Jhaad Phoonk Film Review: सांसों को रोककर रख देगी ये हॉरर सस्पेंस थ्रिलर, मस्ट वॉच है 'झाड़ फूंक'
हॉरर फिल्म 'झाड़ फूंक' दर्शकों के लिए डर और सस्पेंस का नया अनुभव लेकर आई है. फिल्म की कहानी में ऐसे कई मोड़ हैं, जो आखिर तक उत्सुकता बनाए रखते हैं. डरावने दृश्यों और रहस्य से भरपूर यह हॉरर थ्रिलर अपनी कहानी और रोमांच के चलते मस्ट वॉच साबित हो सकती है.
मूवी रिव्यू: झाड़ फूंक
कलाकार: यशपाल शर्मा,पद्मिनी कोल्हापुरे,सुम्बुल तौकीर खान,हर्ष राजपूत,अप्रतिम सिंह
निर्देशक: राजन रामगोपाल वर्मा
निर्माता: शैलेश परिहार
सह-निर्माता : वृंदा ब्रह्मभट्ट
प्लेटफॉर्म: जिओ हॉटस्टार
रेटिंग: 3.5 स्टार
Jhaad Phoonk Film Review: हॉरर फिल्मों का अपना एक दर्शक वर्ग है. ऐसी फिल्मों में भूत-प्रेत और खौफनाक दृश्यों के साथ-साथ अंधविश्वास भी एक अहम पहलू रहा है.निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘झाड़-फूंक’भी इसी तरह के रहस्य और खौफ की दुनिया में ले जाती है,जहां एक गर्भवती महिला की जिंदगी अचानक ऐसे मोड़ पर आ जाती है,जहां हर घटना के साथ हर चेहरे पर उसे संदेह होने लगता है और उसके लिए अपने और अपने होने वाले बच्चे की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है.ये फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म जिओ हॉटस्टार पर रिलीज हुई है. इस रिव्यू में आइए जानते हैं कैसी है ये फिल्म.
कहानी
इस फिल्म की कहानी शुरू होती है उत्तराखंड की पहाड़ियों में सरपट दौड़ती एक कार के दृश्य से जिसमें बैठे हैं आस्था (सुम्बुल तौकीर खान)और राजवीर (हर्ष राजपूत). आस्था प्रेग्नेंट है और अपने बॉयफ्रेंड राजवीर से इस बात से नाराज है कि अभी तक उसने अपने पापा से उनकी शादी के बारे में बात क्यों नहीं की. राजवीर उसको समझने की कोशिश कर रहा होता है कि अचानक से उनकी तेज रफ्तार गाड़ी के सामने रहस्यमयी तरीके से एक औरत प्रकट हो जाती है जिसे बचाने के लिए आस्था गाड़ी की स्टेअरिंग को दूसरी तरफ मोड़ देती है जिससे उनकी गाड़ी एक पेड़ से टकरा जाती है और दोनों बुरी तरह से घायल हो जाते हैं. इसके बाद आस्था जब होश में आती है तो देखती है वह किसी घर में एक बेड पर लेटी हुई है और उसके सामने उस घर के मालिक पति-पत्नी मोहन ठाकुर (यशपाल शर्मा)और कामिनी ठाकुर (पद्मिनी कोल्हापुरे) मुस्कुरा रहे हैं.
आस्था सबसे पहले राजवीर के बारे में पूछती है तो उसको बताया जाता है कि एक्सीडेंट के समय गाड़ी में वह अकेली थी. आस्था को लगा शादी के प्रेशर में आकार शायद राजवीर मौका देखकर भाग गया. आस्था वापस दिल्ली जाना चाहती है लेकिन दोनों पति पत्नी उसको रोक लेते हैं और कहते हैं इस हालत में नहीं जाने देंगे. आस्था उसके साथ रहने लगती है लेकिन उसको महसूस होता है कि कोई तो है जिसकी आहट बार बार उसको परेशान करती है और आस्था डर से कापने लगती है. एक दिन आस्था ने दोनों पति पत्नी को अपना अनुभव बताया तो उन दोनों ने उसको वह सच बताया जिसे सुनकर आस्था के होश उड़ गए. उनके अनुसार जो औरत कार के सामने आई थी और यहां भी उसका पीछा नहीं छोड़ रही वह कोई और नहीं बल्कि मंजरी का भूत है जिसे कई साल पहले गांव वालों ने उसके गर्भ में पल रही बच्ची के साथ मार डाला था और तभी से मंजरी ने कसम खाई है कि इस गांव में वह किसी भी बच्चे को जन्म नहीं लेने देगी.
धीरे धीरे आस्था को समझ में आता है कि वह एक ऐसे जाल में फंस चुकी है जिससे निकलने का कोई रास्ता उसे दिखाई नहीं दे रहा। क्या होगा आस्था का? क्या होगा उसके गर्भ में पल रहे बच्चे का? क्या हुआ राजवीर के साथ? यह सब जानने के लिए आपको देखती होगी यह फिल्म.
अभिनय
फिल्म में यशपाल शर्मा, पद्मिनी कोल्हापुरे, सुम्बुल तौकीर खान, हर्ष राजपूत और अप्रतिम सिंह प्रमुख भूमिकाओं में हैं. कहानी में सभी किरदारों की अपनी अहमियत है, लेकिन आस्था का किरदार सबसे चुनौतीपूर्ण नजर आता है. एक गर्भवती महिला, जो दुर्घटना के बाद अनजान लोगों के बीच फंस जाती है और फिर रहस्यमयी घटनाओं का सामना करती है, उसके किरदार में डर, असुरक्षा और अपने बच्चे को बचाने की चिंता जैसे अनगिनत भावों की गुंजाइश है और सुम्बुल तौकीर खान इसे दर्शकों के सामने बेहतरीन तरीके से पेश किया है.यशपाल शर्मा और पद्मिनी कोल्हापुरे जैसे अनुभवी और मंझे हुए कलाकारों के किरदार कहानी के रहस्यों से जुड़े हुए हैं, इसलिए उनके संवाद और हाव-भाव घटनाओं को और भी प्रभावशाली बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं.
फिल्म पर शानदार पकड़
निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा के सामने इस कहानी में डर और रहस्य के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है. हॉरर फिल्मों में अगर रहस्य बहुत जल्दी खुल जाए,तो दर्शकों की उत्सुकता कम हो सकती है. वहीं, अगर घटनाओं को बिना किसी ठोस आधार के आगे बढ़ाया जाए,तो कहानी का प्रभाव कमजोर पड़ने लगता है. इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए निर्देशक ने अपना काम किया है और कहानी के जरिए दर्शकों को पूरी फिल्म के दौरान बांधकर रखने में सफल रहे हैं.
हॉरर फिल्मों में सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक,साउंड डिजाइन और एडिटिंग की भूमिका काफी अहम होती है। ऐसी फिल्मों में बैकग्राउंड म्यूजिक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल डर को बनावटी बना सकता है,जबकि सही जगह पर खामोशी भी तनाव पैदा कर सकती है. ऐसी सभी छोटी छोटी बातों का ध्यान रखा गया है.
क्यों देखें मूवी?
‘झाड़-फूंक’की कहानी हॉरर,अंधविश्वास और रहस्य को एक साथ जोड़ती है.हालांकि,किसी भी हॉरर फिल्म की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने दर्शक को कहानी में दर्शाये गए दृश्यों से कितना विश्वास दिला पाती है और दर्शकों को अंत तक कहानी से जोड़े रख पाती है या नहीं.यह फिल्म एक दो सीन्स को छोड़ दिया जाए तो दर्शकों को डरावने दृश्यों और रहस्यमयी घटनाओं पर यकीन दिलाने में सफल रहती है. निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा अपनी इस हॉरर यूनिवर्स में सफल रहे है अगर आपको भी हॉरर और सस्पेंस आधारित फिल्में देखने का शौक है तो यह फिल्म फेस्टिवल सीजन में मस्ट वॉच ओटीटी मूवी है.