AI से दूरी, कागज से दोस्ती! इस यूनिवर्सिटी में छात्रों की पढ़ाई का बदलेगा तरीका
शिकागो यूनिवर्सिटी के सोशल साइंस कोर में छात्र मुख्य रूप से कागज पर पढ़ेंगे, बिना डिवाइस चर्चा करेंगे और AI की मदद से लिखने पर रोक होगी. जानिए नई नीति में क्या बदलेगा.
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के सोशल साइंसेज कॉलेजिएट डिवीजन ने अपनी सोशल साइंसेज कोर सीबीएसई के लिए ऐसी गाइडलाइन जारी की है, जिसमें पढ़ाई के दौरान छात्रों को मुख्य रूप से कागज पर मौजूद टेक्स्ट के साथ काम करने और बिना डिवाइस के निर्देशित चर्चाओं में हिस्सा लेने पर जोर दिया गया है. AI की मदद से लिखने पर भी रोक रहेगी. वहीं, शिक्षकों को सामान्य तौर पर AI की मदद से छात्रों की कॉपियां जांचने की अनुमति नहीं होगी. कोर्स का सिलेबस भी मानव विशेषज्ञ तैयार करेंगे. विश्वविद्यालय का कहना है कि इसका उद्देश्य तकनीक को पूरी तरह हटाना नहीं, बल्कि छात्रों को AI पर निर्भर हुए बिना पढ़ने, लिखने और सोचने का अवसर देना है.
नई गाइडलाइन का मुख्य विचार छात्रों को कुछ समय के लिए स्क्रीन और AI से दूर रखकर पढ़ाई के मूल तरीकों पर वापस लाना है. सोशल साइंस कोर के तहत आने वाले कोर्स चर्चा आधारित हैं, इसलिए आमने-सामने बातचीत को कक्षा के अनुभव का अहम हिस्सा माना गया है. विश्वविद्यालय के अनुसार, शिक्षकों के बीच इस बात को लेकर मजबूत सहमति है कि इन कोर्सों के लिए AI-free वातावरण बेहतर हो सकता है. इसका मतलब छात्रों के लिए क्लास का सामान्य दृश्य भी बदल सकता है. डिजिटल रीडिंग की जगह प्रिंटेड टेक्स्ट, लैपटॉप स्क्रीन की जगह बातचीत और संभवतः डिजिटल नोट्स की जगह हाथ से लिखे नोट्स दिखाई दे सकते हैं.
क्या यूनिवर्सिटी में टेक्नोलॉजी पर पूरी रोक है?
नई नीति को पूरी तरह Technology Ban नहीं माना जा रहा है. शिक्षकों को विशेष शैक्षणिक जरूरत होने पर टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने की अनुमति के लिए आवेदन करने का विकल्प दिया गया है. उदाहरण के तौर पर डेटा सेट की जांच, कोड से जुड़ी समस्या हल करने, टेक्स्ट में बदलाव करने या लाइब्रेरी संसाधनों तक पहुंचने जैसे अकादमिक कामों के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके अलावा जिन छात्रों को दिव्यांगता से जुड़ी स्वीकृत सुविधाओं के तहत डिवाइस इस्तेमाल करने की जरूरत है, उन्हें इसकी अनुमति रहेगी. यानी नीति का उद्देश्य हर स्थिति में तकनीक को हटाना नहीं है.
क्या प्रोफेसर भी AI इस्तेमाल कर पाएंगे?
प्रोफेसरों के लिए भी पूरी तरह AI इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाई गई है. अगर किसी शैक्षणिक उद्देश्य के लिए AI का प्रयोग उपयोगी माना जाता है, तो शिक्षक इसका इस्तेमाल करने का प्रयोग कर सकते हैं. हालांकि इसके लिए डिविजन के नेतृत्व से परामर्श करना होगा. वहीं छात्रों के AI-assisted writing पर रोक रहेगी और शिक्षकों को सामान्य तौर पर AI के जरिए ग्रेडिंग करने की अनुमति नहीं होगी. कोर्स के सिलेबस भी मानव विद्वानों द्वारा तैयार किए जाएंगे. इससे नीति का फोकस इस बात पर दिखाई देता है कि छात्रों के सीखने और मूल्यांकन में मानवीय निर्णय की भूमिका बनी रहे.
फिर AI की सुविधा छात्रों को कहां मिलेगी?
दिलचस्प बात यह है कि यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो AI को पूरी तरह खारिज नहीं कर रही है. सितंबर से छात्रों के लिए Anthropic के Claude Enterprise तक पहुंच भी शुरू की जा रही है. साथ ही विश्वविद्यालय AI के इस्तेमाल को लेकर व्यापक नजरिया अपनाने की बात कर रहा है, जिसमें इसकी उपयोगिता के साथ इसकी सीमाओं पर भी विचार किया जाएगा. इस तरह Social Sciences Core की नीति को पूरे विश्वविद्यालय में AI के विरोध के तौर पर देखना सही नहीं होगा. इसका संदेश ज्यादा स्पष्ट रूप से यह है कि हर तरह की पढ़ाई के लिए AI जरूरी नहीं है. कुछ विषयों में छात्रों को तकनीक के बिना पढ़ने, लिखने, चर्चा करने और खुद निर्णय लेने का अनुभव भी जरूरी माना जा रहा है.
क्या दूसरे विभाग भी यही रास्ता अपना रहे हैं?
सोशल साइंस कोर अकेला ऐसा हिस्सा नहीं है जहां तकनीक के इस्तेमाल को सीमित करने की दिशा में कदम उठाया गया है. यूनिवर्सिटी के Law School ने भी अगले शैक्षणिक वर्ष से ज्यादातर प्रथम वर्ष के Core Courses में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है. इससे विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान स्क्रीन और डिजिटल टूल्स की भूमिका पर चल रही बहस का अंदाजा लगाया जा सकता है. फिलहाल Social Sciences Core का मॉडल पूरी तरह तकनीक-विरोधी नहीं है, बल्कि यह तय करने की कोशिश करता है कि छात्रों को किन परिस्थितियों में AI और डिजिटल डिवाइस की मदद लेनी चाहिए और किन परिस्थितियों में उन्हें अपने पढ़ने, लिखने, तर्क और निर्णय लेने के कौशल पर निर्भर रहना चाहिए.