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काली मंदिर में मछली का भोग लगाकर सुवेंदु अधिकारी बोले- धीरेंद्र शास्त्री की बात मानने को कोई बाध्य नहीं...

Suvendu Adhikari on Dhirendra Shastri: पश्चिम बंगाल में सीएम सुवेंदु अधिकारी ने बाबा बागेश्वर के मांसाहार पर दिए बयान पर संतुलन साधने की कोशिश की है. वे गुरुवार को काली मंदिर में गए और वहां पर मछली का भोग लगाकर प्रार्थना की. उन्होंने कहा कि धीरेंद्र शास्त्री जी का सम्मान है लेकिन उनकी बात मानने को कोई बाध्य नहीं है.

काली मंदिर में मछली का भोग लगाकर सुवेंदु अधिकारी बोले- धीरेंद्र शास्त्री की बात मानने को कोई बाध्य नहीं...

Suvendu Adhikari on Maa Kali Temple Fish Offering: पश्चिम बंगाल की राजनीति में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल एक बार फिर सुर्खियों में है. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता के प्रसिद्ध काली मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद पारंपरिक रूप से मछली का भोग लगाया. इस मौके पर उन्होंने ऐसा बयान दिया, जिसने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है. उन्होंने प्रख्यात कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयानों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि धर्म गुरुओं और संतों का समाज में अपना आदरणीय स्थान है, लेकिन लोग उनकी हर बात मानने के लिए बाध्य नहीं हैं.

'साधु-संतों का सम्मान लेकिन उनकी हर बात मानना जरूरी नहीं'

मंदिर परिसर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान जब सुवेंदु अधिकारी से बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की टिप्पणियों के बारे में पूछा गया था. इस पर उन्होंने बहुत ही स्पष्ट और संतुलित लहजे में अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि देश में हर नागरिक को अपनी आस्था, विचार और निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता है. धार्मिक गुरुओं और संतों का भी समाज में अपना आदरणीय स्थान है, लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि उनके द्वारा कही गई हर बात को अंतिम सत्य मान लिया जाए या उसे हर व्यक्ति पर अनिवार्य रूप से थोपा जाए.

उन्होंने कहा कि जो आए थे (धीरेन्द्र शास्त्री) उन्होंने अपनी बात कह दी है, इसका मतलब ये नहीं है कि कोई नियम किसी पर थोपा जा रहा है. सब लोग अपने खान-पान और संस्कृति को लेकर स्वतंत्र हैं और उसके हिसाब से कोई भी फैसला ले सकते हैं.

बंगाल में मां काली को मछली का भोग लगाने की प्रथा

बताते चलें कि बंगाल की लोक संस्कृति में मां काली को मछली का भोग लगाने की प्राचीन प्रथा रही है. ऐसे में सुवेंदु अधिकारी का यह कदम बंगाल की संस्कृति के प्रति गहरे जुड़ाव को साबित करने का एक प्रयास माना जा रहा है. इसके जरिए उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के उन आरोपों का भी वैचारिक जवाब दिया, जो भाजपा को बंगाल की संस्कृति से अनजान पार्टी के रूप में कहती आई है.

उनके इस बयान को राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. एक तरफ सुवेंदु अधिकारी हिंदुत्व की विचारधारा के मुखर पैरोकार हैं, वहीं दूसरी तरफ इस तरह का बयान देकर उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और क्षेत्रीय मान्यताओं का सम्मान सर्वोपरि है.

मामले में संतुलन बनाने की कोशिश

सुवेंदु अधिकारी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश भर में धर्म, राजनीति और आध्यात्मिक गुरुओं की भूमिका को लेकर अक्सर तीखी बहसें होती रहती हैं. पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में यह मुद्दा और भी अहम है. जहां हर छोटे-बड़े मुद्दे पर सियासी रस्साकशी आम बात है.

 

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About the Author

Devinder Kumar

Devinder Kumar

अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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