Spiritual Cinema 2026: ‘हनुमान अंश’ से 'श्रीमद्भागवत ', ‘तेरा साई’ और खाटू श्याम तक, क्या आस्था बन गई है बॉलीवुड का नया बॉक्स ऑफिस फॉर्मूला?
Spiritual Cinema: क्या साल 2026 में स्पिरिचुअल सिनेमा ने बॉलीवुड का बॉक्स ऑफिस ट्रेंड बदल दिया है? 'हनुमान अंश' की 150 करोड़ की ब्लॉकबस्टर कमाई के बाद अब 'श्रीमद्भागवत', 'साईं बाबा' और 'खाटू श्याम' पर फिल्में बनने जा रही हैं. आइए, ऐसे में जानते हैं कैसे स्टार पावर पर फेथ पावर भारी पड़ रहा है.
Spiritual Cinema: फिल्म 'हनुमान अंश' ने अपनी ब्लॉकबस्टर कमाई की सफलता के तुरंत बाद भारतीय सिनेमा में आध्यात्मिक और धार्मिक कहानियों पर आधारित नई फिल्मों का दौर शुरू हो गया है. संजय मिश्रा स्टारर 'साई बाबा' पर फिल्म 'तेरा भाई' और बाबा खाटू श्याम पर आधारित 'हारे का सहारा बाबा खाटू श्याम हारा' (2027 रिलीज) की घोषणाएं इसका प्रमाण हैं. इसी के साथ आज सागर पिक्चर्स एंटरटेनमेंट ने श्रीमद्भागवत पर आधारित 7 फिल्मों की फ्रेंचाइजी का भी ऐलान किया है.
ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि धार्मिक फिल्में दोबारा क्यों बन रही हैं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या साल 2026 में स्पिरिचुअल सिनेमा को एक नए बॉक्स ऑफिस ट्रेंड में बदल दिया गया है?
क्या 'हनुमान अंश' ने बदला बॉक्स ऑफिस का गणित?
धार्मिक सिनेमा भारतीय दर्शकों के लिए नया नहीं है, लेकिन 'हनुमान अंश' का बॉक्स ऑफिस सफर सबसे अलग रहा. 7 अगस्त 2026 को महज 10 लाख रुपये की मामूली ओपनिंग करने वाली इस फिल्म में न कोई बड़ा स्टार था और न ही कोई भारी प्रमोशन. इसके बावजूद दर्शकों के बीच बढ़ती चर्चा और मजबूत 'वर्ड ऑफ माउथ' के दम पर फिल्म ने 30वें दिन घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपये का विशाल आंकड़ा पार कर लिया है.
क्यों स्टार पावर से बड़ी बन रही है आस्था?
बीते कुछ सालों में भारी-भरकम बजट, बड़े सुपरस्टार्स और भव्य वीएफएक्स बॉलीवुड की मार्केटिंग का मुख्य हिस्सा रहे हैं. हालांकि, 'हनुमान अंश' जैसी फिल्म की सफलता यह साफ इशारा करती है कि दर्शक हर बार केवल विजुअल स्पेक्टेकल देखने थिएटर नहीं आता, बल्कि ऐसी कहानियां भी तलाशता है, जो उसके विश्वास और भावनाओं का हिस्सा बन सकें. नीम करोली बाबा के जीवन और शिक्षाओं पर आधारित यह फिल्म किसी काल्पनिक शक्ति प्रदर्शन के बजाय सीधे दर्शकों के मानवीय और आध्यात्मिक अनुभवों से जुड़ी है.
क्या अब साईं बाबा और खाटू श्याम की बारी है?
‘हनुमान अंश’ के 150 करोड़ क्लब में शामिल होने के बाद साईं बाबा और खाटू श्याम जैसे पूजनीय व्यक्तित्वों पर फिल्मों का ऐलान होना इस चर्चा को और दिलचस्प बनाता है. 5 फरवरी 2027 को रिलीज होने वाली ‘तेरा साईं’ में संजय मिश्रा साईं बाबा की भूमिका में नजर आएंगे, वहीं खाटू श्याम पर फिल्म भी 2027 में सिनेमाघरों में आएगी. मेकर्स अब सिर्फ पौराणिक गाथाओं तक सीमित नहीं रह रहे, बल्कि उन आध्यात्मिक संतों और आस्था केंद्रों की कहानियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिनसे करोड़ों भक्तों का सीधा भावनात्मक जुड़ाव है.
क्या यह सिर्फ धार्मिक सिनेमा की वापसी है?
इसे महज 'धार्मिक फिल्मों की वापसी' कहना इस बड़े बदलाव को छोटा करके देखना होगा. स्पिरिचुअल सिनेमा का दायरा काफी बड़ा है, जिसमें भगवान, संत, गुरु, भक्त और आस्था से जुड़ी कहानियों के साथ-साथ ऐसी फिल्में भी शामिल हैं, जो भारतीय दर्शन, विश्वास और गहरे आध्यात्मिक अनुभवों को केंद्र में रखती हैं.
क्या 2026 ने बदल दिया सफलता का फार्मूला?
हालांकि, एक फिल्म के आधार पर पूरे इंडस्ट्री ट्रेंड का अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन आस्था से जुड़ी कहानियों को लेकर मेकर्स का आत्मविश्वास जरूर बढ़ा है. अगर आने वाली आध्यात्मिक फिल्मों को भी दर्शकों का वैसा ही प्यार मिलता है जैसा ‘हनुमान अंश’ को मिला, तो बॉलीवुड की बॉक्स ऑफिस प्लानिंग में एक नया फैक्टर स्थायी रूप से जुड़ जाएगा, 'स्टार पावर' के साथ 'फेथ पावर'. ऐसे में 2026 को सिर्फ बड़े बजट की फिल्मों का साल नहीं, बल्कि उस दौर के रूप में याद रखा जाएगा, जब आस्था ने खुद को एक नए सिनेमाई स्टार के रूप में स्थापित किया.
क्या ‘हनुमान अंश’ अकेली ब्लॉकबस्टर है?
'हनुमान अंश' की असाधारण सफलता को महज एक इत्तेफाक मानना गलत होगा. गुजराती फिल्म 'लालो – कृष्ण सदा सहायते' ने भी मात्र ₹50 लाख के मामूली बजट में करीब ₹120 करोड़ की ऐतिहासिक कमाई कर सभी को हैरान कर दिया. बिना किसी बड़े स्टार के, केवल आस्था, बेहतरीन कहानी और दर्शकों की तारीफ (Word of Mouth) के दम पर इन फिल्मों ने रीजनल सिनेमा से लेकर हिंदी सिनेमा तक एक बड़े दर्शक व्यवहार में आ रहे बदलाव की ओर इशारा किया है.
क्या स्पिरिचुअल सिनेमा की पहुंच सिर्फ धार्मिक दर्शकों तक है?
स्पिरिचुअल सिनेमा का मतलब सिर्फ भगवान पर फिल्में बनाना नहीं है. इसमें संत, गुरु, जीवन दर्शन, आस्था, आत्मिक यात्रा और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ी गहरी कहानियां भी शामिल हैं, जो समाज के हर वर्ग और सोच के दर्शकों को खुद से जोड़ती हैं.
क्या अब बॉलीवुड से स्टार पावर खत्म हो रही है?
यह कहना जल्दबाजी होगी कि आस्था ने स्टार पावर को पूरी तरह रिप्लेस कर दिया है. बड़े सितारे आज भी शुरुआती ओपनिंग और दर्शकों में उत्सुकता पैदा करने का सबसे मजबूत जरिया हैं. हालांकि, 'हनुमान अंश' जैसी फिल्मों ने साबित किया है कि बिना बड़े चेहरे के भी मजबूत कंटेंट और इमोशनल कनेक्ट के सहारे फिल्म लंबे समय तक थिएटर में दर्शकों को खींच सकती है.
क्या मेकर्स को नया ऑडियंस मार्केट मिल गया है?
'हनुमान अंश' की लंबी थियेट्रिकल रन के बाद लगातार आध्यात्मिक विषयों पर फिल्मों की घोषणाएं होना कोई संयोग नहीं है. संजय मिश्रा अभिनीत फिल्म 'तेरा साई' 5 फरवरी 2027 को रिलीज के लिए लिस्टेड है, वहीं 'श्रीमद्भागवतम' को सात हिस्सों की एक बड़ी सिनेमैटिक फ्रेंचाइजी के रूप में विकसित करने की योजना सामने आई है.
क्या 2026 के बाद भी यह क्रेज बरकरार रहेगा?
इस स्पिरिचुअल सिनेमाई दौर की असली परीक्षा 2027 में होगी. यदि 'तेरा साई', 'खाटू श्याम' और 'श्रीमद्भागवतम' जैसे आगामी प्रोजेक्ट्स दर्शकों को थिएटर्स तक लाने में सफल होते हैं, तो यह साबित हो जाएगा कि 'हनुमान अंश' कोई अकेली सफलता नहीं थी, बल्कि दर्शकों की बदलती पसंद की शुरुआत थी. इससे बॉलीवुड की प्रोडक्शन और मार्केटिंग रणनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
जी न्यूज ने फिल्म क्रिटिक अमित भाटिया से इस मामले पर बात की और कई मुद्दों पर उनकी राय ली. हमने उनसे पूछा कि क्या आपको 2026 में स्पिरिचुअल सिनेमा का एक नया ट्रेंड उभरता हुआ दिखाई दे रहा है? इस पर उन्होंने जवाब दिया-
स्पिरिचुअल सिनेमा का एक नया ट्रेंड उभरता हुआ नजर आ रहा है. जो कहीं-कहीं तो सक्सेसफुल है, लेकिन कहीं-कहीं राम नाम की लूट है. अंजली अरोड़ा भी अब सीता बनी हुई हैं. बहुत खराब ‘रामायण’ और ‘हनुमान अंश’ सक्सेसफुल रही, लेकिन उससे पहले भी नीम करोली बाबा पर एक फिल्म आई थी, जो बहुत खराब बनी हुई थी. अब ये हो रहा है कि हर कोई बहती गंगा में अपने हाथ धोना चाहता है. राम नाम की लूट मची है और हर कोई इसे लूटना चाहता है.
लेकिन यहां पर भी अच्छा रामायण चल रहा है, बुरा नहीं चल रहा है. ‘रामायण’ का ट्रेलर कितना क्रिटिसाइज हुआ. बाबा की कृपा पहले वाली फिल्म पर भी हो सकती थी, लेकिन वो फिल्म अच्छी नहीं थी और दूसरी वाली ‘हनुमान अंश’ अच्छी थी. तो ट्रेंड है, लेकिन हमारे यहां क्या है कि ट्रेंड को पूरी तरह निचोड़ दिया जाता है.
अमित भाटिया से आगे पूछा कि क्या भारतीय दर्शकों के लिए स्पिरिचुअल सिनेमा अब सिर्फ धार्मिक कहानी नहीं, बल्कि एक बड़ा थिएटर एक्सपीरियंस बन रहा है? उन्होंने जवाब दिया-
थिएटर एक्सपीरियंस बिल्कुल है. जैसे ‘महाअवतार नरसिम्हा’ आई थी, तो उसमें कमाल के VFX थे, जिसे देखने में काफी मजा आया था. हम लोग कहानियों को एन्जॉय करते हैं, बच्चों को दिखाते हैं. बहुत आसान होता है बच्चों को VFX के जरिए समझाने में. बाबा नीम करोली की फिल्म अगर बड़े पर्दे पर देखने को मिलती है, तो अच्छा लगता है.
एक्सपीरियंस तो है, लेकिन हमारे यहां दिक्कत है कि एक्सपीरियंस को किल कर दिया जाता है और ओवर कर दिया जाता है. जैसे अब ‘रामायण’ ही इतनी सारी बन रही हैं. अगर एक्सपीरियंस को एक्सपीरियंस तक रहने दिया जाएगा, तो मजा आएगा, लेकिन अगर उसे ओवरडू कर दिया जाएगा, जो कि मुझे लग रहा है अब हो रहा है.
अमित भाटिया से आगे पूछा कि ‘हनुमान अंश’ करीब 2 करोड़ के बजट और बिना बड़े स्टार के शुरू हुई, लेकिन word of mouth के दम पर 150 करोड़ पार कर गई. क्या यह संकेत है कि आज धार्मिक फिल्मों में स्टार से ज्यादा आस्था और कहानी बिक रही है? उन्होंने जवाब दिया-
सिर्फ धार्मिक फिल्मों में ही नहीं, दूसरी फिल्मों में भी स्टार की वैल्यू नहीं रही. स्टार आपको ओपनिंग दिलवा सकता है, जैसे यश ने अपने स्टारडम से फिल्म ‘टॉक्सिक’ को ओपनिंग दिलवा दी, लेकिन फिल्म कमजोर थी तो उसके बाद फिल्म बैठ गई. तो ऐसा सिर्फ धार्मिक फिल्मों के साथ ही नहीं है, किसी भी जॉनर में फिल्म अच्छी है, अगर आपकी फिल्म अच्छी है तो चलेगी, वरना नहीं चलेगी.
फिर चाहे आप बड़े से बड़े स्टार को ले आएं. सलमान खान ‘सिकंदर’ में आए, फिल्म कमजोर थी, नहीं चली. ऐसी बहुत सारी फिल्में हैं, जिनमें बड़े स्टार की फिल्में नहीं चलीं और छोटे स्टार की फिल्में चल गईं.
फिल्म क्रिटिक अमित भाटिया से आगे पूछा क्या 2026 में स्पिरिचुअल सिनेमा एक नए कमर्शियल ट्रेंड के रूप में उभर रहा है? ‘हनुमान अंश’ की सफलता को आप इस बदलाव से कैसे जोड़कर देखते हैं? उन्होंने जवाब दिया-
बिल्कुल कमर्शियल हो रहा है, जैसा कि हमने देखा, हर कोई रामायण बनाने की कोशिश कर रहा है, हर कोई बाबाओं पर फिल्म बनाना चाहता है. हर किसी को लगता है कि अगर हम धार्मिक फिल्म बना देंगे तो लोग उसे ट्रोल नहीं करेंगे. लेकिन ऐसा नहीं है, ‘रामायण’ की फिल्म काफी ट्रोल भी हुई. लोगों ने कहा कि हमें VFX पसंद नहीं आए, और कुछ लोगों को पसंद भी आए. तो जाहिर तौर पर कमर्शियलाइजेशन है और हमारे यहां हर चीज का कमर्शियलाइजेशन हो जाता है. यही हम सिनेमा को हरा देते हैं और सिनेमा दम तोड़ देता है.
फिल्म क्रिटिक अमित भाटिया से आगे पूछा ‘श्रीमद्भागवत’ और ‘खाटू श्याम’ जैसे बड़े स्पिरिचुअल प्रोजेक्ट्स के बीच क्या आपको लगता है कि 2026 के बाद स्पिरिचुअल सिनेमा बॉलीवुड का एक मजबूत थिएट्रिकल स्पेस बन सकता है? उन्होंने जवाब दिया-
स्पिरिचुअल प्रोजेक्ट्स का जो थिएट्रिकल स्पेस है, वो पहले से मजबूत रहा है. ऐसा नहीं है कि अब बना है, लेकिन बात वही है कि चलेगा वही जो अच्छा होगा. सिर्फ आप भगवान के नाम पर फिल्म बना देंगे, तो नहीं चलेगी.
देखिए, मोदी जी की कितनी फैन फॉलोइंग है, लेकिन विवेक ओबेरॉय ने मोदी का किरदार निभाया, वो फिल्म नहीं चली. लेकिन ‘धुरंधर 2’ में मोदी जी थोड़े सेकंड के लिए नजर आए और वो चल गई, क्योंकि वो फिल्म मजबूत थी, वो फिल्म देश की बात कर रही थी.
बाबा नीम करोली पर इससे पहले एक और फिल्म आई थी, लेकिन उसकी कोई चर्चा नहीं है, क्योंकि वो फिल्म कमजोर थी. तो मजबूत थिएट्रिकल स्पेस बिल्कुल बन सकता है, लेकिन अगर आपने प्रोडक्शन क्वालिटी, स्क्रिप्ट पर मेहनत की, उसे अच्छा ट्रीटमेंट दिया, अच्छे तरीके से बनाया, ये नहीं है कि आपने कुछ भी बना दिया, तो फिर वहां पर वो चीज नहीं चलेगी.
हमारे यहां पर दिक्कत ये होती है कि हम एक चीज को इतना ज्यादा इस्तेमाल कर लेते हैं. उम्मीद है कि अच्छे लोग इन फिल्मों को बनाएं.