प्यार का दावा या संपत्ति की राह: राजेश खन्ना की 'विधवा' बनने की हसरत रह गई अधूरी... सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की अनीता आडवाणी की अर्जी!
सुप्रीम कोर्ट ने एक्ट्रेस अनीता आडवाणी की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने दिवंगत कलाकार राजेश खन्ना की विधवा के रूप में मान्यता देने की मांग की थी. अदालत ने डिंपल कपाड़िया के साथ खन्ना का विवाह प्रभावी रहने का हवाला देते हुए इस अपील को कानूनी आधारहीन और लग्जरी लिटिगेशन करार दिया.
बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार दिवंगत राजेश खन्ना की जिदगी से जुड़ा कानूनी विवाद आखिरकार अपने अंजाम तक पहुंच गया है. सुप्रीम कोर्ट ने एक्ट्रेस अनीता आडवाणी की उस याचिका पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने राजेश खन्ना के साथ अपने रिश्ते को शादी जैसा मानने की मांग की थी. जस्टिस एमएम सुंदरेश और प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने इस मामले में सुनवाई का कोई ठोस आधार न पाते हुए इस याचिका को लग्जरी लिटिगेशन (बेवजह की मुकदमेबाजी) करार दिया है.
अनीता आडवाणी ने सुप्रीम कोर्ट से पहले बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया था. हालांकि, हाई कोर्ट ने भी इसी साल 1 अप्रैल को सुनाए गए अपने फैसले में उनकी अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया था. इसके बाद ही उन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी. अनीता की मेन मांग ये थी कि राजेश खन्ना के साथ उनके लंबे रिश्ते को देखते हुए उन्हें एक्टर की विधवा के तौर पर पहचान दी जाए.
डिंपल कपाड़िया से नहीं हुआ था तलाक
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा कानूनी पेच राजेश खन्ना की वैवाहिक स्थिति थी. बॉम्बे हाई कोर्ट की जस्टिस शर्मिला यू. देशमुख की पीठ ने साफ किया था कि किसी भी रिश्ते को शादी जैसा दर्जा देने के लिए दोनों पक्षों का कानूनी रूप से विवाह के योग्य होना बेहद जरूरी है. क्योंकि राजेश खन्ना की एक्ट्रेस डिंपल कपाड़िया के साथ शादी कानूनी रूप से खत्म नहीं हुई थी, इसलिए अनीता आडवाणी का दावा कानून के दायरे में पूरी तरह गलत साबित हुआ.
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का दिया गया हवाला
इस मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने 'डी. वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल' केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए मापदंडों का स्पेशल मेंशन किया. कोर्ट ने कहा कि किसी लिव-इन रिश्ते को विवाह का दर्जा तभी मिल सकता है, जब दोनों पार्टियां पूरी तरह शादीशुदा न हो. कोर्ट के अनुसार, 'माननीय सुप्रीम कोर्ट के बनाए गए टेस्ट से पता चलता है कि इस तरह की अनाउंसमेंट शादी और शादीशुदा रिश्ते के बराबर है और इसलिए इसे वैध शादी के लिए जरूरी टेस्ट भी पूरे करने चाहिए, भले ही फॉर्मल रूप से शादी न हुई हो.'
इन दावों को कोर्ट ने नहीं माना आधार
अनीता आडवाणी ने अपनी दलीलों में कहा था कि वो और राजेश खन्ना कई सालों तक एक ही छत के नीचे साथ रहे, साथ में त्योहार मनाए और समाज के सामने अपने रिश्ते को शादी की तरह ही रखा. हालांकि, हाई कोर्ट ने माना कि महज साथ रहने से कानून के मूल सिद्धांत नहीं बदलते. फैसले में साफ कहा गया, 'मोनोगैमस या पॉलीगैमस लिव-इन रिलेशनशिप के बीच का अंतर डी. वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल (सुप्रा) में बताए गए टेस्ट को पूरा करने से बाहर नहीं किया जा सकता, जो इस मामले में साफ तौर पर पूरा नहीं होता है.'
2015 से खन्ना परिवार पर चल रहा केस
आपके बता दें कि ये पूरा विवाद साल 2015 में शुरू हुआ था, जब अनीता आडवाणी ने राजेश खन्ना की पत्नी डिंपल कपाड़िया, उनकी बेटियों ट्विंकल खन्ना और रिंकी खन्ना, और दामाद अक्षय कुमार (राजीव भाटिया) के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था. सिविल प्रोसीजर कोड (CPC) के तहत शुरुआती अदालत द्वारा केस खारिज किए जाने के बाद अनीता ने अपीलों का सहारा लिया था. आखिर में हाई कोर्ट ने ये कहते हुए अर्जी खारिज कर दी थी, 'पहली अपील में कोई दम नहीं है इसलिए, अपील खारिज की जाती है'. अब सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद इस लंबे कानूनी घटनाक्रम पर पूरी तरह से रोक लग गई है.