साउथ फिल्मों का हिंदी रीमेक: कैसे मोहनलाल की फिल्मों से बॉलीवुड ने कमाए करोड़ों? ‘भूल भुलैया’ से लेकर ‘गरम मसाला’ की इनसाइड स्टोरी
South Movies Bollywood Remakes: अजय देवगन की ‘दृश्यम 3’ रिलीज होते ही बॉलीवुड और साउथ फिल्मों की पुरानी साझेदारी पर चर्चा तेज हो गई है. मोहनलाल की कालजयी मलयालम कहानियों ने ‘हंगामा’, ‘भूल भुलैया’ और ‘गरम मसाला’ बनकर हिंदी सिनेमा को नई दिशा दी. जानें कैसे रीमेक का ये दशकों पुराना खेल अब पूरी तरह बदल चुका है.
अजय देवगन की हालिया रिलीज ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ के सिनेमाघरों में आने के साथ ही बॉलीवुड और साउथ सिनेमा के रिश्ते पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में साउथ फिल्मों की कहानियों को दोबारा अपने अंदाज में ढालने का चलन कोई नया नहीं है, बल्कि ये सिलसिला कई दशकों से चला आ रहा है. ‘दृश्यम’ से लेकर ‘गजनी’, ‘सिंघम’ और ‘कबीर सिंह’ जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर ये साबित किया कि एक मजबूत कहानी और स्टारकास्ट का चुनाव किसी भी भाषा की ऑडियंस का दिल जीत सकती है.
हालांकि, ये भी जरूरी नहीं कि हर रीमेक फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सक्सेस ही मिले. कई बड़ी और मेगा बजट साउथ फिल्मों के हिंदी रीमेक टिकट खिड़की पर ऑडियंस को खींचने में पूरी तरह नाकाम भी रहीं. इस पूरे ट्रेंड में मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार मोहनलाल की फिल्मों का योगदान सबसे खास और बड़ा माना जाता है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि उनकी कई क्लासिक फिल्मों को बॉलीवुड में नए कलेवर के साथ पेश किया गया, जिनमें ‘हंगामा’, ‘गरम मसाला’, ‘क्योंकि...’, ‘खट्टा मीठा’, ‘भूल भुलैया’ और ‘दृश्यम’ जैसी बड़ी फिल्में शामिल हैं.
साउथ फिल्मों के हिंदी रीमेक से कमाए करोड़ों
पुराने दौर में आज की तरह इंटरनेट या ओटीटी प्लेटफॉर्म नहीं थे, इसलिए आम हिंदी ऑडियंस की पहुंच सीधे रीजनल सिनेमा तक बहुत सीमित हुआ करती थी. ऐसे माहौल में किसी सुपरहिट मलयालम कहानी को जाने-माने हिंदी सितारों और नॉर्थ इंडियन माहौल में ढालकर पेश करना फिल्ममेकर्स के लिए सबसे सिक्योर और फायदे का सौदा बन जाता था. फिर भी हर फिल्म बाजी नहीं मार सकी. जहां ‘खट्टा मीठा’ अपनी ओरिजनल फिल्म जैसी सक्सेस दोहराने में नाकाम रही. वहीं, ‘हंगामा’ और ‘भूल भुलैया’ ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचा.
मोहनलाल-प्रियदर्शन की जोड़ी से बॉलीवुड को मिली कई कहानियां
मलयालम फिल्मों के सुपरस्टार मोहनलाल उन चुनिंदा कलाकारों में गिने जाते हैं, जिनके अभिनय और कहानियों ने भाषा की हर दीवार को तोड़ा. चाहे गुदगुदाने वाली कॉमेडी हो, फैमिली रिश्तों का ताना-बाना हो या फिर दिमाग घुमा देने वाली सस्पेंस थ्रिलर, उनके बनाए रास्ते पर पूरा भारतीय सिनेमा चला. उनकी कई शानदार फिल्मों को बाद में हिंदी में नए चेहरों के साथ बड़े पर्दे पर उतारा गया और ऑडियंस ने उन्हें भरपूर प्यार दिया.
इस पूरे सफर में मशहूर फिल्म डायरेक्टर प्रियदर्शन का नाम सबसे ऊपर आता है. प्रियदर्शन और मोहनलाल की जोड़ी ने मलयालम सिनेमा में एक से बढ़कर एक हिट फिल्में दी थीं. सालों बाद प्रियदर्शन ने खुद अपनी ही बनाई उन क्लासिक कहानियों को हिंदी ऑडियंस की पसंद के मुताबिक रीमेक करने का फैसला किया. ‘बोइंग बोइंग’ से ‘गरम मसाला’ बनाना हो, ‘थलवट्टम’ से ‘क्योंकि...’ बनाना हो या फिर ‘वेल्लानाकालुडे नाडु’ को ‘खट्टा मीठा’ बनाना हो.
यानी हिंदी सिनेमा में मोहनलाल की कहानियों का सफर महज ‘दृश्यम’ तक का नहीं है. ये रिश्ता बहुत पुराना और गहरा है. प्रियदर्शन ने जब इन फिल्मों को हिंदी में बनाया, तो उन्होंने कलाकारों की टोली, डायलॉग्स, लोकेशन और कॉमेडी की टाइमिंग में कई नए रंग भरे, लेकिन कहानी की ओरिजनलिटी को जस का तस रखा. यही वजह रही कि 2000 के दशक में जिन फिल्मों पर थिएटर में लोग ठहाके लगाते थे, उनमें से ज्यादातर पुरानी मलयालम फिल्मों की रीमेक थीं.
‘पूचक्कोरु मूक्कुथी’ से बनी कॉमेडी फिल्म ‘हंगामा’
इस लंबे सिलसिले की शुरुआत साल 1984 में आई मलयालम फिल्म ‘पूचक्कोरु मूक्कुथी’ से मानी जाती है. खास बात ये है कि बतौर डायरेक्टर प्रियदर्शन की ये पहली ही फिल्म थी, जिसने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया था. इस फिल्म में मोहनलाल के साथ शंकर, मेनका, एम.जी. सोमन और नेदुमुदी वेणु जैसे दिग्गज कलाकार नजर आए थे. पूरी कहानी झूठी पहचान, छोटे-छोटे झूठ और एक के बाद एक पैदा होने वाली मजेदार गलतफहमियों के इर्द-गिर्द घूमती थी.
फिल्म के मेन प्लॉट में एक ही नाम वाली दो महिलाओं की प्रेजेंस से ऐसी गजब की उलझन पैदा होती है, जो ऑडियंस को बड़े पर्दे पर आखिर तक बांधे रखती है. इस कहानी की जबरदस्त सक्सेस के बाद इसे दूसरी भाषाओं में भी बनाया गया. सालों बाद प्रियदर्शन ने खुद इस सुपरहिट आइडिया को हिंदी में लाने का फैसला किया और साल 2003 में रिलीज हुई फिल्म ‘हंगामा’, जिसमें अक्षय खन्ना, आफताब शिवदासानी, रिमी सेन और परेश रावल लीड रोल में नजर आए थे.
‘पूचक्कोरु मूक्कुथी’ की हिंदी रीमेक ‘हंगामा’ एक बड़ी सक्सेस फिल्म बन गई, जिसने अपनी जबरदस्त कॉमिक टाइमिंग से ऑडियंस को लोटपोट कर दिया. बॉक्स ऑफिस पर ये फिल्म बड़ी हिट साबित हुई, लेकिन फिल्म इतिहास के पन्ने बताते हैं कि इस कहानी की जड़ें सिर्फ मलयालम तक ही सीमित नहीं थीं. रिपोर्ट्स के मुताबिक ओरिजनल मलयालम फिल्म की कहानी पर चार्ल्स डिकेंस के फेमस प्ले ‘द स्ट्रेंज जेंटलमैन’ और पुराने इंडियन प्ले का भी गहरा असर था.
‘बोइंग बोइंग’ के आइडिया से तैयार हुआ ‘गरम मसाला’
इसके बाद प्रियदर्शन और मोहनलाल की जोड़ी ने साल 1985 में एक और धमाकेदार कॉमेडी फिल्म दी, जिसका नाम था ‘बोइंग बोइंग’. इस फिल्म में मोहनलाल के साथ मुकेश, एम.जी. सोमन, जगती श्रीकुमार और लिजी लीड रोल में थीं. फिल्म की कहानी श्याम नाम के एक ऐसे चालाक लड़के के इर्द-गिर्द बुनी गई थी, जो एक ही समय पर तीन अलग-अलग एयर होस्टेस को डेट करता है और उनके उड़ानों के समय के हिसाब से अपनी जिंदगी का टाइम टेबल संभालता है.
जैसे ही उसका एक पुराना दोस्त घर में दाखिल होता है और हालात बेकाबू होने लगते हैं, उसका बनाया हुआ पूरा प्लान ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता है. इस फिल्म को मलयालम सिनेमा के इतिहास की सबसे बेहतरीन और टाइमलेस कॉमेडी फिल्मों में गिना जाता है. इसके करीब 20 साल बाद यानी 2005 में प्रियदर्शन ने इसी मजेदार फॉर्मूले को हिंदी फिल्म ‘गरम मसाला’ में बड़े स्केल पर इस्तेमाल किया.
हिंदी फिल्म में अक्षय कुमार और जॉन अब्राहम के साथ परेश रावल, रिमी सेन और नेहा धूपिया लीड रोल में थे. ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही और इसने अक्षय कुमार को कॉमेडी किंग के तौर पर नई ऊंचाई दी. हालांकि, अगर इसके इतिहास को देखें, तो 1985 की मलयालम ‘बोइंग बोइंग’ खुद मार्क कैमोलेटी के 1960 के मशहूर फ्रेंच प्ले ‘बोइंग-बोइंग’ से इंस्पायर थी. इसलिए ‘गरम मसाला’ भले ही मलयालम का रीमेक हो, लेकिन इसकी बुनियाद फ्रेंच प्ले से थी.
मोहनलाल की ‘थलवट्टम’ और सलमान-करीना की ‘क्योंकि...’
साल 1986 में प्रियदर्शन ने एक बेहद इमोशनल और सीरियस फिल्म बनाई थी, जिसका नाम था ‘थलवट्टम’. इस फिल्म में मोहनलाल ने विनोद नाम के एक ऐसा रोल प्ले किया था, जिसकी जिंदगी एक हादसे के बाद पूरी तरह बदल जाती है. उनके साथ फिल्म में कार्तिका, लिजी और एम.जी. सोमन नजर आए थे. अपनी प्रेमिका अनिता की अचानक मौत के बाद विनोद अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है और उसे एक मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती कराया जाता है.
अस्पताल के माहौल में डॉक्टर सवित्री और डॉक्टर उन्नीकृष्णन विनोद को ठीक करने की जी-तोड़ कोशिश करते हैं. इसी इलाज के दौरान सवित्री और विनोद के बीच एक गहरा और जज्बाती रिश्ता पनपने लगता है. मगर सवित्री के पिता इस रिश्ते के सख्त खिलाफ होते हैं और कहानी एक बेहद दर्दनाक और रुला देने वाले मोड़ पर खत्म होती है. आज भी ये फिल्म अपने समय की सबसे बड़ी इमोशनल हिट फिल्मों में से एक मानी जाती है.
लगभग 19 साल बाद 2005 में प्रियदर्शन ने इसकी हिंदी रीमेक बनाई थी ‘क्योंकि...’, जिसमें सलमान खान, करीना कपूर, जैकी श्रॉफ, सुनील शेट्टी और ओम पुरी लीड रोल में नजर आए थे. सलमान का निभाया आनंद और करीना की डॉक्टर तन्वी उसी दर्द भरे रिश्ते को पर्दे पर जीते दिखे. इतिहास के हिसाब से ‘थलवट्टम’ भी केन केसी के नॉवेल पर बनी 1975 की हॉलीवुड फिल्म ‘वन फ्लू ओवर द कुकूस नेस्ट’ से काफी हद तक इंस्पायर थी.
‘सनमनस्सुल्लावर्क्कु समाधानम’ से बनी ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’
साल 1986 में ही मलयालम सिनेमा में एक और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर दस्तक दी थी, जिसका नाम था ‘सनमनस्सुल्लावर्क्कु समाधानम’. इसका डायरेक्शन सत्यन अंतिक्कड़ ने किया था और लीड रोल में एक बार फिर मोहनलाल नजर आए थे. उनके साथ कार्तिका और श्रीनिवासन भी अहम रोल में थे. फिल्म की कहानी गोपालकृष्ण पनिक्कर नाम के एक कर्जदार मकान मालिक की थी, जो अपने सारे कर्ज चुकाने के लिए शहर में मौजूद अपना पुश्तैनी मकान बेचना चाहता है.
मुसीबत तब खड़ी हो जाती है, जब उस घर में रहने वाले जिद्दी किरायेदार किसी भी कीमत पर मकान खाली करने को तैयार नहीं होते. किरायेदारों को घर से बाहर निकालने के लिए गोपालकृष्ण जो अजीबोगरीब हथकंडे अपनाता है, उससे जबरदस्त ड्रामा और कॉमेडी पैदा होती है. ये फिल्म टिकट खिड़की पर बहुत बड़ी हिट साबित हुई, जिसके बाद इसके ऊपर अलग-अलग भाषाओं में कई रीमेक फिल्में बनी थी, जिनमें से कुछ बॉक्स ऑफिस पर चलीं और कुछ नाकाम रहीं.
साल 2001 में इसी फिल्म का हिंदी रीमेक लाया गया, जिसका नाम ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’, जिसका डायरेक्शन प्रियदर्शन ने ही किया था और इसमें सुनील शेट्टी, महिमा चौधरी और परेश रावल लीड रोल में नजर आए थे. सुनील शेट्टी का किरदार दयाशंकर अपने पिता के गुजरने और बहनों की शादी के कर्ज के बोझ तले दबा रहता है. ऑफिशियल रिकॉर्ड बताते हैं कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उस लेवल पर कमाई नहीं कर पाई थी, जितनी 1986 में मलयालम फिल्म ने की थी.
‘वेल्लानाकालुडे नाडु’ से निकली ‘खट्टा मीठा’
इसके बाद 1988 में रिलीज हुई ‘वेल्लानाकालुडे नाडु’ आम कॉमेडी फिल्मों से काफी अलग थी, क्योंकि इसमें सिर्फ हंसाने का मकसद नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था और फैले भ्रष्टाचार पर करारा वार किया गया था. प्रियदर्शन के डायरेक्शन और श्रीनिवासन के धारदार स्क्रीनप्ले से सजी इस फिल्म में मोहनलाल, शोभना और खुद श्रीनिवासन लीड रोल में नजर आए थे. मोहनलाल ने इसमें सी. पवित्रन यानी सीपी नाम के एक छोटे और परेशान कंस्ट्रक्शन ठेकेदार का रोल प्ले किया था.
कहानी में दिखाया गया था कि कैसे एक सीधा-साधा ठेकेदार सरकारी बाबुओं, रिश्वतखोरी और सिस्टम की सड़ांध में फंसकर पिसता चला जाता है. कहानी में घटिया निर्माण की वजह से एक नए पुल के गिरने जैसी गंभीर घटना भी शामिल थी, जिसके बीच में सीपी की पुरानी लवर राधा एक सख्त म्युनिसिपल अधिकारी बनकर लौटती है. फिल्म ने समाज के कड़वे सच को बेहद सादगी और असरदार ढंग से बड़े पर्दे पर उजागर किया था.
साल 2010 में प्रियदर्शन ने इसे हिंदी रीमेक फिल्म ‘खट्टा मीठा’ के नाम से बनाया, जिसमें अक्षय कुमार और तृषा लीड रोल में थे. अक्षय ने सचिन तिचकुले का रोल किया और ओरिजनल कहानी के सरकारी सिस्टम वाले मुद्दे को हिंदी सिनेमा के तड़क-भड़क वाले अंदाज में पेश किया गया. हालांकि, ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर वैसी कमाई नहीं कर सकी जैसी उम्मीद थी. भले ही फिल्म सिनेमाघरों में एवरेज रही, लेकिन सालों बाद इसके कॉमिक सीन और डायलॉग पर खूब मीम्स बने.
कल्ट क्लासिक ‘मनिचित्राथाजू’ से बनी सुपरहिट ‘भूल भुलैया’
जब भी मोहनलाल की ऐसी फिल्मों की बात होती है, जिनका असर हिंदी सिनेमा पर सबसे गहरा रहा, तो 1993 की ‘मनिचित्राथाजू’ का नाम सबसे पहले आता है. फेमस डायरेक्टर फाजिल के डायरेक्शन में बनी इस साइकोलॉजिकल हॉरर फिल्म में मोहनलाल, शोभना और सुरेश गोपी ने कमाल का काम किया था. शोभना ने गंगा और नागवल्ली के साइकोलॉजिकल रोल को इतने बेमिसाल तरीके से निभाया कि उन्हें इसके लिए बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला.
ये फिल्म न केवल बॉक्स ऑफिस पर उस साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई, बल्कि इसने पूरे एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के लिए मनोरंजन के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी जीता और इसे भारतीय सिनेमा की कल्ट फिल्मों में गिना गया. इस बेजोड़ साइकोलॉजिकल सस्पेंस की मांग इतनी ज्यादा थी कि इसे तमिल में ‘चंद्रमुखी’ और कन्नड़ में ‘अप्तमित्र’ समेत कई भाषाओं में बनाया गया. हिंदी में प्रियदर्शन ने इसे साल 2007 में ‘भूल भुलैया’ के नाम से लोगों के सामने पेश किया.
अक्षय कुमार, विद्या बालन, शाइनी आहूजा और अमीषा पटेल स्टारर ‘भूल भुलैया’ ने बॉक्स ऑफिस पर धमाकेदार कमाई की. अक्षय के साइकेट्रिस्ट वाले किरदार और विद्या बालन की मंजुलिका ने ऑडियंस के रोंगटे खड़े कर दिए. प्रियदर्शन ने ओरिजनल फिल्म के दिमागी डर को हिंदी के हल्के-फुल्के कॉमेडी के साथ बड़ी खूबसूरती से मिलाया था. आगे चलकर ये फिल्म बॉलीवुड की एक बहुत बड़ी और इंडिपेंडेंट फ्रेंचाइजी बन गई और अब तक इसकी 3 फिल्में आ चुकी हैं.
‘दृश्यम’ का वो दौर, जिसने रीमेक को बना दिया ब्रांड
साल 2013 में डायरेक्टर जीतू जोसेफ की मलयालम फिल्म ‘दृश्यम’ रिलीज हुई, जिसमें मोहनलाल ने जॉर्जकुट्टी का यादगार किरदार निभाया. परिवार को पुलिस से बचाने की इस कहानी को पूरे देश में खूब पसंद किया गया. साल 2015 में दिवंगत डायरेक्टर निशिकांत कामत ने इसका हिंदी रीमेक बनाया, जिसमें अजय देवगन विजय सालगांवकर बने. फिल्म सुपरहिट रही और आगे चलकर ‘दृश्यम 2’ आई. इस फिल्म ने ओरिजनल मलयालम वर्जन और हिंदी रीमेक ने भी रिकॉर्डतोड़ कमाई की.
ये फ्रेंचाइजी भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा रीमेक ब्रांड बन गई. हालांकि, साल 2026 में इस फ्रेंचाइजी के तीसरे पार्ट में एक बड़ा मोड़ आया, जब मोहनलाल और अजय देवगन के रास्ते अलग हो गए. 21 मई 2026 को जीतू जोसेफ की मलयालम ‘दृश्यम 3’ रिलीज हुई, जिसमें जॉर्जकुट्टी की कहानी आगे बढ़ी. वहीं, 2 अक्टूबर को अभिषेक पाठक और अजय देवगन की हिंदी फिल्म ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ आई. मेकर्स ने पहले ही बता दिया था कि इसकी कहानी अलग होगी और ये लास्ट होगी.
सिनेमा के इतिहास में ऐसा रीमेक एक्सपेरिमेंट पहले कभी देखने को नहीं मिला. फिल्म इस समय बॉक्स ऑफिस पर छप्परफाड़ कमाई कर रही है. इसने रिलीज होते ही महज दो दिनों के अंदल 100 करोड़ का बड़ा आंकड़ा पार कर लिया. मेकर्स ने एक ही कहानी को दो अलग-अलग भाषाओं में बिल्कुल नए और चौंकाने वाले क्लाइमैक्स के साथ पेश किया. इस दांव ने साबित कर दिया कि ‘विजय सालगांवकर’ अब सिर्फ ‘जॉर्जकुट्टी’ की नकल भर नहीं रहे. उन्होंने पर्दे पर खुद की अलग और दमदार पहचान बना ली.
आखिर क्यों बदल गया बॉलीवुड का पुराना रीमेक फॉर्मूला?
सिनेमा की दुनिया में अब बड़ा बदलाव आ चुका है. पहले किसी हिट साउथ फिल्म का हिंदी में रीमेक बना लेना काफी सिक्योर माना जाता था, क्योंकि ज्यादातर लोग ओरिजनल फिल्म नहीं देख पाते थे. मगर अब दौर बदल चुका है. इंटरनेट, हिंदी डबिंग और ओटीटी के जरिए हर भाषा का नया सिनेमा रिलीज होते ही सीधे ऑडियंस के मोबाइल और टीवी तक पहुंच जाता है. ऐसे में लोग पहले ही ओरिजनल फिल्म देख लेते हैं. इसलिए अब पुराने फॉर्मूले और रीमेक से ऑडियंस को लुभाना पहले जितना आसान नहीं रहा.
मोहनलाल की फिल्मों का रिकॉर्ड साफ दिखाता है कि केवल सुपरहिट कहानी चुन लेने से सक्सेस पक्की नहीं होती. डायरेक्टर प्रियदर्शन ने जब ‘हंगामा’ और ‘गरम मसाला’ बनाईं, तो उन्होंने हिंदी ऑडियंस की पसंद को बखूबी पकड़ा और फिल्में ब्लॉकबस्टर रहीं. वहीं, दूसरी तरफ ‘खट्टा मीठा’ वैसी पुरानी चमक पर्दे पर नहीं ला सकी. साफ है कि आज के दौर में बिना सोचे-समझे सिर्फ कहानी की नकल उतारना फिल्म मेकर्स के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है. ऑडियंस को बांधने के लिए नयापन जरूरी है.
ऐसे माहौल में हिंदी ‘दृश्यम 3’ का ओरिजनल कहानी से अलग रास्ता चुनना पूरे बॉलीवुड के लिए एक बड़ा सबक है. ये साफ मैसेज देता है कि किसी फ्रेंचाइजी को लंबे समय तक जिंदा रखने के लिए आखिरकार अपनी खुद की ओरिजनल सोच और नई कहानी लानी ही पड़ती है. मोहनलाल के क्लासिक सिनेमा से शुरू होकर आज की नई ‘दृश्यम’ तक का ये पूरा सफर केवल फिल्मों की लिस्ट नहीं है, बल्कि ये बदलते भारतीय ऑडियंस और अपनी पहचान तलाशते हिंदी सिनेमा का एक बेहद दिलचस्प दस्तावेज है.