Analysis: नशे पर सख्त हुए अमित शाह, क्या 2029 तक नशामुक्त हो पाएगा भारत?
अमित शाह का नशामुक्त भारत का आह्वान देश की युवा पीढ़ी, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक भविष्य से जुड़ी गंभीर चुनौतियों पर बात करता है. तस्करी पर सख्ती, राज्यों के बीच समन्वय, जागरूकता और पुनर्वास इस लड़ाई के अहम हिस्से हैं.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश भर के पुलिस बलों से मिलकर भारत को नशामुक्त बनाने का आह्वान किया है. पुलिस स्मृति दिवस के मौके पर उनका यह संदेश केवल एक सरकारी अपील नहीं बल्कि उस खतरे की ओर इशारा है जो धीरे-धीरे देश की युवा आबादी, परिवारों और राष्ट्रीय सुरक्षा को अपनी चपेट में ले रहा है.
असल में अमित शाह ने साफ कर दिया है कि 2026 के बचे हुए महीने, 2027, 2028 और 2029 नशे के खिलाफ एकजुट लड़ाई के साल होंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 दिसंबर 2029 तक देश से नशीले पदार्थों के खतरे को खत्म करने का लक्ष्य रखा है.
सवाल है कि आखिर गृह मंत्री को नशे के खिलाफ इतनी बड़ी मुहिम को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
क्या यह केवल युवाओं को नशे से बचाने की लड़ाई है या इसके पीछे कोई बड़ा सुरक्षा संकट भी है? क्या पुलिस की सख्ती से भारत को नशामुक्त बनाया जा सकता है?
नशा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल
नशे की समस्या को लंबे समय तक व्यक्तिगत आदत, सामाजिक बुराई या कुछ राज्यों तक सीमित संकट के तौर पर देखा जाता रहा लेकिन अब इसकी तस्वीर बदल चुकी है. नशे की तस्करी का नेटवर्क सीमाओं के पार फैला है.
इसके तार संगठित अपराध, अवैध कमाई और आतंकी गतिविधियों को मिलने वाली आर्थिक मदद से जुड़ सकते हैं. यही वजह है कि गृह मंत्री इसे केवल कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं रखना चाहते हैं.
नशीले पदार्थों की तस्करी का कारोबार उस अर्थव्यवस्था को जन्म देता है, जिसमें अपराधी नेटवर्क लगातार मजबूत होते हैं. इनका पैसा हथियारों, स्थानीय अपराध और दूसरे गैरकानूनी कामों में इस्तेमाल हो सकता है.
सीमावर्ती इलाकों में ड्रग्स की खेप पकड़ना इसलिए सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं है, बल्कि उस पूरे नेटवर्क को तोड़ने की कोशिश है जो देश की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है.
अमित शाह ने भी नशे को आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरा बताते हुए कहा है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ता है.
साथ ही राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल संगठनों को आर्थिक मदद मिलती है. यानी सरकार की चिंता के दो स्पष्ट पक्ष एक तरफ देश के युवाओं का भविष्य और दूसरी तरफ देश की सुरक्षा है.
समस्या कितनी बड़ी?
भारत में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की व्यापकता समझने के लिए उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण आधार 2018 में किया गया राष्ट्रीय सर्वेक्षण है जिसे सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने एम्स के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर के साथ कराया था.
दिसंबर 2024 में संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में 18 से 75 वर्ष की उम्र के करीब 2.9 करोड़ लोग भांग से जुड़े पदार्थों का इस्तेमाल करते थे, जबकि लगभग 1.9 करोड़ लोग ओपिओइड श्रेणी के पदार्थों के इस्तेमाल से जुड़े थे. इनमें हेरोइन और कुछ चिकित्सकीय दवाएं भी शामिल हैं.
बच्चों और किशोरों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है. 10 से 17 वर्ष की उम्र के करीब 40 लाख बच्चों-किशोरों के ओपिओइड इस्तेमाल से जुड़े होने का अनुमान था. लगभग 20 लाख इस आयु वर्ग के बच्चे भांग से जुड़े पदार्थों का इस्तेमाल कर रहे थे.
इसके अलावा, वयस्कों में करीब 1.1 करोड़ लोग सेडेटिव दवाएं और लगभग 60 लाख लोग नशीले प्रभाव वाले इनहेलेंट्स का इस्तेमाल करते थे. ये आंकड़े 2018 के सर्वेक्षण के अनुमान हैं. आज की वास्तविक संख्या नहीं है. फिर भी इनसे समस्या का पैमाना समझा जा सकता है.
तस्करी का नेटवर्क तोड़ना कठिन क्यों?
भारत की भौगोलिक स्थिति नशीले पदार्थों की तस्करी के खिलाफ लड़ाई को और कठिन बनाती है. देश की सीमाएं, समुद्री रास्ते, हवाई अड्डे, बंदरगाह और रेल नेटवर्क सभी तस्करी रोकने के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं.
सीमा पार से आने वाले मादक पदार्थों के अलावा देश के भीतर बनने वाले सिंथेटिक ड्रग्स और दवाओं के अवैध इस्तेमाल की चुनौती भी है.
तस्कर लगातार अपने तरीके बदलते हैं. पारंपरिक रास्तों के साथ-साथ तकनीक, डिजिटल संचार और बदलते परिवहन माध्यमों का इस्तेमाल भी जांच एजेंसियों के लिए नई मुश्किलें पैदा कर सकता है.
एक राज्य में पकड़ी गई खेप का संबंध दूसरे राज्य में बैठे सप्लायर और किसी तीसरे स्थान पर मौजूद आर्थिक नेटवर्क से हो सकता है. ऐसे में केवल उस व्यक्ति को पकड़ लेना, जिसके पास से नशीला पदार्थ बरामद हुआ है, पूरी कार्रवाई नहीं हो सकती है.
यही वजह है कि अमित शाह का देशभर की पुलिस को मिलकर काम करने का संदेश महत्वपूर्ण है. अगर एक राज्य की पुलिस के पास किसी तस्करी नेटवर्क की जानकारी है और दूसरे राज्य की एजेंसियों तक वह समय पर नहीं पहुंचती तो अपराधी इस तालमेल की कमी का फायदा उठा सकते हैं.
नशे के कारोबार की कोई राज्य सीमा नहीं होती, इसलिए उसके खिलाफ कार्रवाई भी अलग-अलग राज्यों के दायरों में बंटी नहीं रह सकती है.
सरकार की कार्ययोजना क्या है?
सरकार की रणनीति दो मोर्चों पर काम करने की है. इसमें नशे की आपूर्ति रोकना और इसकी मांग कम करना है. आपूर्ति रोकने के लिए नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, राज्य पुलिस, सीमा सुरक्षा बल और अन्य एजेंसियों के बीच समन्वय पर जोर दिया गया है.
केंद्र ने नार्को-कोऑर्डिनेशन सेंटर की चार-स्तरीय व्यवस्था बनाई है. राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स भी गठित की गई हैं.
बड़े मामलों में विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय, सीमावर्ती इलाकों में निगरानी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग इस रणनीति के अहम हिस्से हैं.
दूसरी तरफ, नशे की मांग कम करने के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय का राष्ट्रीय नशा मांग में कमी कार्ययोजना लागू है. इसके तहत नशा मुक्त भारत अभियान देश के सभी जिलों में चलाया जा रहा है.
मार्च 2025 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, इस अभियान के जरिए 14.79 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंचने का दावा किया गया था, जिनमें करीब 4.96 करोड़ युवा और 2.97 करोड़ महिलाएं शामिल थीं.
उसी समय सरकार 350 नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्रों को सहायता दे रही थी और सरकारी अस्पतालों में 142 नशा उपचार सुविधाएं स्थापित की गई थीं.
गिरफ्तारी के बाद क्या?
नशे के खिलाफ अभियान की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं होगी कि कितनी खेप पकड़ी गई या कितने लोगों को गिरफ्तार किया गया.
असली परीक्षा यह होगी कि नशे की उपलब्धता कितनी कम हुई, तस्करी के बड़े नेटवर्क कितने टूटे और नशे की गिरफ्त में फंसे कितने लोग सामान्य जीवन में लौट पाए.
यहां एक बुनियादी फर्क समझना जरूरी है. नशे का कारोबार चलाने वाले संगठित अपराधियों और नशे की लत से जूझ रहे लोगों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता.
तस्करों के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है लेकिन लत से जूझ रहे व्यक्ति को केवल अपराधी मान लेने से समस्या और गहरी हो सकती है. उसे इलाज, काउंसलिंग और परिवार के सहयोग की जरूरत होती है.
नशे से बाहर निकलने की प्रक्रिया आसान नहीं होती. कई मामलों में इलाज के बाद दोबारा नशे की ओर लौटने का खतरा रहता है. छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में प्रशिक्षित विशेषज्ञों, उपचार केंद्रों और काउंसलिंग की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती है.
सामाजिक बदनामी के डर से परिवार अक्सर समस्या को छिपाते हैं. ऐसे में जागरूकता अभियान तभी असरदार होगा, जब उसके साथ भरोसेमंद और सुलभ उपचार व्यवस्था भी मौजूद हो.
दूसरी चुनौती सरकारी मशीनरी के बीच तालमेल की है. केंद्र और राज्य की एजेंसियों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर काम करना होगा.
पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा संस्थान, स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठनों के बीच साझा रणनीति के बिना नशे के खिलाफ लड़ाई अधूरी रहेगी.
इसके अलावा, अभियान की सफलता मापने के लिए ऐसे आंकड़ों की जरूरत है जो केवल जब्ती और गिरफ्तारी नहीं बल्कि नशे के इस्तेमाल, उपचार, पुनर्वास और दोबारा नशे की गिरफ्त में लौटने की स्थिति को भी सामने रखें.
2029 की डेडलाइन और असली कसौटी
अमित शाह ने नशे के खिलाफ लड़ाई के लिए जो समयसीमा सामने रखी है, वह सरकार की प्राथमिकता को स्पष्ट करती है. लेकिन किसी देश को नशे के खतरे से मुक्त करना किसी एक तारीख तक सीमित रहने वाला काम नहीं है. इसके लिए लगातार निगरानी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, पुलिस की जवाबदेही और समाज की भागीदारी जरूरी है.
स्कूलों में जागरूकता, युवाओं के लिए सकारात्मक अवसर, परिवारों की भागीदारी और नशा मुक्ति सेवाओं का विस्तार उतना ही जरूरी है जितना तस्करी के नेटवर्क पर प्रहार करना है.
अमित शाह के आह्वान की असली सफलता तब दिखेगी, जब तस्करों के नेटवर्क कमजोर होंगे, नशे तक पहुंच मुश्किल होगी, जरूरतमंदों को इलाज मिलेगा और परिवारों को अपने बच्चों का भविष्य नशे के हाथों खोने का डर कम होगा. 2029 का लक्ष्य इसी व्यापक बदलाव की दिशा में एक कसौटी है.
सवाल केवल यह नहीं कि भारत नशे के खिलाफ कितना बड़ा अभियान चलाता है, बल्कि यह है कि उस अभियान से जमीन पर कितनी जिंदगी बदलती है.
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