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Himachal News: हिमाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले इलाकों में तेजी से बढ़ रही ग्लेशियल झीलों ने वैज्ञानिकों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है. IIT मंडी के शोधकर्ताओं ने राज्य की 9 ऐसी ग्लेशियल झीलों की पहचान की है, जिन्हें प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में ‘वॉटर बम’ जैसा खतरा पैदा करने वाला बताया गया है. शोधकर्ताओं के मुताबिक बढ़ते तापमान के कारण हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और इसका असर इन झीलों के आकार पर भी पड़ रहा है. अचानक झील फटने से बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की घाटियों में पहुंच सकता है.
9 झीलों पर खास नजर
IIT मंडी की छह सदस्यीय रिसर्च टीम ने चंबा और लाहौल-स्पीति के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थित नौ झीलों को विशेष रूप से संवेदनशील बताया है. इनमें कालिकुंड, चंद्रताल, वासुकी, सुराई, क्या त्सो, योचे, समुद्र टापू, कासंग और गेफांग गथ शामिल हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार भूस्खलन, भूकंप या किसी अन्य भूगर्भीय हलचल से इन झीलों के प्राकृतिक अवरोध कमजोर हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में अचानक पानी नीचे की ओर बहने से घाटियों में व्यापक तबाही का खतरा पैदा हो सकता है.
10 साल में कितना बदला
अध्ययन में 2025 के दौरान हिमाचल प्रदेश में 3500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित 2,076 ग्लेशियल झीलों को मैप किया गया. यह संख्या 2015 में दर्ज झीलों से करीब 710 अधिक है. इस दौरान इन झीलों का कुल क्षेत्रफल भी 28.45 फीसदी बढ़ा है. कुछ झीलों में विस्तार काफी तेजी से हुआ है. लाहौल-स्पीति की गेफांग गथ झील का क्षेत्रफल ग्लेशियर के पिघलने के कारण करीब 2.44 लाख वर्ग मीटर बढ़ा, जबकि कासंग झील का क्षेत्रफल करीब 1.50 लाख वर्ग मीटर बढ़ा है. कालिकुंड झील का विस्तार भी करीब 1.20 लाख वर्ग मीटर बताया गया है.
कहां है सबसे ज्यादा खतरा
शोधकर्ताओं ने कालिकुंड झील को खास तौर पर संवेदनशील बताया है. इसके आसपास की ढलानें काफी खड़ी हैं, जिससे प्राकृतिक अवरोध के अचानक टूटने या झील के फटने का जोखिम बढ़ सकता है. अध्ययन के मुताबिक इन झीलों से जुड़े संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में 15 से अधिक पुल, कई आबादी वाले इलाके और शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य संस्थान आते हैं. ऐसे में ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलाव की लगातार निगरानी और समय रहते चेतावनी जारी करना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
निगरानी और चेतावनी जरूरी
शोधकर्ताओं ने कहा कि सैटेलाइट तकनीक की मदद से ग्लेशियल झीलों के आकार और बदलाव पर नजर रखना पहले की तुलना में आसान हुआ है, लेकिन केवल सैटेलाइट निगरानी पर्याप्त नहीं है. जमीनी स्तर पर मॉनिटरिंग, अर्ली वार्निंग सिस्टम और प्रभावी सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत है. केंद्र को हिमाचल सरकार ने चार प्रमुख ग्लेशियल झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने और दूसरे बचाव उपायों के लिए 105 करोड़ रुपये की मांग की है. वहीं केंद्रीय जल आयोग 681 ग्लेशियल झीलों के लिए फ्लो-पाथ और डाउनस्ट्रीम जोखिम का आकलन करेगा, जबकि NDMA एकीकृत जोखिम वर्गीकरण व्यवस्था तैयार करेगा. अध्ययन में यह भी चेताया गया है कि संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय और पर्यटन गतिविधियां ग्लेशियरों पर धूल जमने की समस्या बढ़ा सकती हैं, जिससे बर्फ ज्यादा गर्मी सोखकर पिघलने की प्रक्रिया तेज कर सकती है.