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भारतीय सिनेमा में ट्रेंड हमेशा बदलते रहे हैं. कभी पर्दे पर रोमांटिक फिल्मों का राज हुआ करता था, कभी मारधाड़ वाले एक्शन का दौर चला, तो कभी बायोपिक और देशभक्ति फिल्मों की बाढ़ आ गई, लेकिन बीते कुछ सालों में एक ऐसा जॉनर तेजी से उभरा है, जिसने दर्शकों के साथ-साथ बड़े-बड़े फिल्ममेकर्स का ध्यान अपनी ओर खींचा. ये जॉनर है माइथोलॉजिकल यानी हमारी पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्मों का. पिछले कुछ सालों से ऐसी कई फिल्में बड़े पर्दे पर छाई रहीं.
आज आलम ये है कि इंडस्ट्री का हर बड़ा फिल्ममेकर भारतीय धार्मिक ग्रंथों और कथाओं से जुड़ी कहानियों पर फिल्म बनाने की सोच रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह दर्शकों का बढ़ता लगाव, मजबूत इमोशनल कनेक्ट और टिकट खिड़की पर मिल रही जबरदस्त कमाई है. हमारे पौराणिक किरदार अब सिर्फ धर्मग्रंथों या किताबों तक सीमित नहीं हैं. अब उन्हें बड़े पर्दे पर लेटेस्ट विजुअल इफेक्ट्स, मॉर्डन टेक्निक और शानदार कैनवास के साथ एकदम नए रूप में पेश किया जा रहा है.
देखा जाए तो भारतीय फिल्मों के लिए पौराणिक विषय कोई नई बात नहीं है. जब हमारे यहां सिनेमा की शुरुआत हुई थी, तब भी दादा साहेब फाल्के के दौर से लेकर हर दशकों में ‘रामायण’, ‘महाभारत’ और देवी-देवताओं पर खूब फिल्में बनीं. हालांकि, 80 और 90 के दशक के बाद रोमांस, फैमिली ड्रामा और एक्शन का ऐसा दौर आया कि पौराणिक कहानियां मेनस्ट्रीम सिनेमा में कहीं पीछे छूट गईं.
मगर पिछले एक दशक में दर्शकों के टेस्ट में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला. खासकर डिजिटल क्रांति और इंटरनेट के आने के बाद नई पीढ़ी अपनी संस्कृति, इतिहास और जड़ों को टटोलने लगी. टीवी पर ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के दोबारा टेलीकास्ट को मिली जबरदस्त टीआरपी ने इस बदलाव में आग में घी का काम किया. फिल्ममेकर्स को साफ समझ आ गया कि आज का दर्शक अपनी सांस्कृतिक विरासत को बड़े पर्दे पर उसी भव्यता के साथ देखना चाहता है.
ये बदलाव सिर्फ हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं रहा. साउथ फिल्म इंडस्ट्री तेलुगु, तमिल और कन्नड़ सिनेमा ने इस बात को सबसे पहले समझा. उन्होंने अपनी लोककथाओं और पौराणिक किरदारों को मॉडर्न स्टाइल में पेश करके पैन-इंडिया लेवल पर इतिहास रचा. आज नतीजा सबके सामने है कि माइथोलॉजी फिल्में भारतीय सिनेमा का सबसे हॉट और मुनाफे वाला जॉनर बन चुकी हैं.
माइथोलॉजिकल फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत ऑडियंस के साथ उनका डीप इमोशनल जुड़ाव है. भगवान राम, श्रीकृष्ण, महादेव, हनुमान और महाभारत के किरदारों से भारतीय समाज सदियों से जुड़ा हुआ है. जब इन किरदारों और कहानियों को वर्ल्ड-क्लास VFX और शानदार बैकग्राउंड स्कोर के साथ दिखाया जाता है, तो लोग सीधे दिल से जुड़ जाते हैं.
फिल्म इंडस्ट्री के जानकारों की मानें तो इन फिल्मों की ऑडियंस रीच किसी भी आम फिल्म से कई गुना बड़ी होती है. इसमें कोई एडल्ट या अनकंफर्टेबल सीन नहीं होते, इसलिए बच्चे, यंग जनरेशन, माता-पिता और बुजुर्ग यानी पूरा परिवार एक साथ थिएटर्स में इनको देखने जाता है. यही वजह है कि इन फिल्मों को बाकी फिल्मों के मुकाबले बहुत तगड़ी फैमिली ऑडियंस का सपोर्ट मिलता है.
इसके अलावा सोशल मीडिया के दौर में इन फिल्मों को लेकर एक अलग ही माहौल बन जाता है. रिलीज से पहले ही सांस्कृतिक और धार्मिक बातें शुरू हो जाती हैं और रिलीज के बाद इन फिल्मों के सीन वायरल होने लगते हैं, जिससे फिल्म को फ्री में भारी पब्लिसिटी मिल जाती है. लोगों को लगता है कि टिकट खरीदकर वे सिर्फ टाइमपास या एंटरटेनमेंट नहीं कर रहे, बल्कि अपनी परंपरा और आस्था का जश्न मना रहे हैं.
हाल के दिनों में अगर किसी फिल्म ने इंडस्ट्री को चौंकाया है, तो वो है ‘हनुमान अंश’. बहुत ही छोटे बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर जो कमाई की, उसने बड़े-बड़े ट्रेंड पंडितों के होश उड़ा दिए. महज 2 करोड़ रुपये के आसपास तैयार हुई ये फिल्म 200 करोड़ रुपये का आंकड़ा छूने की तरफ बढ़ गई.
इस फिल्म की हैरतअंगेज कामयाबी ने पूरी इंडस्ट्री को एक बहुत साफ मैसेज दिया. इसने साबित कर दिया कि दर्शक अब सिर्फ बड़े चेहरों या सुपरस्टार्स के पीछे आंख मूंदकर नहीं भागते. अगर आपकी कहानी में दम है, भावनाएं सच्ची हैं और प्रेजेंटेशन ईमानदार है, तो बिना बड़े सितारों के भी इतिहास रचा जा सकता है.
‘हनुमान अंश’ की सक्सेस के बाद फिल्ममेकर्स की सोच पूरी तरह बदल गई है. अब वे पौराणिक कहानियों को सिर्फ पूजा-पाठ या धार्मिक सिनेमा नहीं मान रहे, बल्कि इसे 500 और 1000 करोड़ कमाने वाले एक बहुत बड़े बिजनेस मॉडल के रूप में देख रहे हैं.
अगर आप अगले तीन-चार सालों में रिलीज होने वाली फिल्मों की लिस्ट देखें, तो साफ समझ आ जाएगा कि सिनेमाघरों में माइथोलॉजी फिल्मों का तूफान आने वाला है. छोटे-बड़े हर प्रोडक्शन हाउस के पास ऐसी दो-तीन फिल्में लाइनअप में हैं.
इन सबमें सबसे बड़ा और फेमस नाम है नितेश तिवारी की ‘रामायण’. इसे भारतीय सिनेमा के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट माना जा रहा है. फिल्म का भारी-भरकम बजट, हॉलीवुड लेवल के VFX, बड़ी स्टारकास्ट और ऑस्कर विनर कंपोजर्स का साथ इसे ग्लोबल फिल्म बना रहा है. मेकर्स इस फिल्म को सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के थिएटर्स में रिलीज के लिए तैयार हैं.
इसी कड़ी में ‘महाभारत’ पर आधारित कई बड़े प्रोजेक्ट्स भी अलग-अलग स्केल पर तैयार हो रहे हैं. ‘महाभारत’ एक ऐसा महाकाव्य है, जिसमें राजनीति, इंसानी जज्बात, युद्ध, कूटनीति और ड्रामा का ऐसा मेल है जो दुनिया की किसी कहानी में नहीं मिलता. इसलिए डायरेक्टर्स के लिए यह हमेशा से एक सपनों का प्रोजेक्ट रहा है.
यही नहीं, अब तकनीक भी इस जॉनर को पंख लगा रही है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से हनुमान जी पर एक पूरी फिल्म तैयार करने की चर्चाएं गर्म हैं. एआई की वजह से अब वो सीन भी पर्दे पर जीवंत हो रहे हैं, जिनकी कल्पना करना भी कुछ साल पहले तक नामुमकिन लगता था.
पौराणिक फिल्मों के इस बढ़ते दबदबे को देखकर फिल्म गलियारों में ये बहस छिड़ गई है कि क्या अब रोमांस, मारधाड़, कॉमेडी और क्राइम थ्रिलर फिल्में खत्म हो जाएंगी? क्या दर्शकों को अब सिर्फ धर्म और संस्कृति की कहानियां ही पसंद आएंगी?
मशहूर ट्रेड एनालिस्ट और फिल्म क्रिटिक्स कोमल नहाटा ने जी न्यूज के साथ बात करते हुए इस बात को सिरे से खारिज करते हुए साफ कहा कि किसी एक जॉनर का हिट होना बाकी जॉनर के लिए मौत का फरमान नहीं होता. असली राजा हमेशा अच्छी कहानी ही होती है. अगर रोमांटिक फिल्म दिल छू ले, एक्शन फिल्म रोंगटे खड़े कर दे या कॉमेडी पेट में दर्द कर दे, तो लोग उसे भी सिर-आंखों पर बिठाएंगे.
उनका मानना है कि ये वक्त का एक पहिया है, जो घूमकर वापस उसी जगह आया है. आज का युवा अपनी पहचान को लेकर गर्व महसूस कर रहा है. वे वेस्टर्न लाइफस्टाइल के साथ-साथ अपने वेदों, पुराणों और इतिहास को गहराई से समझना चाहता है, इसलिए उसे ये जॉनर सबसे ज्यादा अपील कर रहा है.
सवाल: इन दिनों माइथोलॉजिकल (पौराणिक) फिल्मों का क्रेज बहुत बढ़ रहा है. करण जौहर ने भी ‘राधा कृष्ण’ का ऐलान किया. क्या बॉलीवुड और रीजनल सिनेमा में एक्शन, रोमांस या थ्रिलर जॉनर के लिए ये कोई खतरा है?
कोमल नहाटा: खतरा बिल्कुल नहीं है; जॉनर कोई भी हो, फिल्म अच्छी होगी तो चलेगी. हां, पौराणिक फिल्मों का एक दौर लौट आया है, जिसे लोग भूल चुके थे. आज की यंग जनरेशन भजन क्लबिंग कर रही है, उनका टेस्ट बदल रहा है, जो युवा पहले ऐसे चमत्कारों पर हंसते थे, आज वे खुद इन कहानियों में दिलचस्पी ले रहे हैं. ये एक चक्र (साइकिल) है, जो समय-समय पर बदलता रहता है.
सवाल: बड़े बजट की फिल्म ‘रामायण’ को लेकर आपको क्या संभावनाएं लगती हैं. क्या ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बंपर कमाई कर पाएगी?
कोमल नहाटा: बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं. मुझे लगता है कि ये बहुत बड़ी हिट होगी. इसमें ऐसे लोग भी सिनेमाघरों में आएंगे, जिन्होंने पिछले 20-30 या 40 सालों से सिनेमाघर का मुंह नहीं देखा है. साथ ही युवा पीढ़ी भी आएगी, क्योंकि वे अपने इतिहास और संस्कृति को जानने में गहरी दिलचस्पी ले रहे हैं.
सवाल: आज कई मेकर्स का ऐसा मनाना है कि हमारे देश के भगवान विदेशी सुपरहीरोज से कई ज्यादा ताकतवर हैं. ऐसे में कई मेकर्स AI की मदद से बनाई जाने वाली पौराणिक फिल्मों के आइडिया ला रहे हैं. आपको क्या लगता है क्या ये युवाओं के बीच पॉपुलर होगा?
कोमल नहाटा: आइडिया बहुत अच्छा है. हमारे पौराणिक महानायक हॉलीवुड सुपरहीरोज से कहीं ज्यादा शक्तिशाली और महान हैं, लेकिन सिर्फ आइडिया से फिल्म नहीं चलती, उसका एग्जीक्यूशन और कंटेंट भी उतना ही सही होना चाहिए. अगर सही कंटेंट और बेहतरीन तकनीक के साथ फिल्म बनेगी, तो ये हॉलीवुड और वहां के सुपरहीरोज को भी पीछे छोड़ सकती है.
सवाल: चर्चा है कि ‘रामायण’ को भारत से दो दिन पहले विदेश में रिलीज किया जाएगा, इसके पीछे क्या रणनीति हो सकती है?
कोमल नहाटा: अभी ये पूरी तरह कन्फर्म नहीं है, हो सकता है कि ये दुनिया भर में एक ही दिन रिलीज हो, लेकिन अगर दो दिन पहले विदेश में रिलीज करने की बात है, तो सोच साफ है. नमित मल्होत्रा बार-बार कहते रहे हैं कि भारत के लोग तो राम और रामायण को जानते ही हैं, वे पूरी दुनिया (अमेरिका, यूके, यूरोप) को दिखाना चाहते हैं कि हमारे भगवान और हमारे हीरोज क्या हैं. ये दुनिया को अपनी भव्य संस्कृति दिखाने का एक नजरिया हो सकता है.
सवाल: भविष्य के लिए किस तरह की फिल्में ट्रेंड में रहेंगी और किस जॉनर की फिल्में बननी चाहिए?
कोमल नहाटा: सिर्फ एक ही टाइप की फिल्म बननी चाहिए—अच्छी फिल्म. जॉनर कोई भी हो माइथोलॉजी, देशभक्ति, रोमांस, सोशल ड्रामा या कॉमेडी. अगर कंटेंट अच्छा है, तो हर जॉनर की फिल्म चलेगी. किसी एक ट्रेंड के पीछे भागने के बजाय सबसे ज्यादा ध्यान अच्छे कंटेंट पर होना चाहिए.