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Explainer: हिट, सुपरहिट या फ्लॉप! 100 करोड़ की फिल्म को हिट होने के लिए कितने करोड़ कमाने पड़ते हैं? समझिए पूरा गणित

फिल्म का 100 करोड़ कमाना ही उसकी सफलता की गारंटी नहीं है. असली हिसाब बजट, टैक्स, थिएटर और डिस्ट्रीब्यूटर शेयर, प्रोड्यूसर की रिकवरी और मुनाफे से तय होता है. इसी गणित से समझिए कि कोई फिल्म कब फ्लॉप, एवरेज, हिट, सुपरहिट या ब्लॉकबस्टर कहलाती है.

Explainer: हिट, सुपरहिट या फ्लॉप! 100 करोड़ की फिल्म को हिट होने के लिए कितने करोड़ कमाने पड़ते हैं? समझिए पूरा गणित
Image Credit: Photo Credit: AI

जब भी बड़े पर्दे पर कोई फिल्म रिलीज होती है. उसकी रिलीज से सबसे पहले चर्चा उसके बजट और कमाई को लेकर शुरू हो जाती है. फिल्म ने कितने करोड़ में काम किया, स्टारकास्ट की फीस कितनी थी, एडवांस बुकिंग में कितने टिकट बिके, पहले दिन कितना कलेक्शन हुआ और आखिर में फिल्म 100 करोड़ क्लब में पहुंची या नहीं. लेकिन इन आंकड़ों के बीच एक सवाल अक्सर छूट जाता है कि आखिर किसी फिल्म को हिट या फ्लॉप कौन घोषित करता है?

उदहारण के लिए किसी फिल्म का बजट 100 करोड़ रुपये है. ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपये कमा लेती है. तो क्या इसका मतलब है फिल्म फिल्म हिट हो गई? नहीं, ये जरूरी नहीं है. कई बार 100 करोड़ का कलेक्शन करने वाली फिल्म भी घाटे में जा सकती है. वहीं, 40-50 करोड़ कमाने वाली छोटी फिल्म सुपरहिट बन जाती है. इसका मतलन ये है कि फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन और फिल्म से होने वाला मुनाफा दो अलग चीजें हैं. इसके पीछे बजट, स्टार फीस, मार्केटिंग, थिएटर शेयर, डिस्ट्रीब्यूटर का हिस्सा, प्रोड्यूसर की कमाई और फिल्म के दूसरे राइट्स का पूरा गणित काम करता है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि फिल्म के हिट, सुपरहिट, फ्लॉप या ब्लॉकबस्टर होने का हिसाब आखिर कैसे लगाया जाता है.

फिल्म रिलीज हुई भी नहीं, फिर हिट-फ्लॉप की चर्चा क्यों?

अगर किसी बड़े स्टार की फिल्म पर 200 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. तो उससे उम्मीद भी बड़ी होती है. दूसरी तरफ अगर कोई फिल्म 20-30 करोड़ रुपये में बनी है, तो उसके लिए 50-60 करोड़ का कलेक्शन भी बहुत बड़ा बिजनेस साबित हो सकता है. यानी फिल्म के लिए कोई एक ऐसा नंबर नहीं है, जिसे पार करते ही वह हिट बन जाए. हिट का फैसला फिल्म की लागत और उससे होने वाली कमाई के बीच के रिश्ते से जुड़ा होता है. इसी वजह से ट्रेड में रिलीज से पहले ही फिल्म के बजट और संभावित बिजनेस पर चर्चा शुरू हो जाती है.

सबसे पहले समझें फिल्म का Budget

फिल्म का बजट सिर्फ शूटिंग पर खर्च होने वाला पैसा नहीं होता. इसमें कई तरह के खर्च शामिल हो सकते हैं. मसलन, कलाकारों की फीस, डायरेक्टर और टेक्निकल टीम की फीस, शूटिंग का खर्च, लोकेशन, सेट, कैमरा और दूसरे प्रोडक्शन खर्च. इसके अलावा पोस्ट प्रोडक्शन, वीएफएक्स, एडिटिंग, डबिंग और म्यूजिक पर भी पैसा खर्च होता है. इसके बाद आता है फिल्म का प्रचार. ट्रेलर लॉन्च, पोस्टर, डिजिटल कैंपेन, टीवी प्रमोशन, आउटडोर विज्ञापन और दूसरे प्रमोशनल खर्च मिलाकर फिल्म का P&A यानी प्रिंट एंड एडवरटाइजिंग बजट भी काफी बड़ा हो सकता है.

यही वजह है कि किसी फिल्म की लागत समझते समय सिर्फ यह देखना सही नहीं है कि फिल्म की शूटिंग पर कितने करोड़ खर्च हुए. मान लीजिए एक फिल्म के प्रोडक्शन पर 80 करोड़ रुपये खर्च हुए और प्रमोशन समेत कुल लागत 100 करोड़ रुपये बैठती है. तो फिल्म के बिजनेस का हिसाब 80 करोड़ नहीं, बल्कि 100 करोड़ की लागत को ध्यान में रखकर किया जाएगा.

Star Fee क्यों बदल देती है पूरा गणित?

बड़ी फिल्मों में सबसे बड़ा खर्च अक्सर स्टार कास्ट की फीस होती है. किसी फिल्म में एक बड़े स्टार की फीस बहुत ज्यादा हो तो फिल्म की लागत अचानक बढ़ सकती है. मान लीजिए दो फिल्मों की कहानी और शूटिंग का खर्च लगभग बराबर है. पहली फिल्म में स्टार फीस कम है और दूसरी फिल्म में स्टार फीस काफी ज्यादा है. ऐसे में दूसरी फिल्म को अपनी लागत निकालने के लिए ज्यादा कमाई करनी पड़ेगी.

यानी स्टार का बड़ा नाम फिल्म को दर्शक दिला सकता है, लेकिन उसी के साथ फिल्म का बजट भी बढ़ा सकता है.आजकल कई फिल्मों में कलाकारों की फीस के अलावा प्रॉफिट शेयरिंग का मॉडल भी देखने को मिलता है. यानी किसी स्टार को पूरी फीस देने के बजाय कम फीस और मुनाफे में हिस्सा देने का समझौता किया जा सकता है. ऐसे मामलों में फिल्म की लागत और कमाई का हिसाब थोड़ा अलग हो जाता है.

इसलिए सिर्फ स्टार की फीस देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि फिल्म कितनी महंगी है. पूरी डील और फिल्म के बिजनेस मॉडल को देखना जरूरी होता है.

Theatre में फिल्म की पूरी कमाई नहीं जाती

अगर हम सुनते हैं कि किसी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपये कमाए, तो इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे 100 करोड़ रुपये फिल्म के निर्माता की जेब में चले गए. टिकट खरीदने वाला दर्शक जो पैसा देता है, उसमें टैक्स का हिस्सा होता है. टैक्स निकालने के बाद बची रकम को आम तौर पर नेट कलेक्शन के रूप में देखा जाता है. इसके बाद थिएटर और डिस्ट्रीब्यूटर के बीच कमाई का बंटवारा होता है. यह हिस्सा हर फिल्म के लिए एक जैसा नहीं होता. रिलीज के हफ्ते, फिल्म की ताकत, स्क्रीनिंग डील और बाजार जैसी चीजों के आधार पर शेयर बदल सकता है. शुरुआती हफ्तों में डिस्ट्रीब्यूटर का हिस्सा आम तौर पर ज्यादा हो सकता है और जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, थिएटर का हिस्सा बढ़ सकता है. यानी बॉक्स ऑफिस पर दिखने वाला 100 करोड़ का आंकड़ा सीधे प्रोड्यूसर की कमाई नहीं है.

इस पर zee न्यूज से बात करते हुए प्रदीप सरदाना ने कहा, 'फिल्म की सफलता का फैसला थिएट्रिकल कलेक्शन देखकर ही होता है. बॉक्स ऑफिस अब भी फिल्म की पॉपुलैरिटी और थिएटर पर उसके प्रदर्शन का सबसे बड़ा पैमाना है.' साथ ही उन्होंने बताया कि फिल्म की कमाई में थिएट्रिकल कलेक्शन के अलावा OTT, सैटेलाइट, म्यूजिक, डिजिटल और ओवरसीज राइट्स की भी अहम भूमिका होती है. लेकिन इनके लिए अलग पैमाने होते हैं .' उन्होंने आगे कहा, पुराने दौर में टिकट की बिक्री से भी हिसाब लगाया जाता था. लेकिन आजकल सिर्फ कलेक्शन से ही पता चलता है.'

Distributor और Producer का गणित

अब सवाल आता है कि डिस्ट्रीब्यूटर यहां कहां आता है? प्रोड्यूसर अपनी फिल्म को अलग-अलग क्षेत्रों में डिस्ट्रीब्यूटर के जरिए रिलीज कर सकता है. डिस्ट्रीब्यूटर फिल्म को थिएटर तक पहुंचाने और उसका बिजनेस संभालने का काम करता है. कई मामलों में डिस्ट्रीब्यूटर फिल्म के राइट्स एक तय रकम में खरीदता है. कुछ मामलों में अलग तरह के रेवेन्यू शेयर या कमीशन मॉडल पर काम होता है. यही वजह है कि फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन जानने के साथ यह जानना भी जरूरी होता है कि फिल्म किस रकम पर बेची गई थी.

उदाहरण के लिए किसी फिल्म के डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स अगर बहुत ऊंची कीमत पर बिके हैं, तो डिस्ट्रीब्यूटर को अपना पैसा निकालने के लिए ज्यादा बिजनेस चाहिए होगा. अगर फिल्म कम कीमत पर बेची गई है, तो कम बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर भी डिस्ट्रीब्यूटर मुनाफे में आ सकता है.इसलिए फिल्म की सफलता का असली हिसाब कई बार प्रोड्यूसर और डिस्ट्रीब्यूटर के लिए अलग-अलग हो सकता है.

फिल्म के हिट या फ्लॉप होने का सिर्फ BO देखना काफी है?

इसपर ज्यादा बात जी न्यूज से बात करते हुए PVR INOX के सीईओ कमल जियानचंदानी ने बताया, 'बॉक्स ऑफिस कलेक्शन देखना बहुत ही जरुरी है. उसके साथ ये भी जानना उतना ही अहम है कि बॉक्स ऑफिस पर ट्रेंड क्या चल रहा है. कई बारी फिल्म्स लो बॉक्स ऑफिस पर खुलती हैं, पर अगर उनका ट्रेंड ऊपर की तरफ जा रहा है (ट्रेंड लाइन ऊपर की तरफ जा रही है) तो सिनेमाज़ उसको भी बहुत ध्यान से देखते हैं और उन फिल्म्स को फिर बहुत ध्यान से नर्चर करते हैं ताकि वो सिनेमा में बनी रहे और उनका वर्ड ऑफ माउथ जब ट्रेवल करके और ज्यादा लोग आए तो कैपेसिटी हो ताकि उन लोगों की डिमांड को सेटिस्फाई कर सके. तो बॉक्स ऑफिस को देखना बहुत अहम है लेकिन साथ में बॉक्स ऑफिस की ट्रेंड पर क्या है, ये भी देखना बहुत इंपॉर्टेंट है.'


₹100 करोड़ का कलेक्शन, फिर भी घाटे का सौदा होना संभव?

इसपर उन्होंने कहा, हां, अगर उन्होंने महंगी फिल्म ली है कोई बहुत बड़ी फिल्म और एक्सपेक्टेशन थी कि वो बहुत ज्यादा बड़ा बिजनेस करे. तो अगर वो 100 करोड़ भी करे तो कम पड़ सकता है. ऐसा हो सकता है और ऐसा कई बार हुआ है. कमल जियानचंदानी ने कहा, 'जैसे आने वाली कोई बड़ी फिल्म है अगर एक डिस्ट्रीब्यूटर ने इस हिसाब से प्रोड्यूसर के साथ डील की है कि यह 400 करोड़ करेगी बॉक्स ऑफिस पर और अगर उसका बिजनेस सिर्फ 100 करोड़ होता है, तो डिस्ट्रीब्यूटर को 100 करोड़ करने के बावजूद नुकसान होगा क्योंकि डील 400 करोड़ के हिसाब से हुई थी.'


Break-even Point आखिर होता क्या है?

सीधी भाषा में कहें तो यह वह स्थिति है जहां फिल्म को जितनी रकम वापस लानी है, उतनी रकम वापस आ जाती है और न फायदा होता है, न नुकसान. लेकिन यहां भी सिर्फ फिल्म का प्रोडक्शन बजट नहीं देखा जाता. डिस्ट्रीब्यूशन और मार्केटिंग जैसी लागतों को भी ध्यान में रखना पड़ सकता है.

किसी फिल्म पर कुल मिलाकर 100 करोड़ रुपये का खर्च आया. लेकिन बॉक्स ऑफिस से प्रोड्यूसर तक पहुंचने वाली रकम 100 करोड़ के बराबर नहीं होगी, क्योंकि टिकट की पूरी रकम निर्माता को नहीं मिलती. ऐसे में फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ का नेट कलेक्शन करने से कहीं ज्यादा कमाई करनी पड़ सकती है, ताकि उससे जुड़े सभी खर्चों की भरपाई हो सके. यही कारण है कि यह कहना कि ‘फिल्म 100 करोड़ में बनी है, इसलिए 100 करोड़ कमाते ही हिट हो जाएगी’ सही नहीं है.

Advance Booking से क्या संकेत मिलता है?

फिल्म की एडवांस बुकिंग रिलीज से पहले दर्शकों की शुरुआती दिलचस्पी का संकेत देती है. अगर किसी फिल्म की एडवांस बुकिंग मजबूत है, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि दर्शक फिल्म को लेकर उत्साहित हैं. इससे ओपनिंग डे मजबूत होने की उम्मीद बढ़ सकती है.लेकिन सिर्फ एडवांस बुकिंग देखकर फिल्म को हिट या फ्लॉप नहीं कहा जा सकता.

कई बार फिल्म की एडवांस बुकिंग शानदार होती है और पहले दिन बड़ा कलेक्शन आता है, लेकिन वीकेंड के बाद कमाई तेजी से गिर जाती है. वहीं कुछ फिल्में शुरुआत में धीमी रहती हैं लेकिन अच्छी चर्चा और पॉजिटिव वर्ड ऑफ माउथ के कारण बाद में तेजी पकड़ लेती हैं. इसलिए एडवांस बुकिंग को फिल्म की पूरी कमाई का फैसला नहीं, बल्कि शुरुआती संकेत समझना चाहिए. 

कमल जियानचंदानी ने कहा, 'एडवांस बुकिंग एक अच्छा इंडिकेटर है और अगर अच्छी एडवांस है किसी फिल्म की तो आप यह मान के चल सकते हैं कि यह अच्छी खुलेगी. लेकिन कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है कि  एडवांस बुकिंग लो है, फिर भी फिल्म की बड़ी ओपनिंग होती है. इसी तरह लो ओपनिंग होने का भी यह मतलब नहीं है कि फिल्म अच्छी नहीं खुलेगी, लेकिन हां, अच्छी एडवांस होने का यह मतलब है कि फिल्म जरूर अच्छी खुलेगी.' लेकिन वहीं, फिर हाल ही में रिलीज हुई 'टॉक्सिक' और 'हनुमान अंश' का उदहारण देते हुए उन्होंने कहा, 'फिल्म की अच्छी ओपनिंग और उसका चलना, ये दोनों अलग बाते हैं. कई फिल्में अच्छी ओपनिंग के बाद में सस्टेन नहीं करतीं. कई फिल्में बहुत कमजोर खुलती हैं, पर बाद में वर्ड ऑफ़ माउथ से ग्रो करती हैं. इसीलिए जो बॉक्स ऑफिस पर ट्रेंड है उसे देखना बहुत जरूरी है.'

Opening Day और Lifetime Collection में अंतर

Opening Day यानी रिलीज के पहले दिन फिल्म ने कितना कलेक्शन किया. Lifetime Collection यानी सिनेमाघरों में फिल्म की पूरी रन के दौरान हुई कुल कमाई. इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर हो सकता है. मान लीजिए किसी फिल्म ने पहले दिन 30 करोड़ रुपये कमाए. अगर अगले दिनों में दर्शकों की संख्या गिर गई तो फिल्म का लाइफटाइम कलेक्शन उम्मीद से काफी कम रह सकता है.

दूसरी तरफ किसी फिल्म की शुरुआत 10 करोड़ रुपये से हुई लेकिन दर्शकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिली. फिल्म ने धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ी और कई हफ्तों तक चलती रही. ऐसी फिल्म का लाइफटाइम कलेक्शन उसकी ओपनिंग के मुकाबले बहुत बड़ा हो सकता है. यानी सिर्फ पहले दिन की कमाई देखकर फिल्म का अंतिम फैसला करना जल्दबाजी होगी.

Weekend Collection क्यों अहम है?

पहले दिन के बाद शनिवार और रविवार फिल्म के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. अगर शुक्रवार के मुकाबले शनिवार को कमाई बढ़ती है और रविवार को भी मजबूत रहती है, तो यह दर्शाता है कि फिल्म को दर्शकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. लेकिन अगर ओपनिंग के बाद कमाई लगातार गिरती जाए, तो फिल्म के लिए आगे की राह मुश्किल हो सकती है. इसीलिए ट्रेड में Friday, Weekend, Week 1 और Lifetime Collection जैसे आंकड़ों को अलग-अलग देखा जाता है.

OTT, Satellite और Music Rights का क्या रोल है?

आज के समय में फिल्म की कमाई सिर्फ थिएटर तक सीमित नहीं है. फिल्म के OTT राइट्स, सैटेलाइट राइट्स, म्यूजिक राइट्स और दूसरे डिजिटल या विदेशी बाजारों से भी कमाई हो सकती है. किसी फिल्म का थिएटर बिजनेस उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, लेकिन फिल्म के OTT और दूसरे राइट्स अच्छी कीमत पर बिक गए. इससे प्रोड्यूसर के कुल नुकसान को कम किया जा सकता है या फिल्म मुनाफे में भी आ सकती है.

लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है. किसी फिल्म का OTT राइट्स अच्छी कीमत पर बिकना और फिल्म का थिएटर में हिट होना दो अलग बातें हैं. ट्रेड में फिल्म के theatrical performance को अलग से देखा जाता है, जबकि प्रोड्यूसर के लिए कुल revenue picture ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है.

₹100 करोड़ कमाने के बाद भी कोई फिल्म फ्लॉप कैसे हो सकती है?

मान लीजिए किसी फिल्म की कुल लागत 150 करोड़ रुपये है. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ का नेट कलेक्शन करती है. ऊपर से देखने पर 100 करोड़ का आंकड़ा बड़ा लगता है. लेकिन अगर फिल्म की लागत काफी ज्यादा है, तो यह कमाई उसकी लागत निकालने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती. दूसरी तरफ 30 करोड़ रुपये की लागत वाली फिल्म अगर 100 करोड़ का नेट कलेक्शन करती है, तो उसका प्रदर्शन बेहद शानदार माना जा सकता है. यानी एक ही 100 करोड़ का कलेक्शन दो फिल्मों के लिए बिल्कुल अलग नतीजा दे सकता है. इसीलिए बॉक्स ऑफिस पर सिर्फ बड़ा नंबर देखना पर्याप्त नहीं है. उस नंबर को फिल्म के बजट और बिजनेस मॉडल के साथ जोड़कर देखना पड़ता है.

तो फिर Hit, Superhit और Blockbuster कैसे तय होता है?

यहां एक जरूरी बात समझनी होगी. बॉलीवुड में हिट, सुपरहिट और ब्लॉकबस्टर की कोई एक आधिकारिक सरकारी या इंडस्ट्री-वाइड फिक्स टेबल नहीं है, जिसमें लिखा हो कि इतने करोड़ पर फिल्म हिट और इतने करोड़ पर सुपरहिट होगी. ट्रेड एनालिस्ट, डिस्ट्रीब्यूटर और मीडिया आम तौर पर फिल्म की लागत, डिस्ट्रीब्यूटर शेयर, रिकवरी और मुनाफे को देखकर उसका verdict बताते हैं.

आम समझ के लिए इसे इस तरह समझ सकते हैं.

Flop: फिल्म अपनी लागत और निवेश की भरपाई नहीं कर पाती और नुकसान होता है.

Average: फिल्म लगभग अपनी लागत निकाल लेती है, लेकिन बड़ा मुनाफा नहीं दे पाती.

Hit: फिल्म अपनी लागत निकालने के बाद मुनाफा कमाती है.

Superhit: फिल्म उम्मीद से काफी बेहतर प्रदर्शन करती है और अच्छा मुनाफा देती है.

Blockbuster: फिल्म असाधारण बिजनेस करती है और अपने निवेश के मुकाबले बहुत बड़ा मुनाफा देती है.

लेकिन ये शब्द अलग-अलग ट्रेड स्रोतों में थोड़े अलग तरीके से इस्तेमाल हो सकते हैं. इसलिए किसी फिल्म का verdict पढ़ते समय उसके बजट, डिस्ट्रीब्यूटर शेयर और वास्तविक रिकवरी को देखना ज्यादा जरूरी है.

Golden Jubilee और Platinum Jubilee क्या हैं?

ये शब्द बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से अलग एक पुराने दौर की सिनेमाई परंपरा से जुड़े हैं. पहले फिल्मों की सफलता इस बात से भी मापी जाती थी कि वह कितने हफ्तों तक सिनेमाघरों में चल रही है. इके लिए फिल्म के जानेमाने क्रिटिक्स प्रदीप सरदाना ने तीनों में आसन फर्क बताया है. उन्होंने कहा, ' सिल्वर जुबली का मतलब आम तौर पर फिल्म का 25 हफ्तों तक थियेटर चलना माना जाता था. गोल्डन जुबली 50 हफ्तों के रन से जुड़ा शब्द था. वहीं, प्लेटिनम जुबली का मतलब था किसी भी फिल्म का 75 हफ्तों तक बड़े पर्दे पर चलना.'

कुछ फिल्मों के 100 हफ्तों तक चलने पर भी विशेष रूप से चर्चा होती थी. लेकिन आज के मल्टीप्लेक्स और तेज डिजिटल रिलीज के दौर में फिल्मों का इतने लंबे समय तक थिएटर में चलना बेहद दुर्लभ है. अब किसी फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना उसके बॉक्स ऑफिस बिजनेस, मुनाफे और दर्शकों की प्रतिक्रिया से जुड़ा है.

100 करोड़ की फिल्म का पैसा आखिर कहां जाता है?

इसे एक आसान उदाहरण से समझिए. मान लीजिए किसी फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 100 करोड़ रुपये है. सबसे पहले टिकट से जुड़े टैक्स का हिस्सा अलग होता है. इसके बाद नेट कलेक्शन बचता है.फिर थिएटर और डिस्ट्रीब्यूटर के बीच रकम का बंटवारा होता है. यह बंटवारा अलग-अलग डील और हफ्तों के हिसाब से बदल सकता है.

डिस्ट्रीब्यूटर को मिलने वाली रकम में से उसकी लागत, डील और दूसरे खर्चों का हिसाब आता है.इसके बाद प्रोड्यूसर की तरफ आने वाली रकम को फिल्म की लागत और दूसरे खर्चों के मुकाबले देखा जाता है. यानी 100 करोड़ का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कई चरणों से गुजरता है. इसे सीधे प्रोड्यूसर का 100 करोड़ रुपये का मुनाफा समझना गलत होगा.

फिल्म की सफलता का असली पैमाना क्या है?

अगर किसी फिल्म की लागत 50 करोड़ रुपये है और वह कई माध्यमों से अपनी लागत निकालने के बाद अच्छा मुनाफा देती है, तो वह सफल फिल्म हो सकती है.वहीं 200 करोड़ रुपये के बड़े बजट वाली फिल्म 150 करोड़ का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन करने के बावजूद नुकसान में जा सकती है. यानी फिल्म की सफलता को समझने के लिए पांच चीजों पर नजर रखनी चाहिए.

पहला - फिल्म का कुल बजट कितना था.

दूसरा - डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स किस कीमत पर बेचे गए.

तीसरा - थिएटर से प्रोड्यूसर और डिस्ट्रीब्यूटर तक वास्तव में कितनी रकम पहुंची.

चौथा - OTT, सैटेलाइट, म्यूजिक और दूसरे राइट्स से कितनी रिकवरी हुई.

पांचवां - कुल लागत के मुकाबले फिल्म ने कितना मुनाफा कमाया.

इसको हम ऐसे समझ सकते हैं कि फिल्म A का बजट 100 करोड़ रुपये है. फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 100 करोड़ रुपये है. ऐसे में किसी को भी पहली नजर में लगेगा कि फिल्म ने अपना पूरा बजट निकाल लिया. लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है. क्योंकि बॉक्स ऑफिस की पूरी रकम प्रोड्यूसर के पास नहीं जाती अब वहीं, फिल्म B का बजट सिर्फ 40 करोड़ रुपये है और उसने 100 करोड़ रुपये का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन किया. दोनों फिल्मों का कलेक्शन एक जैसा है, लेकिन दोनों की सफलता एक जैसी नहीं होगी. फिल्म B के पास अपनी लागत के मुकाबले ज्यादा रिकवरी और मुनाफे की गुंजाइश है. इसलिए कम बजट वाली फिल्म का 100 करोड़ कमाना कई बार बड़े बजट वाली फिल्म के 100 करोड़ कमाने से ज्यादा सफल माना जा सकता है. यही बॉक्स ऑफिस का असली खेल है.

क्या ज्यादा करोड़ कमाने वाली फिल्म ही बड़ी Hit है?

नहीं. बॉक्स ऑफिस पर 500 करोड़ कमाने वाली फिल्म निश्चित रूप से बड़ा नंबर हासिल करती है, लेकिन अगर उसका बजट भी बहुत बड़ा है तो उसका मुनाफा उसी अनुपात में देखना होगा. इसके उलट कोई छोटी फिल्म कम स्क्रीन और छोटे बजट के बावजूद अपनी लागत से कई गुना ज्यादा कमाई कर ले, तो उसका बिजनेस प्रतिशत के हिसाब से कहीं ज्यादा मजबूत हो सकता है. इसीलिए ट्रेड में कई बार फिल्म के कुल कलेक्शन के साथ उसका Return on Investment यानी निवेश के मुकाबले रिटर्न भी महत्वपूर्ण माना जाता है.

Verdict समझते समय किन बातों का ध्यान रखें?

जब भी किसी फिल्म के बारे में पढ़ें कि वह Hit, Superhit या Blockbuster है, तो सिर्फ उसके बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को देखकर निष्कर्ष न निकालें. सबसे पहले फिल्म का बजट देखें. इसके बाद यह देखें कि रिपोर्ट में Gross Collection बताया गया है या Net Collection. फिर देखें कि डिस्ट्रीब्यूटर शेयर कितना है और फिल्म ने अपनी लागत की कितनी रिकवरी की है. इसके अलावा OTT और दूसरे राइट्स से हुई कमाई को अलग समझें. इससे फिल्म के प्रोड्यूसर का कुल बिजनेस मजबूत हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि फिल्म थिएटर में भी हिट रही.

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About the Author

Swati Singh

Swati Singh

स्वाति सिंह एक वरिष्ठ डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें न्यूज़ मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वह Zee News Hindi की डिजिटल टीम के एंटरटेनमेंट (मनोरंजन) सेक्शन में काम कर रही हैं. स्वाति की एक्सपर्टीज बॉलीवुड न्यूज़, सिनेमा, एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के ट्रेंड्स और सेलेब्स की इन-डेप्थ रिपोर्टिंग में है.अपने करियर के दौरान स्वाति ने आयुष्मान खुराना, नीना गुप्ता, गजराज राव और ध्वनि भानुशाली जैसी कई जानी-मानी बॉलीवुड और म्यूजिक इंडस्ट्री की हस्तियों के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू किए हैं. Zee News से पहले उन्होंने अमर उजाला, लाइव हिंदुस्तान और लोकमत जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं, जहां काम के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया है.माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU) से मास कम्युनिकेशन और सुरेश ज्ञान विहार यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (MBA) की डिग्री हासिल करने वाली स्वाति, मनोरंजन जगत की खबरों को पाठकों तक रोचक और सटीक ढंग से पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं.आप स्वाति सिंह से swati.kumari@india.com पर सीधे ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.
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