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जब भी नसीरुद्दीन शाह किसी सार्वजनिक मुद्दे पर बोलते हैं, तो उन्हें सिर्फ अपनी राजनीतिक सोच का ही नहीं, बल्कि अपनी पहचान का भी बचाव करना पड़ता है. उनसे उनकी पहचान के बारे में सवाल पूछे जाते हैं, मानो असहमति जताने का उनका अधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी पृष्ठभूमि क्या है. हाल ही में इस दिग्गज अभिनेता ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया सहित कई विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों का समर्थन किया और खुद को 'दिमागी नक्सल' कहे जाने को अपना लिया.
दरअसल, बीते दिनों नसीरुद्दीन शाह ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था, मैं गर्व से कहता हूं कि मैं दिमागी नक्सली हूं.' उनके इस बयान को लेकर खूब चर्चा हुई. इस वीडियो में उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल किया था कि युवाओं की हिम्मत तोड़ने, शिक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और लोकतंत्र को खतरे में डालने के लिए और क्या-क्या किया जाएगा. उन्होंने आलोचकों द्वारा 'एंटी-नेशनल' और 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' जैसे दिए गए संबोधनों पर भी कड़ा पलटवार किया था. उनके इस बयान के बाद एक बार फिर ये चर्चा हुई कि आखिर किसी कलाकार का गुस्सा किन बातों से पैदा होता है और वह अपनी असहमति किस तरह जाहिर करता है. आइए जानते हैं, फिल्म के अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता था. साथ ही नसीरुद्दीन शाह की असल जिंदगी में कौन-से अनुभव उनके व्यक्तित्व को आकार देते रहे.
साथ ही एक्टर पुनीत इस्सर से लेकर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी शाह की टिप्पणी की आलोचना की. ऐसे में लगभग 46 साल पहले नसीरुद्दीन शाह ने 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है' का उनका किरदार सबको याद आ गया. इस फिल्म में एक्टर ने ऐसा ही एक किरदार निभाया था, जो अपने आसपास की दुनिया से नाराज रहता है. लेकिन क्योंकि वो फिल्म थी, टाइम के साथ उसके गुस्से की दिशा और वजह कहानी के साथ बदलती दिखी.
1980 में रिलीज हुई निर्देशक सईद अख्तर मिर्जा की फिल्म 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है' के एक काल्पनिक पात्र का नाम अल्बर्ट पिंटो है. फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने अल्बर्ट पिंटो का किरदार निभाया था. अल्बर्ट बॉम्बे (मुंबई) का एक युवा ईसाई कार मैकेनिक है, जो खुद को अपनी मेहनत से आगे बढ़ने वाला इंसान मानता है. उसे अपनी कड़ी मेहनत पर गर्व है, वह अमीर ग्राहकों के बीच उठता-बैठता है, और शुरुआत में मजदूर वर्ग की हड़तालों को गलत मानता है.
उसका मानना है कि मजदूर या तो आलसी हैं या उन्हें गुमराह किया गया है. लेकिन उनकी जिंदगी में अहम मोड़ तब आता है, जब उसके मिल-मजदूर पिता के साथ पूंजीपतियों द्वारा भेजे गए गुंडों द्वारा बदसलूकी की जाती है, तो अल्बर्ट का नजरिया पूरी तरह बदल जाता है. उसे समझ आ जाता है कि असली शोषण करने वाले कौन हैं.

फिल्म में अल्बर्ट अपनी जिंदगी से असंतुष्टि के चलते नाराज रहता है. वो मेहनतकाश इंसान होता है, लेकिन साथ ही बेहतर जिंदगी का सपना भी देखता है. लेकिन जब ऐसा होता नहीं दिखता तो उसके अंदर अपनी स्थिति को लेकर बेचैनी होती है.
-अल्बर्ट हमेशा से अमीरों जैसी जिंदगी जीना चाहता है. उसके गैराज में जब जब कोई अमीर ग्राहक आता है तो वो उसे देखकर इम्प्रेस हो जाता है. ये चाह उसे अपने जैसे मजदूरों से दूर कर देती है.
-काम करने वाले मजदूर जब अपने हक के लिए हड़ताल पर जाते हैं, इससे भी वो चिढ़ जाता है. उसे लगता है कि ये सब काम से बचने के लिए छोटी-छोटी फिजूल बातों का विरोध कर रहे हैं.
-साथ ही अल्बर्ट पर अमीर ग्राहकों की सोच का असर बहुत जल्दी होता है. जब कोई अमीर ग्राहक उसे समझाता है कि अच्छे कामगार हड़ताल नहीं करते. ये बाते उसपर ज्यादा असर डालती हैं.
-अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर भी अल्बर्ट गुस्से में रहता है. वह इस स्थिति से बाहर निकलना चाहता है, लेकिन रास्ता साफ नहीं दिखता.
-अल्बर्ट के पिता मिल में मजदूरी का काम करते हैं. ऐसे में अल्बर्ट अपने पिता की जिंदगी को खुद को अलग रखना चाहता है. हालांकि, बाद में पिता के साथ हुई घटना उसे इस दुनिया की हकीकत दिखाती है.
-जब अल्बर्ट की सोच में तबदीली आती है तो, वो मिल मालिकों की ताकत और मजदूरों की बेबसी को एलकार नाराज रहता है. कहानी में उसके पिता को मिल मालिकों के गुंडों के जरिए प्रताड़ित किया जाता है. तब उसे समझ आता है कि ताकत किसके पास है और नुकसान कौन उठा रहा है.
-अल्बर्ट को शोषण को समझने में देर लगती है. पहले वो मजदूरों को ही आलसी और परेशानी की वजह मानता है. लेकिन बाद में उसे एहसास होता है कि असली समस्या शोषण और असमानता है. ऐसे में जब उसकी खुद की पुरानी सोच टूटती है तो उसके भीतर गुस्सा पैदा हो जाता है.
-इन सब के आड़ भी अल्बर्ट का का गुस्सा शुरू में खुद उसी जैसे हालात में जी रहे लोगों पर निकलता है. फिर उसे एहसास होता है कि वह गलत लोगों से नाराज था.
-आखिरकार अल्बर्ट को समझ आता है कि व्यक्तिगत मेहनत से हर समस्या हल नहीं होती. यही समझ उसके गुस्से को एक नई दिशा देती है.

नसीरुद्दीन शाह ने अपने हालिया बयान में छात्रों की आवाज, शिक्षा संस्थानों का माहौल और लोकतांत्रिक अधिकार हैं. उन्होंने जामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों के समर्थन में सरकार से सवाल किए. एक्टर का 'दिमागी नक्सल' कहना भी चर्चा की वजह बना. उन्होंने इस शब्द को अपने लिए गर्व के साथ इस्तेमाल किया और उन तमाम नामों पर सवाल उठाया. हालांकि, यह कोई पहली बार नहीं है जब शाह ने किसी मुदद को लेकर अपनी असहमति जाहिर की हो. इससे पहले भी एक्टर शिक्षा, समाज, राजनीति और सिनेमा से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बोलते रहे हैं.
फिल्म में अल्बर्ट पिंटो के किरदार और नसीरुद्दीन शाह को एक जैसा मानना सही नहीं होगा. बता दें कि अल्बर्ट एक काल्पनिक किरदार है. वहीं, शाह एक व्यक्ति हैं, जो अपने अनुभव और विचारों के आधार पर सार्वजनिक मुद्दों पर राय रखते हैं. हालांकि, दोनों के गुस्से को लेकर दोनों को जोड़ा जा रहा है.
जहां अल्बर्ट शुरुआत में मजदूरों की हड़ताल से नाराज होता है, लेकिन बाद में उसे शोषण की वजह समझ आती है. दूसरी ओर, शाह अपने हालिया वीडियो में छात्रों के अधिकार और शिक्षा संस्थानों की स्थिति को लेकर सवाल उठाते हैं. दोनों उदाहरणों में असहमति जताने और सवाल पूछने का पहलू मौजूद है.
नसीरुद्दीन शाह का जन्म 20 जुलाई 1950 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुआ था. उनका परिवार चाहता था की वो पढ़ाई-लिखाई करें. लेकिन बचपन में शाह का मन किताबों में नहीं लगता था . उन्हें बचपन से फिल्मों, क्रिकेट और एक्टिंग का ज्यादा शौक था. लेकिन फिर भी उन्होंने अजमेर के सेंट एंसलम स्कूल और नैनीताल के सेंट जोसेफ कॉलेज में पढ़ाई की. हालांकि, स्कूल के दिनों में पढ़ाई में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा. एक इंटरव्यू में शाह ने बताया था कि वह नौवीं कक्षा में फेल हो गए थे. हालांकि, बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी की और एक्टिंग की ट्रेनिंग के लिए दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा पहुंचे.
नसीरुद्दीन शाह ने अपने इंटरव्यू में अपने पिता अली मोहम्मद शाह के साथ अपने रिश्तों पर खुलकर बात की है. एक्टर ने बताया था कि उनके पिता उन्हें अपने बड़े भाइयों की तरह कोई सम्मानजनक और सेफ पेशा चुने. वो नसीरुद्दीन भी डॉक्टर बनाना चाहते थे. बता दें कि शाह के एक भाई सेना में अधिकारी थे, जबकि दूसरे ने इंजीनियरिंग की राह चुनी. लेकिन शाह का मन एक्टिंग, थिएटर और क्रिकेट में ज्यादा लगता था. नसीरुद्दीन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता को लगता था कि एक्टिंग से जिंदगी नहीं चल सकती. उन्होंने एक बार उनसे यह सवाल भी किया था कि 'नौटंकी करोगे तो खाना कहां से खाओगे?'
उन्होंने अपने इंटरव्यू में यह भी बताया था कि पिता के साथ उनके रिश्ते सहज नहीं थे. जबकि उनकी मां का रवैया उनके प्रति ज्यादा सहज और बिना शर्त प्यार वाला था. एक्टर ने अपनी आत्मकथा 'And Then One Day' में भी पिता के साथ इस तनाव का जिक्र है. शाह ने लिखा कि पिता के निधन के बाद उनकी कब्र पर जाकर उन्होंने उनसे अपने मन की बातें कीं.
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नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह को अक्सर बॉलीवुड के सबसे मजबूर जोड़ों में से एक माना जाता है. लोग उनकी ईमानदारी, एक-दूसरे के प्रति सम्मान और दशकों लंबे साथ की तारीफ करते हैं. लेकिन 1982 में रत्ना से शादी करने से कई साल पहले नसीरुद्दीन की पहली शादी काफी मुश्किलों भरी रही थी. उनकी पहली पत्नी परवीन मुराद थीं, जिन्हें मनारा सीकरी (अभिनेत्री सुरेखा सीकरी की बहन) के नाम से भी जाना जाता था. उनसे नसीरुद्दीन की एक बेटी, हीबा है. अपनी आत्मकथा 'एंड देन वन डे' में इस दिग्गज अभिनेता ने उस दौर को बहुत ही बेबाकी से याद किया है. उन्होंने माना है कि अपनी बीस साल की उम्र के शुरुआती दौर में, वे एक ऐसे पति थे जो भावनात्मक रूप से परिपक्व नहीं थे, और एक ऐसे पिता थे जो अपनी बेटी के जीवन में मौजूद नहीं थे.
यह कहानी 1960 के दशक के आखिर की है, जब 19 साल के नसीरुद्दीन शाह, जो उस समय अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे और उन्हें थिएटर से प्यार हो गया. जहां उनके परिवार ने उनके एक्टिंग के शौक का कड़ा विरोध किया, वहीं उन्हें उसी यूनिवर्सिटी की 34 साल की मेडिकल इंटर्न परवीन मुराद का पूरा साथ मिला. अपने सपने पर सच में यकीन रखने वाली इकलौती इंसान से मिले इस प्रोत्साहन के चलते नसीरुद्दीन को परवीन से गहरा प्यार हो गया. भले ही दोनों की उम्र में 15 साल का अंतर था और आखिरकार दोनों ने शादी कर ली.
जल्द ही उनकी शादी के सामने मुश्किलें आ गईं. शादी से पहले ही एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई, परिवार का विरोध. नसीरुद्दीन का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था, क्योंकि परवीन तलाकशुदा थीं. उनके बच्चे थे और वे नसीरुद्दीन से 14-15 साल बड़ी थीं. वहीं, परवीन के परिवार को भी कुछ शंकाएं थीं. उन्होंने मांग रखी कि अगर भविष्य में तलाक होता है, तो एक बड़ी रकम 'मेहर' (तलाक के बाद दी जाने वाली राशि) के तौर पर दी जाएगी. समय के साथ, प्राथमिकताओं में अंतर के कारण यह जोड़ा एक-दूसरे से दूर हो गया और धीरे-धीरे उन्होंने अलग होने का फैसला कर लिया.
तलाक के बाद बॉलीवुड के इस दिग्गज एक्टर को परवीन को एक बड़ी रकम गुजारे-भत्ते के तौर पर देनी पड़ी, जिस पर उनके परिवार की सहमति थी. इस आर्थिक जिम्मेदारी की वजह से उनके लिए जीवन में आगे बढ़ना मुश्किल हो गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूरा भुगतान करने में उन्हें एक दशक से भी ज्यादा का समय लग गया. इस दौरान नसीरुद्दीन ने अपना अभिनय करियर जारी रखा और कई सालों बाद वे फिल्म 'मासूम' में नजर आए. इस फिल्म से हुई कमाई की मदद से वे पूरा गुजारे-भत्ता चुका पाए, और इस तरह 12 साल बाद आखिरकार यह मामला सुलझ गया.

जब नसीरुद्दीन अपनी पहली पत्नी को गुजारा-भत्ता (एलिमनी) देने की प्रक्रिया से गुजर रहे थे, तब 1975 में थिएटर में काम करने के दौरान उनकी मुलाकात रत्ना पाठक से हुई. उनकी दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई और वे एक-दूसरे को डेट करने लगे. चूंकि नसीरुद्दीन अपनी पहली शादी से कानूनी तौर पर पूरी तरह मुक्त नहीं हुए थे, इसलिए उस समय वे शादी नहीं कर सकते थे. ऐसे में उन्होंने 'लिव-इन रिलेशनशिप' में साथ रहने का फैसला किया. लगभग सात साल तक एक-दूसरे को डेट करने के बाद 1982 में नसीरुद्दीन और रत्ना ने शादी कर ली और अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की. जल्द ही उनके दो बेटे हुए, इमाद शाह और विवान शाह. 2026 तक वे चार दशकों से भी अधिक समय से साथ हैं और एक-दूसरे के लिए हमेशा एक मजबूत सहारा बने रहे हैं.
नसीरुद्दीन शाह भारत के सबसे सम्मानित अभिनेताओं में से एक हैं. 1970 के दशक में 'निशांत' और 'आक्रोश' जैसी प्रभावशाली फिल्मों से शुरुआत करने के बाद उन्होंने 'मासूम', 'कर्मा' और 'त्रिवेद' जैसी फिल्मों में गंभीर किरदारों और मुख्यधारा की हिट फिल्मों दोनों में बेहतरीन काम किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए अपने काम कई राष्ट्रीय पुरस्कारों और पद्म भूषण जैसे सम्मानों के साथ उन्हें नवाजा गया. हालांकि, उनका ये करियर इतना आसान नहीं था.
नसीरुद्दीन शाह ने अपने लंबे करियर में कई तरह के किरदार निभाए हैं, लेकिन पर्दे से बाहर भी उनकी एक अलग पहचान रही है. वह कई बार ऐसे मुद्दों पर बोलते हैं, जिन पर फिल्म इंडस्ट्री के दूसरे लोग चुप रहना पसंद करते हैं. कभी वह फिल्मों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं, कभी समाज में बढ़ती नफरत पर और कभी शिक्षा व लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखते हैं. उनकी इस आदत से हर कोई सहमत हो, ऐसा जरूरी नहीं. उनके बयानों पर आलोचना भी होती है और समर्थन भी मिलता है. लेकिन उनका सार्वजनिक व्यक्तित्व इसी बेबाकी से पहचाना जाता है. हालिया जामिया बयान भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है.
'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है' में नसीरुद्दीन शाह का किरदार अपनी नाराजगी की असली वजह समझने में वक्त लगाता है. असल जिंदगी में शाह अपने विचारों और असहमति को सीधे सामने रखते हैं. दोनों के बीच समानता खोजने का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि गुस्सा सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि कई बार किसी सवाल, अनुभव या असहमति की अभिव्यक्ति भी होता है.