आस्था या अंधविश्वास? 99% लोग बिना सोचे-समझे अपनाते हैं धर्म, जावेद अख्तर ने एलन मस्क का दिया उदाहरण; छेड़ी नई बहस
Javed Akhtar On Religion: ‘शोले’ और ‘दीवार’ जैसी फिल्मों के राइटर जावेद अख्तर ने एक बार फिर धर्म और आस्था पर बड़ा सवाल उठाया है. अपने एक हालिया इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि 99% लोग धर्म को बिना सोचे-समझे अपनाते हैं. उन्होंने एलन मस्क का उदाहरण देते हुए आस्था और सच के बीच का फर्क समझाया, जिसने नई बहस छेड़ दी.
हिंदी सिनेमा के फेमस लिरिसिस्ट और राइटर जावेद अख्तर हमेशा अपनी बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं. सिनेमा और शायरी से अलग वे समाज, राजनीति, धर्म और तर्क से जुड़े मुद्दों पर भी खुलकर अपनी बात रखते हैं. हाल ही में एक्सप्रेस हिंदी के साथ इंटरव्यू में उन्होंने धर्म और आस्था को लेकर कुछ ऐसी बातें कहीं, जिससे सोशल मीडिया पर एक नई बहल को जन्म दे दिया है. इस बातचीत के दौरान जब सौरभ द्विवेदी ने उनसे सवाल किए, तो जावेद अख्तर ने पूछा कि दुनिया में कितने ऐसे लोग हैं, जो अपने धर्म को खुद परखने और समझने के बाद दिल से अपनाते हैं?
50 सालों से भारतीय सिनेमा में अपना योगदान देते आ रहे जावेद अख्तर ने ‘शोले’, ‘दीवार’ और ‘जंजीर’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों की कहानियां और डायलॉग्ल लिखे. बातचीत के दौरान उन्होंने माना कि मुश्किल घड़ी में धर्म इंसान को एक बड़ा इमोशनल सहारा जरूर देता है, लेकिन उन्होंने एक चुभता हुआ सवाल भी पूछा कि क्या सिर्फ किसी बात से मन को शांति मिल जाने से वो बात सच साबित हो जाती है? उनका कहना था कि राहत मिलना एक अलग बात है और हकीकत का होना बिल्कुल अलग, इसलिए दोनों को एक साथ मिलाकर नहीं देखना चाहिए.
एलन मस्क के नाम से समझाया आस्था का सच
जावेद अख्तर ने अपनी बात को बेहद आसान तरीके से समझाने के लिए दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि अगर कोई इंसान अपने मन में पक्का मान ले कि एलन मस्क उसका सगा भाई है और अगले महीने उसे अरबों डॉलर देने वाला है, तो ये सोचकर उसे अंदर से बहुत खुशी और तसल्ली मिलेगी, लेकिन क्या किसी के सिर्फ ऐसा सोच लेने भर से ये बात सच हो जाएगी. बिल्कुल नहीं. इसी तरह किसी ऊपर वाली ताकत पर भरोसा करने से इंसान को लगता है कि कोई उसका ध्यान रख रहा है, मगर इससे उस ताकत का वजूद सच साबित नहीं होता.
जन्म के साथ तय हो जाता है इंसान का धर्म
इंटरव्यू में उन्होंने सबसे बड़ा तर्क ये दिया कि दुनिया के करीब 99 परसेंट लोग उसी धर्म में अपनी जान गंवाते हैं ,जिसमें वे पैदा हुए थे. उन्होंने साफ कहा कि किसी भी इंसान का धर्म उसका अपना सोचा-समझा या आजाद फैसला नहीं होता. हकीकत ये है कि बच्चे जिस घर में जन्म लेते हैं, वहां के रीति-रिवाज और धार्मिक मान्यताएं उन्हें विरासत में मिल जाती हैं. लोग बिना कोई सवाल पूछे या बिना जांचे-परखे जीवनभर उसी लीक पर चलते रहते हैं. उनका मानना है कि जब इंसान अपनी मर्जी से कोई रास्ता चुनता ही नहीं, तो फिर उसे उसकी अपनी असली खोज या समझदारी कैसे कहा जा सकता है.
इंसान की जगह सोच और तर्क पर भरोसा
अपनी सोच पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हमें इंसान और उसके विचारों के बीच का फर्क समझना बहुत जरूरी है. उन्होंने तर्क दिया कि वे किसी भी इंसान पर आंख बंद करके भरोसा करने के बजाय सही लॉजिक और आइडियोलॉजी पर यकीन करते हैं. इंसान तो समय के साथ अपनी बात से पलट भी सकता है, लेकिन तर्क की कसौटी कभी नहीं बदलती. धार्मिक लोग अक्सर किसी बाबा, संत या अपने माता-पिता की बातों पर बिना सोचे भरोसा कर लेते हैं. उन्होंने ये भी कहा कि ये बात बिल्कुल गलत है कि सभी धर्म एक जैसे हैं, क्योंकि दुनिया के सभी दस बड़े धर्म एक-दूसरे से काफी अलग हैं.
पहले भी नास्तिकता पर मजबूती से रखी अपनी राय
जावेद अख्तर ने हमेशा खुद को बिना किसी झिझक के नास्तिक कहा है और वे ईश्वर के वजूद पर पहले भी कई पब्लिकली बहस कर चुके हैं. जून 2026 में भी जब सोशल मीडिया पर उनसे सवाल हुआ था, तो उन्होंने खुद को नास्तिक बताते हुए कहा था कि उनकी कौम सिर्फ और सिर्फ भारतीय है. इससे पहले दिसंबर 2025 में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में उनका एक बड़ा डिबेट प्रोग्राम हुआ था. उस इवेंट में जावेद अख्तर और इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच लगभग दो घंटे तक भगवान के वजूद को लेकर तीखी और गहरी चर्चा हुई थी, जिसकी हर तरफ खूब चर्चा हुई थी.