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Haryana News: धान की कटाई के बाद किसानों की सबसे बड़ी समस्या पराली होती है. पराली को प्राकृतिक तरीके से सड़ने में समय लग जाता है. इससे अगली फसल की तैयारी में देरी हो जाती है. इसी कारण कई किसान पराली जला देते हैं. ऐसे में धुआं और पॉल्यूशन बढ़ने के साथ मिट्टी के पोषक तत्वों और जैविक गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है.
किसानों के लिए क्या उपलब्ध कराया गया?
इस समस्या से निपटने के लिए चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि श्वविद्यालय (HAU) ने बायो-डी-कंपोजर का ऑप्शन सुझाया है. विश्वविद्यालय की तरफ से कृषि मेले में पहली बार HAU बायो-डी-कंपोजर किसानो के लिए उपलब्ध कराया गया. इसके बाद किसानों ने इसमें इंटरेस्ट भी दिखाया और खरीदारी भी की.
विश्वविद्यालय ने क्या कहा?
विश्वविद्यालय के अनुसार, बायो-डी-कंपोजर में मौोजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव फसल के अवशोषों को जैविक तरीके से गलाने में मदद करते हैं. इसके इस्तेमाल से पराली जलाना नहीं पड़ेगा और इसे मिट्टी के साथ मिलाया जा सकता है. इससे फसल अवशेषों में मौजूद पोषक तत्वों का खेत में ही पुनर्चक्रण होता है और मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाने में मदद मिल सकती है
कैसे तैयार करें घोल
HAU के अनुसार, एक एकड़ खेत की पराली के लिए लगभग एक लीटर बायो-डी-कंपोजर को पांच लीटर पानी में मिलाना होगा. इसमें 100 ग्राम यूरिया, 100 ग्राम चूना, 250 ग्राम गुड़ और 100 ग्राम बेसन मिलाया जाता है. सभी सामान को अच्छी तरह मिलाया जाता है और बर्तन को ढक दिया जाता है. इसे लगभग सामान्य तापमान पर 48 से 72 घंटे तक रखें.
इसके बाद तैयार घोल को 200 लीटर पानी में मिलाकर पराली पर समान रूप से छिड़काव कर दें. छिड़काव के बाद कृषि यंत्रों की मदद से पराली को मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए. वहीं सड़ने की प्रक्रिया के लिए खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी है.
इन बातों का भी रखें ध्यान
बायो-डी-कंपोजर का घोल बनाते और इस्तेमाल करते समय किसानों को कुछ सावधानियां बरतना जरूरी है. घोल तैयार करते समय दस्ताने और मास्क जरूर पहनें. छिड़काव के दौरान आंखों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा चश्मे का इस्तेमाल करें. बायो-डी-कंपोजर को सीधी धूप और ज्यादा गर्मी से दूर ठंडी और सूखी जगह पर रखें.
अवशेषों का इस्तेमाल खेत में ही किया जा सकता
पराली प्रबंधन से किसानों को दोहरा फायदा मिल सकता है. खेत में फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें मिट्टी में मिलाने से अवशेषों का इस्तेमाल खेत में ही किया जा सकता है. इससे अगली फसल की बुवाई के लिए खेत तैयार करने में मदद मिलती सकती है. साथ ही पराली जलाने से होने वाले धुएं को भी कम किया जा सकता है.