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बॉलीवुड के जाने-माने गीतकार और लेखक जावेद अख्तर अक्सर अपनी बेबाकी और खुलकर बात रखने के लिए जाने जाते हैं. धर्म और समाज से जुड़े मुद्दों पर वे हमेशा अपनी अलग राय रखते हैं. हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस के साथ इंटरव्यू में उन्होंने अपनी जिंदगी और बच्चों की परवरिश से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा सुनाया. उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने अपने घर में कभी धर्म की बंदिशें नहीं रखीं और बच्चों को किसी खास पहचान के दायरे में बांधने की बजाय हमेशा एक बेहतर इंसान बनने की सीख दी. उनकी यही सोच आज दोनों बच्चों फरहान और जोया में नजर आती है.
जावेद अख्तर का कहना है कि समाज में आमतौर पर दस-बारह साल का होते-होते बच्चे किसी न किसी तय धर्म और पहचान में बंध जाते हैं. परिवार और माहौल उन्हें वही सिखाने लगता है. मगर जावेद साहब ने अपने घर में ऐसा बिल्कुल नहीं होने दिया. उन्होंने अपने बच्चों पर कभी कोई धार्मिक लेबल नहीं थोपा. उन्होंने हमेशा ये कोशिश की कि बच्चे दुनिया को इंसानी नजरिए से देखें. उनके मुताबिक, बच्चों को किसी खास रीति-रिवाज या मजहब की दीवार में बांधने के बजाय खुली सोच देना ज्यादा जरूरी था, ताकि वे बड़े होकर खुद अपने विचार और जीवन जीने का सही तरीका तय कर सकें.

जावेद अख्तर ने बताया कि ये बात तब की है जब उनके बेटे फरहान अख्तर करीब 8 साल के थे. फरहान उस दिन स्कूल से घर वापस लौटे ही थे और उनके कंधे पर स्कूल का बैग टंगा था. कमरे में आते ही उन्होंने अचानक अपने पिता से एक सीधा और मासूम सा सवाल पूछ लिया, जिसने लेखक को हैरान भी कर दिया था. फरहान ने पूछा, ‘पापा, क्या हम मुसलमान हैं?’. एक 8 साल के बच्चे के मुंह से ऐसा सवाल सुनकर कोई भी माता-पिता हैरान रह ही जाते हैं, मगर जावेद साहब ने बिना झिझके बेहद शांत मन से अपने बेटे की इस मासूम उलझन को सुलझाने का मन बनाया.
जावेद अख्तर ने फरहान को प्यार से समझाते हुए कहा कि जब कोई बच्चा दुनिया में आता है, तो वह किसी शहर में जन्म लेता है. वो शहर मुंबई, पुणे, आगरा, अहमदाबाद, लंदन या न्यूयॉर्क कुछ भी हो सकता है. इसी तरह इंसान किसी न किसी समुदाय या जाति में भी जन्म ले लेता है. मगर ये बात बिल्कुल भी मायने नहीं रखती कि आप किस शहर या किस समुदाय में पैदा हुए हैं. असल जिंदगी में जो बात सबसे ज्यादा मायने रखती है, वो ये है कि आप खुद क्या बनते हैं. इंसान की पहचान उसका व्यवहार और उसकी सोच बनाती है, न कि उसका जन्म.
जावेद अख्तर की पहली शादी जानी-मानी राइटर हनी ईरानी से हुई थी, जिनसे उनके दो बच्चे फरहान और जोया हैं. आज दोनों ही फिल्म जगत में अपनी बेहतरीन कला और काम के दम पर बड़ा मुकाम हासिल कर चुके हैं. जावेद अख्तर कहते हैं कि उन्हें अपने दोनों बच्चों पर बहुत गर्व है. ये गर्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे बहुत कामयाब हैं, बल्कि इसलिए है, क्योंकि वे एक अच्छे और गरिमामय इंसान के रूप में अपनी जिंदगी जीते हैं. दोनों ने जो कुछ भी पाया है, अपनी काबिलियत के बल पर कमाया है और अपनी अलग पहचान बनाई है.
जावेद साहब का कहना है कि फरहान और जोया की कामयाबी में उनका अपना कोई निजी योगदान नहीं रहा है. दोनों बच्चों ने कभी भी सिर्फ दौलत या शोहरत कमाने की अंधी दौड़ में खुद को शामिल नहीं किया. उन्होंने समाज के सामने कभी कोई भद्दी, अश्लील इमजे पेश नहीं की, बल्कि हमेशा अपनी साख और शालीनता को बनाए रखा. जावेद अख्तर इस बात से बेहद खुश रहते हैं कि उनके बच्चों ने अपनी मेहनत से सम्मान पाया है. एक पिता के तौर पर उनके लिए बच्चों की यही गरिमा और समझदारी सबसे बड़ी खुशी और संतुष्टि की वजह है.