में कर्नल बन गए. भाई को फौजी की वर्दी में देश की सेवा करते देख बबलू की सोच बदल गई. उसने आईएएस का ख्याल दिल से निकाल दिया और ठान लिया कि वह भी सेना में जाकर देश की सेवा करेगा.
अपनी इसी तैयारी को आगे बढ़ाने के लिए बबलू ने घर छोड़ा और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का रुख किया. उसने लखनऊ यूनिवर्सिटी के लॉ कॉलेज में दाखिला ले लिया. बात साल 1982 की है. उन दिनों कॉलेज के छात्र संघ चुनाव का माहौल काफी गर्म हुआ करता था. बबलू के दोस्त नीरज जैन ने महामंत्री पद के लिए चुनाव में पर्चा भरा और बबलू पूरी शिद्दत और ताकत के साथ अपने दोस्त के प्रचार-प्रसार में जुट गया.
चुनाव प्रचार के दौरान एक दिन विरोधी गुट के साथ तीखी बहस हो गई. बात इतनी बढ़ गई कि देखते ही देखते चाकूबाजी शुरू हो गई. इस खूनी झड़प में एक छात्र बुरी तरह से घायल हो गया. किस्मत का खेल देखिए, वह घायल छात्र लखनऊ के उस दौर के सबसे खूंखार गैंगस्टर अरुण शंकर शुक्ला उर्फ 'अन्ना' का बेहद करीबी था. अन्ना ने अपने रसूख और प्रभाव का पूरा इस्तेमाल किया और बेकसूर बबलू को एक झूठे केस में फंसाकर जेल भिजवा दिया. यहीं से बबलू के कोमल मन में बदले की ऐसी आग सुलग उठी जिसने उसकी पूरी दुनिया ही बदल दी. जेल की सलाखों के पीछे से उसने जो रास्ता चुना, वह उसे अपराध के अंधेरे कुएं में धकेलता चला गया.
जेल से बाहर आने के बाद बबलू के दिल में सिर्फ बदला लेने की आग सुलग रही थी. उसकी मुलाकात अन्ना के सबसे बड़े दुश्मन और माफिया रामगोपाल मिश्र से हुई. बबलू फौरन उनके गैंग में शामिल हो गया. हालांकि, कुछ समय बाद जब अन्ना और रामगोपाल मिश्र के बीच आपसी सुलह हो गई, तो बबलू ने उनका साथ छोड़ दिया. अब बबलू ने किसी के अधीन काम करने के बजाय अपना खुद का गैंग खड़ा करने का फैसला किया. उसने उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र तक अपहरण (किडनैपिंग) और फिरौती वसूली का एक बहुत बड़ा जाल फैला दिया. देखते ही देखते वह जुर्म की दुनिया में 'किडनैपिंग किंग' के नाम से मशहूर हो गया.
पुलिस की लगातार दबिश और बढ़ते दबाव के कारण बबलू को भारत छोड़कर नेपाल भागना पड़ा. नेपाल में उसकी मुलाकात वहां के कुख्यात माफिया मिर्जा दिलशाद बेग से हुई. मिर्जा के ही जरिए साल 1992 में बबलू दुबई पहुंचा, जहां उसकी सीधी एंट्री अंडरवर्ल्ड के बेताज बादशाह दाऊद इब्राहिम की 'डी-कंपनी' में हो गई. दाऊद का हाथ मिलते ही बबलू की ताकत और रुतबा कई गुना बढ़ गया. उसने छोटे-मोटे अपहरण छोड़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियारों और ड्रग्स की तस्करी का बड़ा कारोबार शुरू कर दिया.
साल 1993 का वह काला दिन कौन भूल सकता है, जब मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को दहला दिया था. सैकड़ों बेकसूर लोगों की जान चली गई थी और इस खौफनाक साजिश का मास्टरमाइंड कोई और नहीं बल्कि दाऊद इब्राहिम निकला. देश पर हुए इस जघन्य हमले से बबलू श्रीवास्तव का खून खौल उठा. उसे इस बात से गहरी नफरत हुई कि देश के खिलाफ इतनी बड़ी साजिश रची गई है. उसने दाऊद से हमेशा के लिए अपने सारे रिश्ते तोड़ लिए और उससे अलग हो गया. यह वही दौर था जब छोटा राजन ने भी दाऊद से बगावत कर दी थी.
बबलू की दहशत का आलम यह था कि जेल के भीतर बंद रहने के बावजूद पाकिस्तान सरकार भी उसके नाम से थर-थर कांपती थी. बात साल 2021 की है, जब पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के सरगना और मोस्ट वॉन्टेड आतंकी हाफिज सईद के घर के बाहर एक भयानक धमाका हुआ था. इस हमले में 3 लोग मारे गए और 20 से ज्यादा घायल हुए थे. उस समय पाकिस्तान के तत्कालीन गृह मंत्री राणा सनाउल्लाह ने सरेआम बबलू श्रीवास्तव का नाम लिया था. उन्होंने सनसनीखेज आरोप लगाया था कि बरेली जेल में बंद बबलू असल में भारतीय खुफिया एजेंसी 'रॉ' (RAW) का फ्रंट मैन है और वहीं से टेरर फंडिंग का पूरा नेटवर्क चला रहा है.