हवा में जहर की बौछार, सांसों पर 'मार': दिवाली की रात 800% तक बढ़ जाता है पॉल्यूशन वाला 'दानव'
फुलझड़ी, रॉकेट, चकरी जैसे पटाखे देखने में बेहद सुंदर लगते हैं. लेकिन इनमें से निकलने वाला धुआं बेहद खतरनाक होता है. इस वजह से PM 2.5 का लेवल 800 परसेंट तक भी बढ़ जाता है.
हर दिवाली पर जब आसमान लाल, हरे और सुनहरे रंगों की आतिशबाजी से जगमगा उठता है, तो जमीन के पास की हवा एक जहरीले केमिकल वाले कॉकटेल में बदल जाती है. फुलझड़ियों, चकरी और रॉकेट जैसे पटाखों में दिखने वाले ये शानदार रंग, भारी धातुओं और इनऑर्गेननिक सॉल्ट्स को जलाने से पैदा होते हैं.
स्ट्रोंटियम से गहरा लाल, बेरियम से चमकीला हरा, कॉपर से नीला और सोडियम से चमकीला पीला रंग मिलता है. पोटेशियम नाइट्रेट, सल्फर और चारकोल, (जो ऑक्सीडाइजर और प्रोपेलेंट का काम करते हैं) इनके साथ मिलकर ये पटाखे एक ऐसी केमिकल रिएक्शन करते हैं, जिससे हवा में बारीक कणों के साथ-साथ सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसें बड़ी मात्रा में पैदा होती हैं.
800 परसेंट बढ़ जाता है पीएम2.5 का स्तर
IIT बॉम्बे और क्षेत्रीय निगरानी नेटवर्क की तरफ से किए गए एटमॉस्फेरिक रिसर्च से पता चलता है कि त्योहार की रातों में हवा की केमिकल कंपोजिशन में भारी बदलाव आता है. कुछ ही घंटों के भीतर, हवा में मौजूद बारीक कणों (PM2.5) का स्तर 300 प्रतिशत से लेकर 800 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. रात 10 बजे से 1 बजे के बीच, जब सबसे ज्यादा पटाखे फोड़े जाते हैं, तब शहरी इलाकों में PM2.5 का स्तर अक्सर 800 से 1,000 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच जाता है,जो सुरक्षित वायु गुणवत्ता मानकों से 15 गुना से भी ज्यादा है.
स्रोत विश्लेषण से पता चलता है कि दिवाली के दौरान सबसे ज्यादा पटाखे फोड़े जाने के समय, हवा में मौजूद PM2.5 कणों में 85 प्रतिशत तक हिस्सा पटाखों से निकलने वाले तत्वों का होता है. दिवाली की रात लिए गए नमूनों की लैब जांच में जहरीली भारी धातुओं की मात्रा में भारी उछाल देखा गया है. दिवाली से पहले के सामान्य स्तर की तुलना में, बेरियम की मात्रा 140 गुना से ज्यादा और स्ट्रोंटियम की मात्रा 450 गुना से ज्यादा बढ़ जाती है. हवा में मौजूद एरोसोल में पानी में घुलने वाले सल्फेट और नाइट्रेट की मात्रा भी बहुत बढ़ जाती है, जिससे एरोसोल की एसिडिटी बढ़ती है और ऑक्सीडेटिव क्षमता में 200 से 300 प्रतिशत तक का इजाफा होता है.
सर्दियों में क्यों खतरनाक होता है पॉल्यूशन?
पटाखों से निकलने वाला भारी प्रदूषण, उत्तरी भारत में मौसम के बदलाव के समय के साथ मेल खाता है. कम तापमान, ज्यादा नमी और हवा की धीमी गति के कारण जमीन के पास एक 'इनवर्जन लेयर' बन जाती है, जो प्रदूषकों को हवा में फैलने से रोकती है. हालांकि देर पतझड़ के मौसम में पराली जलाने से क्षेत्रीय वायु प्रदूषण में कुछ हद तक योगदान होता है, लेकिन वायुमंडलीय निगरानी से यह साफ होता है कि आधी रात के समय पोटेशियम, एल्युमिनियम, बेरियम और स्ट्रोंटियम जैसी खतरनाक भारी धातुओं की कंसन्ट्रेशन कैंप में अचानक और भारी इजाफा केवल पटाखों के जलने के कारण होता है.
हेल्थ के लिए गंभीर
मार्केट्स फेडरेशन और इंडस्ट्री बॉडी के अनुमान बताते हैं कि भारत के शहरों में एक ही शाम को हजारों मीट्रिक टन आतिशबाजी होती है. इतनी बड़ी मात्रा में पटाखों के जलने से बहुत सूक्ष्म कण निकलते हैं, जो आसानी से फेफड़ों के भीतर गहराई तक (एल्वियोली में) पहुंच जाते हैं और खून के प्रवाह में मिल जाते हैं.
त्योहारी सीजन के दौरान स्वास्थ्य निगरानी में अक्सर सांस लेने में गंभीर तकलीफ, अस्थमा के दौरे, आंखों में जलन और त्वचा की एलर्जी के मामलों में बढ़ोतरी देखी जाती है. भारी धातुओं वाले कणों (एरोसोल) के सांस के जरिए शरीर में जाने से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है, जो बच्चों, बुजुर्गों और पहले से दिल संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए बड़ा खतरा पैदा करता है. यही कारण है कि दिवाली के बाद हवा की गुणवत्ता में सुधार लाना हर साल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक अहम विषय बन जाता है.