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हिमाचल प्रदेश ने पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं. राज्य ने एएसईआर, परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स और नेशनल अचीवमेंट सर्वे जैसे राष्ट्रीय स्तर के सर्वेक्षणों में बेहतर प्रदर्शन किया है. लेकिन इन उपलब्धियों के बीच राज्य के करीब 50 हजार बच्चे ऐसे हैं, जो पर्याप्त शिक्षकों की सुविधा के अभाव में शिक्षा की मुख्यधारा से पीछे छूटते दिखाई दे रहे हैं.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार हिमाचल प्रदेश में 3,315 स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक तैनात है. इनमें 3,214 प्राथमिक और 101 माध्यमिक स्कूल शामिल हैं. इसके अलावा 150 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक नहीं है. यूडीआईएसई 2025-26 की रिपोर्ट के मुताबिक, एकल शिक्षक वाले स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 47,579 है.
कम छात्र हैं तो शिक्षक क्यों नहीं?
हिमाचल में शिक्षकों की कमी का आंकड़ा राज्य के औसत छात्र-शिक्षक अनुपात से अलग तस्वीर दिखाता है. राज्य का औसत छात्र-शिक्षक अनुपात 1:10 है, जो देश के सबसे कम अनुपातों में शामिल है. इसका मतलब है कि राज्य में कुल मिलाकर शिक्षकों की संख्या पर्याप्त हो सकती है. समस्या शिक्षकों की तैनाती और स्कूलों में उनके असमान वितरण से जुड़ी दिखाई देती है.
दूरदराज स्कूलों में समस्या ज्यादा क्यों?
हिमाचल में प्रति स्कूल औसत नामांकन केवल 83 छात्र है, जो लद्दाख और मिजोरम के बाद सबसे कम में है. कम नामांकन वाले स्कूलों की बड़ी संख्या के कारण शिक्षकों की तैनाती चुनौती बन रही है. चंबा, कुल्लू, शिमला और सिरमौर जैसे दूरदराज जिलों के स्कूलों में यह समस्या ज्यादा गंभीर बताई गई है. शहरी स्कूलों में जरूरत से अधिक शिक्षक और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त स्टाफ नहीं होने का मुद्दा भी सामने आया है.
शिक्षकों के तबादले में क्या अड़चन है?
शिक्षा विभाग ने अधिक स्टाफ वाले स्कूलों से शिक्षकों को हटाकर जरूरत वाले दूरदराज स्कूलों में भेजने की कोशिश की थी. लेकिन इस फैसले का विरोध होने के बाद इसे वापस लेना पड़ा. शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने भी विधानसभा में उपलब्ध शिक्षकों के युक्तिकरण में राजनीतिक और अन्य दबावों का जिक्र किया था.
क्या पसंदीदा पोस्टिंग भी वजह है?
दूरदराज क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती लंबे समय से चुनौती बनी हुई है. खबर के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में पसंदीदा पोस्टिंग पाने वाले शिक्षकों को दूर के स्कूलों में भेजना आसान नहीं है. हाल में सीबीएसई से जुड़े 150 स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए करीब 6,000 शिक्षकों की स्क्रीनिंग परीक्षा कराई गई थी. चयनित शिक्षकों को मौजूदा स्टाफ के स्थानांतरण के जरिए इन स्कूलों में भेजने की योजना थी, लेकिन कई चयनित शिक्षक अब नियुक्ति को लेकर अदालत का रुख कर चुके हैं.
क्या नियम बदलने से समाधान होगा?
शिक्षा मंत्री का मानना है कि भर्ती और पदोन्नति नियमों में ऐसा प्रावधान होना चाहिए, जिसके तहत नियुक्ति के समय और पहली पदोन्नति के बाद शिक्षकों को ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में सेवा देना अनिवार्य हो. इससे शिक्षकों की तैनाती में संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है.
सबसे बड़ा सवाल क्या है?
इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है. एक शिक्षक का कई कक्षाओं और कई विषयों को संभालना शिक्षा की गुणवत्ता के लिए बड़ी चुनौती है. हिमाचल ने राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति जरूर दिखाई है, लेकिन दूरदराज इलाकों में शिक्षकों की समान और पारदर्शी तैनाती सुनिश्चित करना अभी भी बड़ी चुनौती है. अगर समय रहते इसका समाधान नहीं हुआ, तो अच्छी शिक्षा तक समान पहुंच का लक्ष्य अधूरा रह सकता है.