पूरे देश में गुरुवार से एक शब्द ट्रेंड कर रहा है. ये शब्द है रिजीम चेंज. रिजीम चेंज का मतलब होता है- किसी देश की शासन व्यवस्था या सत्ता को पूरी तरह से बदलना. ये शब्द दुनिया के कई देशों का भ्रमण कर भारत तक पहुंचा है. जिस समय पहुंचा है, वो समय महत्वपूर्ण है. रिजीम चेंज का जिक्र उस समय हो रहा है जब देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन चल रहा है. इसके बाद एक बहस छिड़ गई है कि जब मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आंदोलन चल रहा है, उस समय सत्ता परिवर्तन की बात क्यों की जा रही है. जब मौजूदा प्रदर्शन का घोषित उदेश्य ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा है तो रिजीम चेंज का युद्धघोष क्यों हो रहा है. रिजीम चेंज को लेकर आज सरकार प्रदर्शनकारियों और विपक्ष पर हमलावर है.
इससे पहले जान लीजिए कि शुक्रवार को दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी के तिरंगा प्रदर्शन में क्या हुआ. कॉकरोच जनता पार्टी ने आज शाम कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में 'लहरा दो तिरंगा' रैली बुलाई थी. लेकिन इलाक़े में धारा 163 लागू होने का हवाला देकर इस रैली की इजाज़त नहीं दी गई. जहां अभिजीत दीपके ठहरे हुए हैं, वहां दिल्ली पुलिस की टीम दोपहर में ही पहुंच गई और उन्हें नोटिस थमा दिया गया. उन्हें स्पष्ट शब्दों में बताया गया कि वे प्रदर्शन के लिए वो कनॉट प्लेस नहीं जाएं. ऐसा कोई कदम न उठाया जाए, जिससे आम नागरिकों, व्यापारियों, यात्रियों, मरीजों और अन्य लोगों के अधिकारों पर असर पड़े. दीपके ने नोटिस का विरोध किया लेकिन दिल्ली पुलिस अपनी बात पर अडिग रही.
CJP के प्रमुख अभिजीत दीपके जैसे ही रैली में भाग लेने के लिए करोलबाग से रवाना हुए, उन्हें हिरासत में ले लिया गया. 6 दिनों में दीपके को दूसरी बार कस्टडी में लिया गया है. सूत्रों के मुताबिक़ अभिजीत दीपके को हिरासत में लेने के बाद अब पुलिस उनके खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर रही है.
उधर AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को मंडी हाउस से कस्टडी में लिया गया. वो भी सेंट्रल पार्क जाने की कोशिश कर रही थीं. आज के प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने जबरदस्त तैयारी की थी. यही वजह है कि अभिजीत दीपके या नेहा बोरा समर्थकों के साथ सेंट्रल पार्क पहुंचने की कोशिश में कामयाब नहीं हो पाए.
हालांकि कुछ प्रदर्शनकारी तिरंगा लेकर वहां पहुंचे. उनके हाथ में तिरंगे को देखते हुए पुलिस ने भी उनसे कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की. इस दौरान करीब 150 लोगों को हिरासत में लिया गया. कुल मिलाकर ये प्रदर्शन 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से अलग था. ये इस मायने में भी अलग रहा कि किसी मेट्रो स्टेशन को बंद नहीं किया गया था. आम लोगों की आवाजाही पर पाबंदी नहीं लगाई गई. कनॉट प्लेस की दुकानें भी खुली रहीं. साथ ही अलग ये भी रहा कि कल राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर प्रदर्शन का समर्थन किया था. लेकिन आज प्रदर्शन से कांग्रेस दूर रही.
CJP के मुताबिक, इस प्रदर्शन का उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा दिलाना है. SIR को रोकना है. लेकिन इन सबके बीच विरोध प्रदर्शन में शामिल कुछ लोग इस आंदोलन का एक अलग मक़सद भी बता रहे हैं. इन्हीं में से एक हैं सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण. प्रशांत भूषण एक तरफ़ CJP के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं. तो दूसरी तरफ़ विपक्ष के नेता राहुल गांधी का साथ भी दे रहे हैं. इसके अलावा वो लेफ्ट के छात्र संगठनों के साथ भी खड़े दिखाई देते हैं. कल दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रशांत भूषण ने सरकार के ख़िलाफ़ बोलते हुए रिजीम चेंज की बात कह दी.
प्रशांत भूषण सत्ता परिवर्तन की नहीं रिजीम चेंज की बात कह रहे हैं. इसमें बहुत बुनियादी और हिंसक अंतर हैं. पहले इसे समझते हैं. सत्ता परिवर्तन में शासन करने वाले नेता या राजनीतिक दल बदलते हैं. रिजीम चेंज में देश की पूरी शासन-प्रणाली, कानून और बुनियादी व्यवस्था ही बदल दी जाती है. सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक प्रकिया से यानी मतदान से होता है. लेकिन रिजीम चेंज अक्सर हिंसा के जरिए होता है. मौजूदा सरकार से नाराजगी का फायदा उठाकर हिंसा की साजिश रची जाती है और बदलाव किया जाता है.
ये कोई पहली बार नहीं है जब ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ आंदोलन के दौरान विवादित बयान दिया गया. प्रशांत भूषण जहां रिजीम चेंज की वक़ालत करते हैं तो आंदोलन में शामिल होने के लिए जर्मनी से आए यूट्यूबर ध्रुव राठी पर सेना-पुलिस को भड़काने के आरोप लगे हैं. वहीं आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा बांग्लादेश के आंदोलन को अपनी प्रेरणा बता रही हैं. इस तरह के बयान से आंदोलन के मकसद पर सवाल खड़े होते हैं.
अगर सरकार को बदलना मक़सद है तो उसके लिए चुनाव आयोग का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए. किसी लोकतांत्रिक देश में सत्ता परिवर्तन, आंदोलन से नहीं बल्कि चुनाव से होता है. चुनाव में सरकार चला रही है पार्टी को पराजित करके ही सत्ता परिवर्तन किया जा सकता है. लोकतंत्र में सरकार बदलने का एकमात्र तरीका चुनाव ही है. अगर लोकतंत्र को बचाना है तो जनादेश का रास्ता क्यों नहीं चुनते?
CEC या 'रिजीम चेंज'.. किसलिए प्रोटेस्ट ? प्रोटेस्ट CJP ने बुलाया.. सिर्फ 'लेफ्ट' आया? CJP के 'तिरंगा प्रोटेस्ट' का विश्लेषण
— Zee News (@ZeeNews) October 16, 2026
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र में वोट के महत्व को लेकर कहा था- बैलट यानी मतपत्र..बुलेट यानी गोली से अधिक शक्तिशाली है. लेकिन इसके बावजूद रिजीम चेंज की बात करने पर बीजेपी ने इस आंदोलन पर सवाल उठाए. रिजीम चेंज ये शब्द खूनी और हिंसक टकराव का प्रतीक बन गया है. पिछले 5 वर्षों में दुनिया के कई देशों में बिना चुनाव के सत्ता परिवर्तन हुआ है. भारत के पड़ोस में ही इसके कई उदाहरण हैं.
बांग्लादेश में छात्र आंदोलन के सहारे शेख हसीना की सरकार को हटाया गया. नेपाल में पिछले साल जेन ज़ी आंदोलन के नाम पर के पी शर्मा ओली की सरकार को बाहर किया गया. वेनेजुएला में तो वहां की जनता ने नहीं बल्कि अमेरिका ने सत्ता परिवर्तन कराया. इन देशों में विशेष रूप से बांग्लादेश का ज़िक्र करके भारत में सत्ता परिवर्तन की बात की जा रही है. निशाने पर कांग्रेस भी है. यही वजह है कि आज कांग्रेस को भी इस पर सफाई देनी पड़ी. रिजीम चेंज का मतलब बताना पड़ा.
चुनाव के सहारे सत्ता परिवर्तन करने में कुछ भी गलत नहीं है. लेकिन आंदोलन के बीच रिजीम चेंज की बात कहना और बांग्लादेश का ज़िक्र करने से इस प्रदर्शन के मक़सद पर सवाल जरूर उठेंगे. संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर का विचार है कि अधिकारों की लड़ाई लड़ते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश का व्यापार और श्रम ही वह नींव है जिस पर हर नागरिक का घर और चूल्हा चलता है.
रिजीम चेंज वाली सोच और प्रदर्शन की जिद ने हजारों लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है. दिल्ली के कारोबारी इन प्रदर्शनों से तंग आ चुके हैं. त्योहारों के समय में बाज़ार बंद होने और रास्तों की नाकेबंदी से दिल्ली के व्यापारियों और दुकानदारों का धैर्य अब जवाब देने लगा है.
वो प्रदर्शन के ख़िलाफ़ अब खुलकर बोलने लगे हैं. कनॉट प्लेस के नज़दीक शंकर मार्केट में कल शाम व्यापारियों और CJP के समर्थक आमने-सामने आ गए. प्रदर्शन के लिए आए CJP के समर्थकों से दुकानदारों की बहस हो गई. उनके मुताबिक़ इस प्रदर्शन की वजह से बाज़ार पूरी तरह से खाली है और त्योहार के सीज़न में व्यापार 70% तक गिर गया है.
आज ज़ी न्यूज़ ने भी कनॉट प्लेस के व्यापारियों से बातचीत की. उनका कहना है कि आए दिन हो रहे प्रदर्शनों की वजह से उन्हें दुकान खोलने में डर लग रहा है. दिल्ली के व्यापारियों के संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री यानी CTI ने व्यापारियों को भारी नुक़सान का दावा किया है. CTI के मुताबिक, 10 अक्टूबर को हुए विरोध प्रदर्शन की वजह से दिल्ली के व्यापारियों को करीब 2 हजार करोड़ रुपये के व्यापार का नुकसान झेलना पड़ा.
इसके बावजूद प्रदर्शन का सिलसिला नहीं थम रहा है. यही वजह है कि दिल्ली के अलग-अलग व्यापारी संगठनों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर त्योहार के समय प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की है. चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ आंदोलन के दौरान भारत में कुछ लोगों को रिजीम चेंज का अवसर दिख रहा है. वहीं अमेरिका में आंदोलन के नाम पर भारत के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का सिलसिला जारी है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के बाद अब अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल भारत के आंतरिक मामलों में दखल दे रही हैं. डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद प्रमिला जयपाल भारतीय मूल की हैं. उनका आरोप है कि भारत सरकार ने 13 करोड़ लोगों का नाम मतदाता सूची से काट दिया है. उन्होंने इसकी तुलना अमेरिका में अपने विरोधी ट्रंप की सरकार से की है.
प्रमिला जयपाल को ये पता होना चाहिए कि मतदाता सूची में किसी का नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार सरकार के पास नहीं है. ये काम चुनाव आयोग करता है. अगर किसी मतदाता को शिकायत है कि उसका नाम गलत ढंग से हटाया गया है तो वो इसके ख़िलाफ़ कोर्ट में अपील कर सकता है. इसके लिए भारत में एक मजबूत व्यवस्था है. सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले की सुनवाई कर रहा है. हमारे देश में विपक्षी दल हैं, जो इसपर अपनी आवाज उठा रहे हैं. इसलिए भारत को किसी बाहरी दखल की ज़रूरत नहीं है. आज विदेश मंत्रालय ने भी प्रमिला जयपाल के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई.
विदेश मंत्रालय ने कहा कि प्रमिला जयपाल की टिप्पणी अनुचित और जानकारी के अभाव में दी गई है. ये किसी दूसरे लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया में दखल देने के समान है. हम एक बार फिर कहना चाहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. अगर SIR में कोई दिक्कत है तो इसका समाधान भारत में ही होगा. लेकिन आंदोलन के नाम पर अमेरिका के सांसद या वहां से काम करने वाले मानवाधिकार संगठन एजेंडा चलाएंगे तो इसका पुरजोर विरोध करना चाहिए.