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हरियाणा स्थित पानीपत के नितेश सिवाच की कहानी मेहनत, संघर्ष और कुश्ती के जुनून की कहानी है. कभी पिता के साथ सुबह पांच बजे उठकर दूध बेचने वाले नितेश ने एशियाई खेलों की ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत के लिए रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया. जापान में आयोजित एशियाई खेलों के फाइनल में नितेश को जापानी पहलवान से हार का सामना करना पड़ा और वह स्वर्ण पदक से चूक गए.
नितेश की इस उपलब्धि ने उनके परिवार और गांव के साथ पूरे पानीपत को गौरवान्वित किया है. ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत को इससे पहले 1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण और रजत पदक मिले थे. 1962 में मालवा सिंह और गणपत अंदालकर ने स्वर्ण पदक जीते थे, जबकि उदय चंद, सज्जन सिंह और मारुति माने ने रजत पदक हासिल किया था.
नितेश के पिता आनंद सिवाच खेती के साथ दूध बेचने का काम करते थे. परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए नितेश ने भी करीब 15 साल की उम्र में पिता का हाथ बंटाना शुरू किया. करीब दो साल तक वह सुबह दूध लेकर निकलते और शाम को वापस लौटते रहे.
नितेश को बचपन से ही कुश्ती का शौक था. उनके पिता भी कुश्ती करते थे. चोट लगने के बाद परिवार पानीपत आ गया. इसके बाद नितेश ने करीब एक साल तक पिता के साथ दूध बेचने के साथ कुश्ती का अभ्यास भी जारी रखा.
लगातार अभ्यास और कुश्ती के प्रति जुनून को देखते हुए परिवार ने बाद में नितेश को पूरी तरह कुश्ती के लिए समर्पित होने की अनुमति दी. इसके बाद उन्होंने मेहनत और लगातार अभ्यास के दम पर अपनी पहचान बनाई और अब एशियाई खेलों में रजत पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है.
नितेश की उपलब्धि से उनकी मां गुणवती की आंखों में खुशी के आंसू हैं. परिवार चार अक्टूबर को दिल्ली पहुंचकर नितेश का स्वागत करेगा. मां उसके लिए घर की डेयरी का ताजा पनीर, चूरमा, दलिया और उसकी डाइट के मुताबिक खिचड़ी लेकर जाएंगी.
पिता आनंद सिवाच की अब एक ही इच्छा है कि उनका बेटा ओलंपिक में देश के लिए स्वर्ण पदक जीते. बेटे की इस उपलब्धि से परिवार में खुशी का माहौल है और उसके स्वागत की तैयारियां की जा रही हैं.
नितेश के भाई सुशील भी पहलवानी करते हैं. उन्होंने कहा कि भाई की सफलता से उन्हें प्रेरणा मिली है. अब वह भी नितेश से बड़ा पदक जीतकर देश का नाम रोशन करना चाहते हैं. परिवार एयरपोर्ट पर नितेश का माला, मिठाई और उपहार के साथ स्वागत करेगा. दूध बेचने से शुरू हुआ नितेश का सफर अब एशियाई खेलों के रजत पदक तक पहुंच चुका है. राकेश भयाना की रिपोर्ट