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AI से बनी ‘नकली उर्वशी’ पर 7000 Cr की कानूनी जंग! ये सितारे भी लड़ चुके हक की लड़ाई; आज का नहीं... दशकों पुराना है Personality Rights का मामला

Urvashi Rautela AI Controversy: बॉलीवुड एक्ट्रेस उर्वशी रौतेला और एक विदेशी टेक कंपनी के बीच छिड़े नए विवाद ने इंटरनेट पर खलबली मचा दी है. मामला बिना परमिशन उनकी पहचान और तस्वीरों के इस्तेमाल से जुड़ा है. 7 हजार करोड़ रुपये के हर्जाने के दावे ने अब यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि डिजिटल दुनिया में आपके चेहरे का असली मालिक कौन है.

Written By Vandana Saini
Published: Oct 02, 2026, 10:11 AM IST | Updated: Oct 02, 2026, 02:14 PM IST
Image Credit: दशकों पुराना है ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ का मामला
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की दुनिया जिस तेजी से हमारे रोजमर्रा की जिंदगी में जगह बना रही है, उसने जितनी सहूलियत दी है, उससे कहीं ज्यादा बड़े खतरे भी पैदा कर दिए हैं. आज किसी भी आम या खास इंसान का चेहरा कॉपी करना, उसकी आवाज कॉपी करना और हूबहू वैसा ही डिजिटल क्लोन तैयार करना चुटकियों का काम बन चुका है. सोशल मीडिया पर ये डर सिर्फ आम यूजर तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्लैमर जगत की बड़ी हस्तियों के लिए भी सिरदर्द बन गया है. इस जंग में अब बॉलीवुड की मशहूर एक्ट्रेस उर्वशी रौतेला का भी नाम जुड़ गया है.

उर्वशी रौतेला की लीगल टीम ने अमेरिका के लॉस एंजिलिस शहर में मौजूद एक बड़ी AI Company पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं. टीम का साफ कहना है कि उनकी परमिशन के बिना या किसी भी कॉन्ट्रैक्ट के बिना एक्ट्रेस के नाम, तस्वीरों और वीडियोज का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है. इस मामले में कानूनी कदम उठाने की तैयारी पूरी कर ली गई है और शुरुआती नुकसान का आकलन करीब 7,000 करोड़ रुपये आंका जा रहा है. इतनी बड़ी रकम का जिक्र आते ही इंटरनेट से लेकर सिनेमा और टेक गलियारों तक हर जगह इसी विवाद की चर्चा होने लगी है.

आखिर क्यों कोर्ट पहुंचा ये मामला?

ये पूरा मामला सिर्फ किसी सोशल मीडिया पेज पर फोटो री-पोस्ट करने जैसा सिंपल विवाद बिल्कुल नहीं है. असल सवाल ये खड़ा होता है कि जब AI किसी भी इंसान का हूबहू डिजिटल रूप बना सकता है, तो उस पहचान का असली मालिक कौन होगा? क्या कोई भी टेक कंपनी किसी स्टार के सालों के नाम और शोहरत को फ्री में अपना प्रॉडक्ट बेचने के लिए इस्तेमाल कर सकती है? 

उर्वशी की टीम का आरोप है कि उनकी पहचान का गलत इस्तेमाल करके फाइनेशियल प्रॉफिट कमाया गया, लेकिन इन सभी दावों की आखिर सच्चाई अब अदालती चौखट पर ही तय होगी.

क्या है विवाद की असली वजह, कहां से शुरू हुई बात?

इस पूरे विवाद की सुगबुगाहट 29 सितंबर को मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए सामने आई, जब उर्वशी रौतेला की टीम का एक कड़ा बयान पब्लिक हुआ. बयान में कहा गया कि लॉस एंजिलिस की एक टेक फर्म ने एक्ट्रेस के फेस, पुरानी वीडियो फुटेज और नाम का बिना परमिशन कमर्शियल यूज किया है. टीम का आरोप है कि कंपनी ने इस डेटा के जरिए मार्केट में अपनी कमर्शियल वैल्यू बढ़ाई और करोड़ों का फायदा उठाने की कोशिश की. 

हालांकि, शुरुआत में किसी भी अमेरिकी कंपनी का नाम नहीं बताया गया था, इसलिए किसी भी नतीजे पर पहुंचने से फैक्ट को समझना जरूरी है. विवाद बढ़ने के बीच ही शिराज हसन का नाम भी मीडिया के सामने आया, जिन्हें रिपोर्ट्स में बॉलीवुड.एआई (Bollywood.ai) और हॉलीवुड.एआई (Hollywood.ai) का फाउंडर और सीईओ बताया गया. 

दरअसल, ये चर्चा उर्वशी रौतेला के एक वायरल इंटरव्यू के बाद और ज्यादा गर्म हो गई थी, जिसमें उनसे AI और सिनेमा के भविष्य पर सवाल पूछा गया था. शिराज हसन ने अपने पब्लिक रिएक्शन में कहा कि उनकी कंपनी ने एक्ट्रेस के जवाब को किसी भी तरह से इफेक्ट नहीं किया था. साथ ही उन्होंने AI को फिल्म इंडस्ट्री का आने वाला कल बताया.

वहीं, दूसरी तरफ एक्ट्रेस की टीम इस बात पर अड़ी है कि उनकी पहचान का कमर्शियल यूज पूरी तरह गैर-कानूनी है. इस मामले में अफवाहों और हकीकत के बीच की लकीर को समझना बेहद जरूरी है. अब तक सामने आई रिपोर्ट्स के हिसाब से उर्वशी के नाम, तस्वीरों और वीडियो के इस्तेमाल के आरोपों की पुष्टि करती हैं. 

कई सोशल मीडिया दावों में ये भी कहा जाने लगा कि उनका कोई वर्चुअल ‘एआई इन्फ्लुएंसर’ बनाकर आपत्तिजनक कंटेंट प्रमोट किया गया, लेकिन किसी अभी तक किसी तरह के ऑथेंटिक सोर्स से इस बात की पुष्टि नहीं हुई है. 

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क्या है 7000 करोड़ के दावे का असली गणित?

इस पूरी खबर में जिस एक बात ने सबका ध्यान खींचा है, वो है 7,000 करोड़ रुपये की भारी-भरकम रकम, लेकिन किसी भी कानूनी मामले में शब्दों की बारीकी को समझना सबसे जरूरी होता है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये रकम उर्वशी रौतेला की टीम की ओर से आंका गया डैमेज असेसमेंट है. टीम का तर्क है कि बिना इजाजत एक्ट्रेस के ब्रैंड नेम का इस्तेमाल करने से कंपनी को जो बड़ा फाइनेंशियल प्रॉफिट हुआ, उसका हर्जाना इसी लेवल का होना चाहिए. 

ये पूरी तरह से एक्ट्रेस की टीम का अपना दावा है, किसी अदालत का फैसला नहीं. हालांकि, लोग इसे एक्ट्रेस को मिलने वाला मुआवजा समझने की भूल कर रहे हैं, जो कि पूरी तरह से गलत है. अगर ये मामला कोर्ट में ऑफिशियल केस के तौर पर जाता है, तो वहां साबित करना होगा कि असल नुकसान कितना हुआ है. अदालतें ये देखती हैं कि आरोपी कंपनी ने उस नाम से असल में कितना मुनाफा कमाया और क्या वाकई पहचान का गलत इस्तेमाल हुआ था. 

मिसाल के तौर पर कैलिफोर्निया के सिविल कोड सेक्शन 3344 में ये नियम है कि किसी की पहचान चुराने पर हुए रियल नुकसान और कंपनी के मुनाफे की भरपाई मांगी जा सकती है, लेकिन इसके लिए बेहद कड़े सबूत देने होते हैं. इसके अलावा इस रकम को बिना सोचे-समझे सीधे 850 मिलियन डॉलर (7,000 करोड़ रुपये) का अदालती मुकदमा करार देना भी जल्दबाजी होगी. वहीं, अमेरिकी अदालतों में किसी ऐसे ऑफिशियल के की फाइलिंग पब्लिक नहीं मिली है, जिसमें 850 मिलियन डॉलर की मांग लिखित में दर्ज हो. 

इसलिए एक जिम्मेदार नजरिए से इसे केवल ‘एक्ट्रेस की टीम की ओर से आंका जा रहा हर्जाना’ कहना ही सबसे सटीक और फैक्चुअल तरीका होगा, न कि अदालत की तरफ से तय की गई कोई पेनल्टी.

क्या है डीपफेक और पर्सनैलिटी राइट्स?

AI के इस नए विवाद को समझने के लिए सबसे पहले ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ की बेसिक समझ होना जरूरी है. आसान शब्दों में कहें तो इसका मतलब ये है कि किसी भी इंसान के नाम, चेहरे, तस्वीर, आवाज और उसके खास अंदाज पर सिर्फ और सिर्फ उसी का हक होता है. कोई भी दूसरे इंसान या कंपनी उसकी मर्जी के बिना इन चीजों न तो अपने लिए इस्तेमाल कर सकता है और न ही इनको बेचकर पैसा नहीं कमा सकता है. 

भारत में इसके लिए कोई अलग से बना-बनाया कानून नहीं है, बल्कि प्राइवेसी, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट और पुराने अदालती फैसलों के सहारे ही इन अधिकारों की हिफाजत की जाती है. अब AI और डीपफेक तकनीक के आने से ये पूरी लड़ाई एकदम नए मोड़ पर पहुंच गई. पहले के जमाने में ज्यादा से ज्यादा किसी स्टार की पुरानी फोटो चुराकर किसी पोस्टर या पर्चे पर छाप दी जाती थी, जिसे पकड़ना आसान होता था, लेकिन आज का जेनरेटिव एआई किसी भी सेलिब्रिटी का डिजिटल क्लोन बना सकता है. 

उसकी आवाज की हूबहू नकल कर सकता है और ऐसे वीडियो गढ़ सकता है जो असल में कभी हुए ही नहीं. इसी तकनीकी खतरे के चलते आज की अदालतों को पुराने कानूनों की नई व्याख्या करनी पड़ रही है, ताकि लोगों की डिजिटल पहचान को सिक्योर रखा जा सके. हालांकि, कानून की नजर में हर तरह का इस्तेमाल गैर-कानूनी नहीं माना जाता. अगर कोई मीडिया चैनल खबर दिखा रहा है, कोई कलाकार पैरोडी या कॉमेडी कर रहा है, या कोई आम चर्चा हो रही है, तो उसे सीधे तौर पर क्राइम नहीं कहा जा सकता. 

कानून तब हरकत में आता है, जब किसी के नाम और चेहरे का इस्तेमाल धोखे से सामान बेचने, झूठा प्रमोशन करने या उसकी साख को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाए. इसलिए सारा विवाद इस बात पर टिकता है कि क्या संबंधित इंसान की सहमति ली गई थी और क्या उससे कोई आर्थिक फायदा उठाया जा रहा था.

अंतरराष्ट्रीय कानूनी पेंच: अमेरिका की कंपनी तो कहां चलेगा केस?

उर्वशी रौतेला के इस मामले का सबसे उलझा हुआ पहलू इसका इंटरनेशनल यानी क्रॉस-बॉर्डर एंगल है. जिस कंपनी पर आरोप लगे हैं, वो अमेरिका के कैलिफोर्निया के लॉस एंजिलिस शहर की बताई जा रही है. ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि इस केस की कानूनी लड़ाई भारत में लड़ी जाएगी या सात समंदर पार अमेरिका में? कैलिफोर्निया के अपने कानून, खास तौर पर सिविल कोड सेक्शन 3344, किसी भी इंसान की आवाज, चेहरे और डिजिटल रेप्लिका के कमर्शियल यूज पर बेहद सख्त माने जाते हैं और वहां हर्जाने के कड़े नियम हैं.

लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि अभी तक किसी भी अदालत में केस दर्ज होने के पक्के कानूनी दस्तावेज पब्लिक डोमेन में सामने नहीं आए हैं. कुछ रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि भारत और अमेरिका दोनों जगह केस फाइल कर दिए गए हैं, जो फिलहाल पूरी तरह कंफर्म नहीं है. कई मीडिया रिपोर्ट्स ने साफ किया है कि अभी तक लीगल टीम ने ये तय करके पब्लिक नहीं किया है कि वे केस मुंबई की अदालत में ले जाएंगे, कैलिफोर्निया कोर्ट में या फिर दोनों जगह एक साथ अर्जी दी जाएगी.

जब भी दो अलग-अलग देशों के बीच ऐसा विवाद होता है, तो सबसे पहले ज्यूरिसडिक्शन का पेंच फंसता है. ये देखा जाता है कि कंपनी का दफ्तर कहां है, इंटरनेट पर वो कंटेंट कहां देखा गया और शिकायत करने वाले को सबसे ज्यादा नुकसान किस जमीन पर हुआ है. अमेरिकी अदालतों में केस लड़ना बेहद खर्चीला और लंबा प्रोसेस होता है. हालांकि, वहां राहत भी काफी बड़ी मिल सकती है. जब तक उर्वशी की टीम कोई ऑफिशियल चार्जशीट या कंप्लेंट कोर्ट में पेश नहीं करती, तब तक कानूनी दांव-पेच पर केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं.

बॉलीवुड का रिएक्शन: सिर्फ उर्वशी की नहीं, पूरी इंडस्ट्री की चिंता

इस विवाद को केवल उर्वशी रौतेला की पर्सनल लड़ाई के तौर पर देखना गलत होगा, क्योंकि पूरी फिल्म इंडस्ट्री इस अनजान खतरे का सामना कर रही है. हालांकि, ये कहना भी ठीक नहीं होगा कि पूरी इंडस्ट्री इस केस में खुलकर सड़क पर आ गई है, लेकिन अंदर ही अंदर हर किसी को अपनी पहचान चोरी होने का डर सता रहा है. सुपरस्टार सलमान खान ने भी कुछ समय पहले बिना इजाजत बनाए जा रहे AI वीडियो और फर्जी वॉइस डबिंग पर खुलकर अपनी चिंता जताई थी. उन्होंने साफ कहा था कि किसी से वे कहलवाना, जो उसने असल में कभी कहा ही नहीं, बेहद खतरनाक ट्रेंड है.

भारतीय सिनेमा के लिए खतरे की असली घंटी नवंबर 2023 में बजी थी, जब साउथ और बॉलीवुड एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना का एक बेहद डीपफेक वीडियो वायरल हुआ था. उस वीडियो में चेहरा रश्मिका का था जबकि बॉडी किसी और विदेशी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की थी. इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था और केंद्र सरकार के आईटी मंत्रालय को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए सख्त एडवाइजरी जारी करनी पड़ी थी. इसके बाद आलिया भट्ट, कटरीना कैफ और नोरा फतेही जैसी एक्ट्रेसेस के भी मॉर्फ्ड वीडियोज सामने आए जिसने सबको हैरान कर दिया.

समस्या सिर्फ अश्लील या फर्जी वीडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्रांड्स और कारोबार से जुड़ी भी है. सोचिए अगर कोई AI टूल किसी बड़े स्टार की आवाज में किसी घटिया प्रॉडक्ट की तारीफ करने लगे, तो लाखों मासूम फैंस उसे सच मानकर खरीद लेंगे. इससे न केवल आम जनता के साथ बड़ा धोखा होगा, बल्कि उस कलाकार की बरसों की मेहनत और साख भी एक झटके में मिट्टी में मिल जाएगी. यही वजह है कि आज ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ की लड़ाई केवल कॉपीराइट का मामला न रहकर सीधे तौर पर प्राइवेसी, रिस्पेक्ट और डिजिटल सिक्योरिटी का नेशनल मुद्दा बन चुकी है.

AI के गलत इस्तेमाल को लेकर कौन-कौन कोर्ट पहुंचा?

यहां एक बात की समझ होना बहुत जरूरी है कि डीपफेक का शिकार होना और पर्सनैलिटी राइट्स के लिए कोर्ट जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. रश्मिका मंदाना, कटरीना कैफ और आलिया भट्ट जैसे मामलों में ज्यादातर फर्जी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, जो सीधे तौर पर क्रिमिनल और साइबर क्राइम का मामला था. इन मामलों में पुलिस और आईटी नियमों के तहत वीडियो हटवाने और आरोपियों को पकड़ने पर जोर रहा. हर स्टार, जिसके साथ ऐसी छेड़छाड़ हुई, उसने अदालत में जाकर कमर्शियल पर्सनैलिटी राइट्स का दीवानी मुकदमा नहीं ठोका.

दूसरी तरफ कुछ ऐसे दिग्गज सितारे हैं, जिन्होंने अपनी डिजिटल पहचान को बचाने के लिए बकायदा अदालतों का दरवाजा खटखटाया है. इस लिस्ट में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का नाम सबसे आगे है, जिन्होंने साल 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी दी थी कि कोई भी उनकी आवाज, नाम और चेहरे का बिना परमिशन यूज न कर सके. इसके बाद सितंबर 2023 में अनिल कपूर कोर्ट पहुंचे और अपने आइकॉनिक डायलॉग ‘झकास’, अपने बोलने के अंदाज और तस्वीरों के AI क्लोनिंग पर रोक लगवाई. कोर्ट ने उनके पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया था.

साल 2024 में जैकी श्रॉफ भी अपने खास अंदाज ‘भीडू’ और अपने पर्सनैलिटी प्रोटेक्शन के लिए दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे थे, जहां कोर्ट ने बिना परमिशन उनके नाम पर चल रहे AI चैटबॉट्स और मीम्स वाले यूआरएल ब्लॉक करने के आदेश दिए. इसके बाद साल 2025 में ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन ने भी अपनी पहचान के गलत इस्तेमाल के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट से लीगल सिक्योरिटी हासिल की. इन सभी मामलों ने ये पूरी तरह साफ कर दिया है कि मशहूर होने का मतलब ये कतई नहीं है कि कोई भी कंपनी, किसी का चेहरा अपनी जेब भरने के लिए इस्तेमाल कर ले.

दशकों पुराना है Personality Rights का मामला

ज्यादातर लोगों को लगता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई (AI) जैसे टेक्निक आने के बाद ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ वाले मुद्दे खबरों में आने लगे हैं, लेकिन आपको ये जानना कर हैरानी होगी कि ये मामला आज का नहीं, बल्कि सदियों पुराना है. भारत में किसी के पर्सनैलिटी और प्राइवेसी के राइट्स की शुरुआत असल में दशकों पहले हो चुकी थी. इसका सबसे मजबूत मील का पत्थर 7 अक्टूबर 1994 को सुप्रीम कोर्ट का ‘आर. राजगोपाल वर्सेस तमिलनाडु सरकार’ का ऐतिहासिक फैसला बना था. 

इस फैसले में देश की सबसे बड़ी कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 21 के तहत प्राइवेसी के राइट्स को मान्यता दी थी और साफ कहा था कि हर नागरिक को अपनी जिंदगी अकेले और शांति से जीने का पूरा हक है. उस 1994 के फैसले के बाद से ही देश की अदालतों में पब्लिसिटी राइट्स और पर्सनैलिटी राइट्स की परिभाषा धीरे-धीरे मजबूत होती चली गई. 

शुरुआत में ये बहस सिर्फ अखबारों, किताबों और पत्रिकाओं में छपने वाली फोटोज तक तक सीमित थी, लेकिन जैसे-जैसे जमाना बदला, इंटरनेट आया और अब जेनरेटिव एआई का दौर शुरू हुआ, तो अदालतों को भी अपनी पुरानी नजीरों का दायरा बढ़ाकर अमिताभ बच्चन, अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ जैसे मामलों में नए दिशा-निर्देश तय करने पड़े. आज ये साबित हो चुका है कि इंसान की पहचान सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी उतनी ही सिक्योर होनी चाहिए.

इसलिए ये कहना ज्यादा सही होगा कि ये कानूनी लड़ाई दशकों पुरानी है, जिसने वक्त के साथ नया रूप ले लिया है. बुनियादी सवाल 1994 में भी वही था कि किसी व्यक्ति की जिंदगी और पहचान पर उसका अपना हक है या दुनिया का और 2026 में भी सवाल वही है. फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले ये काम प्रिंटिंग प्रेस से होता था. आज सुपर कंप्यूटर और एआई सॉफ्टवेयर के जरिए हो रहा है. तकनीक बदल गई है, लेकिन किसी की पहचान चुराकर फायदा कमाने की इंसानी फितरत आज भी बिल्कुल वैसी ही बनी हुई है.

क्या कभी रुक पाएगा ये सिलसिला, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

टेक्निकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि इंटरनेट की इस अंधी दौड़ में डीपफेक या एआई कंटेंट को बनने से 100 परसेंट रोक पाना लगभग नामुमकिन है. कोई भी शख्स अपने बंद कमरे में बैठकर किसी ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर की मदद से कुछ ही मिनटों में फर्जी वीडियो या आवाज तैयार कर सकता है, लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि हम हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएं. अदालतों के सख्त आदेश, वेबसाइट्स से तुरंत वीडियो हटाने के नियम और एआई कंटेंट पर मैनडेटरी वॉटरमार्क लगाकर इसके नुकसान को काफी हद तक कम जरूर किया जा सकता है.

भारत सरकार ने भी इस खतरे को भांपते हुए आईटी नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही काफी बढ़ा दी है. रश्मिका मंदाना के केस के बाद से इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कंपनियों को सख्त हिदायत दी है कि किसी भी शिकायत के मिलने पर तय समयसीमा के अदंर फर्जी कंटेंट को हटाना होगा. इसके साथ ही अब टेक कंपनियों के लिए ये जरूरी किया जा रहा है कि जो भी फोटो या वीडियो एआई से बनाया गया है, उस पर साफ-साफ ‘AI-generated’ का लेबल लगाया जाए, ताकि लोग किसी भी धोखे या गलतफहमी का शिकार न हो.

कानून अपनी जगह काम करता रहेगा, लेकिन इस लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार आम इंटरनेट यूजर की अपनी समझदारी यानी मीडिया लिटरेसी है. अगर कोई वीडियो बहुत ज्यादा अजीब लगे या किसी स्टार के मुंह से ऐसी बात सुनाई दे, जो उसने कभी नहीं कही, तो उसे तुरंत सच मानकर शेयर करने से बचना चाहिए. अदालतों के कड़े फैसले, सरकारों के सख्त नियम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की मुस्तैदी मिलकर ही इस डिजिटल फ्रॉड पर लगाम लगा सकते हैं. कानून और टेक्नोलॉजी जब एक साथ मिलकर काम करेंगे, तभी किसी की पहचान को सिक्योर रखा जा सकता है.

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About the Author

वंदना सैनी जी न्यूज में सब ए़डिटर हैं और पिछले 11 साल से डिजिटल मीडिया में काम कर रही हैं. कुछ समय तक उन्होंने नेशनल, इंटरनेशनल और पॉलिटिकल बीट पर काम किया. इसके बाद 2018 में उन्होंने इंडिया न्यूज में एंटरटेनमेंट बीट पर काम करना शुरू किया और पिछले 8 साल से लगातार में एंटरटेनमेंट बीट पर काम कर रही हैं. इस दौरान उन्होंने स्मार्ट हिंदुस्तान, पत्रिका और न्यूज 24 जैसे संस्थान के साथ काम किया और पिछले 2 साल से जी न्यूज के साथ काम कर रही हैं. उन्होंने दिल्ली से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद IGNOU से हिंदी में मास्टर्स किया. उन्हें पत्रकारिता के साथ कहानियां लिखने का भी शौक है. आप Vandana.saini@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
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