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Rajesh Khanna Stardom: राजेश खन्ना को भारतीय सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा जाता है. आज के दौर में किसी स्टार की फैन फॉलोइंग देखकर हम जिस तरह सुपरस्टारडम को समझते हैं, राजेश खन्ना ने उसका एक अलग ही पैमाना बनाया था. उनके स्टार बनने की कहानी 1968 से नहीं बल्कि 1969 की 'आराधना' से असली रफ्तार पकड़ती है. 1968 की 'श्रीमान जी' में उनका सिर्फ गेस्ट अपीयरेंस था. इसके बाद 'आराधना' ने उनकी किस्मत ही बदल दी.
फिल्मफेयर के मुताबिक, राजेश खन्ना ने 1969 से 1971 के बीच लगातार 15 हिट फिल्में दीं. यही वह रिकॉर्ड है जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े स्टारडम वाले दौर में पहुंचाया. कई सोर्स 'अंदाज' और 'मर्यादा' जैसी मल्टी-स्टारर फिल्मों को भी जोड़कर इस सिलसिले को 17 लगातार सफल फिल्मों तक बताते हैं.
राजेश खन्ना के करियर में 1969 किसी टर्निंग पॉइंट से कम नहीं था. इस साल 'डोली', 'इत्तेफाक', 'आराधना', 'दो रास्ते' और 'बंधन' जैसी फिल्में आईं. इनमें 'आराधना' सबसे बड़ी गेमचेंजर साबित हुई. 'आराधना' में राजेश खन्ना ने अरुण और सूरज का डबल रोल किया. शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी और फिल्म के गानों ने दर्शकों पर गहरा असर डाला. 'मेरे सपनों की रानी' और 'रूप तेरा मस्ताना' जैसे गाने उनकी पहचान का हिस्सा बन गए. फिल्मफेयर भी 'आराधना' को वह फिल्म मानता है जिसने उन्हें सुपरस्टारडम तक पहुंचाया.
इसके बाद 'दो रास्ते' में मुमताज के साथ उनकी जोड़ी पसंद की गई. 'बंधन' में भी मुमताज के साथ उनकी जोड़ी नजर आई. वहीं 'इत्तेफाक' ने दिखाया कि राजेश खन्ना सिर्फ रोमांटिक हीरो नहीं थे. यश चोपड़ा की इस मर्डर मिस्ट्री में उन्होंने एक ऐसे शख्स का किरदार निभाया जिस पर पत्नी की हत्या का आरोप है.
1970 आते-आते राजेश खन्ना का स्टारडम और मजबूत हो चुका था. इस साल 'खामोशी', 'द ट्रेन', 'सच्चा झूठा', 'सफ़र' और 'आन मिलो सजना' जैसी फिल्में आईं. 'खामोशी' में वह गंभीर और भावुक अंदाज में नजर आए. 'द ट्रेन' में उन्होंने पुलिस अधिकारी का रोल किया. 'सफ़र' ने उनकी इमोशनल एक्टिंग को सामने रखा, जबकि 'आन मिलो सजना' में रोमांटिक स्टार वाली उनकी छवि फिर देखने को मिली. फिर आई 'सच्चा झूठा', जिसमें राजेश खन्ना ने डबल रोल निभाया. एक तरफ भोला जैसा सीधा-सादा आदमी और दूसरी तरफ अपराध की दुनिया से जुड़ा उसका हमशक्ल. इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर अवॉर्ड भी मिला. यानी जिस समय दूसरे स्टार एक खास तरह की इमेज पर टिके रहते थे, राजेश खन्ना लगातार अलग-अलग तरह के रोल कर रहे थे.
1971 राजेश खन्ना के करियर का सबसे खास साल माना जा सकता है. इसी दौर में 'कटी पतंग', 'महबूब की मेहंदी', 'आनंद', 'अंदाज़', 'हाथी मेरे साथी', 'मर्यादा' और 'छोटी बहू' जैसी फिल्में आईं. 'कटी पतंग' में आशा पारेख के साथ उनकी जोड़ी खूब पसंद की गई. फिल्म के 'ये शाम मस्तानी' और 'प्यार दीवाना होता है' जैसे गाने आज भी याद किए जाते हैं. फिर आई 'आनंद', जो राजेश खन्ना के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हो गई. उन्होंने ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया जिसे पता है कि उसकी जिंदगी ज्यादा लंबी नहीं है, फिर भी वह हर पल खुशी के साथ जीना चाहता है. अमिताभ बच्चन ने फिल्म में डॉ. भास्कर का रोल किया था. राजेश खन्ना को इस फिल्म के लिए फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर अवॉर्ड मिला.
इसी साल 'हाथी मेरे साथी' भी आई. फिल्म में राजू और उसके हाथियों के बीच का रिश्ता कहानी का केंद्र था. यह फिल्म राजेश खन्ना की बड़ी व्यावसायिक सफल फिल्मों में गिनी जाती है. दिलचस्प बात यह है कि 'अंदाज़' में राजेश खन्ना मुख्य हीरो नहीं थे. उन्होंने स्पेशल अपीयरेंस किया था. इसके बावजूद उनकी मौजूदगी दर्शकों के लिए बड़ा आकर्षण थी. इसी तरह 'मर्यादा' को भी उनके लगातार सफल फिल्मों वाले आंकड़े में शामिल किया जाता है, लेकिन इसे सोलो हिट की सूची में रखना सही नहीं होगा.

1972 में राजेश खन्ना की कई फिल्में रिलीज हुईं. 'दुश्मन', 'अमर प्रेम', 'अपना देश', 'दिल दौलत दुनिया', 'बावर्ची', 'मेरे जीवन साथी', 'शहज़ादा' और 'अनुराग' जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग किरदार निभाए. 'दुश्मन' में वह तेज रफ्तार ट्रक ड्राइवर के रोल में नजर आए. यह उनकी रोमांटिक इमेज से बिल्कुल अलग किरदार था. 'अमर प्रेम' में शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी ने दर्शकों को भावुक कर दिया. फिल्म में उनका किरदार एक ऐसी महिला की जिंदगी में सम्मान और अपनापन लेकर आता है जिसे समाज ने अकेला छोड़ दिया था. 'पुष्पा, आई हेट टियर्स' आज भी राजेश खन्ना के सबसे पहचाने जाने वाले डायलॉग्स में है.
'बावर्ची' में उन्होंने रघु नाम के रसोइये का किरदार निभाया. यहां उनका काम किसी हीरो की तरह लड़ना या रोमांस करना नहीं बल्कि एक टूटे हुए परिवार को फिर से जोड़ना था. यही वजह है कि यह फिल्म उनकी स्टार इमेज से अलग होने के बावजूद बेहद यादगार बनी. हालांकि इसी दौर में 'मालिक' जैसी फिल्मों की असफलता भी सामने आई. यानी उनका लगातार हिट फिल्मों वाला जादुई सिलसिला हमेशा के लिए नहीं चला.
1973 तक आते-आते हिंदी सिनेमा का माहौल बदलने लगा था. इस साल 'राजा रानी', 'दाग: ए पोएम ऑफ़ लव' और 'नमक हराम' जैसी फिल्में आईं. 'दाग' में राजेश खन्ना के साथ शर्मिला टैगोर और राखी थीं. फिल्म में अपराध, प्यार, शादी और अतीत के लौटने की कहानी थी, लेकिन इस दौर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म रही 'नमक हराम'. इसमें राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने दो दोस्तों की भूमिका निभाई. एक अमीर परिवार से आता है और दूसरा मजदूरों की दुनिया से जुड़ता है. फिल्म आगे बढ़ते-बढ़ते दोस्ती, वर्ग संघर्ष और बदलते समाज की कहानी बन जाती है.
यही वह दौर था जब अमिताभ बच्चन तेजी से बड़े स्टार के रूप में उभर रहे थे. बाद के वर्षों में हिंदी सिनेमा का स्टार सिस्टम एक नए दौर में पहुंचा. फिल्मफेयर के एक लेख में भी राजेश खन्ना के चरम सुपरस्टारडम को लगभग 1969 से 1974 के बीच का दौर बताया गया है और अमिताभ बच्चन के उभरने को सिनेमा में बदलती भाषा और नए हीरो के आने से जोड़ा गया है.
राजेश खन्ना के दौर को सिर्फ बॉक्स ऑफिस आंकड़ों से समझना मुश्किल है. उनके स्टारडम का असर उनकी फिल्मों से बाहर भी दिखाई देता था. फिल्मफेयर ने उनके फैन क्रेज को अभूतपूर्व बताया है. उनकी खासियत यह थी कि वह सिर्फ एक सफल अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक ऐसा स्टार बन गए थे जिसकी अपनी अलग पहचान थी. उनका बोलने का अंदाज, मुस्कुराने का तरीका, हाथ हिलाने की स्टाइल और गुरु कुर्ता तक उनकी स्टार इमेज का हिस्सा बन गया था. सही बात यह है कि उनका चरम सुपरस्टार फेज करीब पांच-छह साल का था, खासकर 1969 से 1973-74 के आसपास. लेकिन उनका फिल्मी करियर इसके काफी आगे तक चला और उन्होंने बाद के दशकों में भी सफल फिल्में दीं.
राजेश खन्ना ने हिंदी सिनेमा में स्टारडम का एक नया मॉडल बनाया. 'आराधना' ने उन्हें पहचान दी, 'दो रास्ते' और 'बंधन' ने लोकप्रियता बढ़ाई, 'सच्चा झूठा' और 'सफ़र' ने अभिनय की रेंज दिखाई, 'आनंद' और 'हाथी मेरे साथी' ने उन्हें बड़े पैमाने पर दर्शकों से जोड़ा और 'अमर प्रेम' जैसी फिल्मों ने उनकी रोमांटिक और भावुक छवि को मजबूत किया. 1969 से 1971 के बीच लगातार 15 सोलो हिट फिल्मों का रिकॉर्ड उनके सुपरस्टारडम की सबसे ठोस मिसाल है. यही वजह है कि दशकों बाद भी जब हिंदी सिनेमा के पहले बड़े सुपरस्टार की बात होती है तो राजेश खन्ना का नाम सबसे पहले लिया जाता है. उनका दौर भले ही हमेशा नहीं चला, लेकिन जिस ऊंचाई तक वह पहुंचे, उसने बॉलीवुड में स्टारडम की परिभाषा ही बदल दी.