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पहाड़ों में कभी बच्चों की आवाजों से गूंजने वाले स्कूल अब कई जगह खाली कमरों की कहानी कह रहे हैं. कहीं स्कूल का अपना भवन नहीं है, तो कहीं बच्चों की संख्या इतनी कम हो गई कि स्कूल को दूसरे संस्थान में मर्ज करना पड़ा. हिमाचल प्रदेश में 177 सरकारी स्कूल अपनी इमारत के बिना चल रहे हैं, जबकि पिछले तीन साल में 1,526 स्कूल बंद या पुनर्गठित किए गए.
वहीं, दूसरी ओर उत्तराखंड में 2020 से 2025 के बीच 826 प्राथमिक स्कूल बंद हुए. दोनों राज्यों में सरकार इसकी बड़ी वजह कम नामांकन और पलायन बता रही है. लेकिन सवाल सिर्फ स्कूल बंद होने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि पहाड़ों से परिवार और बच्चे आखिर क्यों दूर हो रहे हैं और उन्हें रोकने के लिए क्या किया जा रहा है.
हिमाचल प्रदेश में 177 सरकारी स्कूल फिलहाल अपने भवन के बिना चल रहे हैं. इनकी कक्षाएं रेस्ट हाउस, पंचायत भवन, सामुदायिक केंद्र, महिला मंडल भवन, निजी परिसरों और दूसरे सरकारी स्कूलों की इमारतों में लग रही हैं. शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने विधानसभा में भाजपा विधायक इंद्र दत्त लखनपाल के सवाल के जवाब में यह जानकारी दी. इनमें 12 स्कूल ऐसे हैं, जिनके पुराने भवन प्राकृतिक आपदा के बाद असुरक्षित घोषित किए गए. इससे पता चलता है कि पहाड़ी इलाकों में स्कूलों की समस्या केवल विद्यार्थियों की संख्या तक सीमित नहीं है. आपदा, भवन और जमीन की उपलब्धता भी शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रही है.
चंबा जिले के कुनरा स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय का मामला इसकी गंभीरता दिखाता है. आपदा के बाद स्कूल का मूल भवन असुरक्षित घोषित कर दिया गया था. इसके बाद स्कूल को लोक निर्माण विभाग के रेस्ट हाउस में स्थानांतरित किया गया. फिलहाल यहां चार कमरों में 99 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं. नए भवन के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन इसके पूरा होने की निश्चित समयसीमा सरकार ने नहीं बताई है. पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे मामलों में केवल भवन बनाना ही चुनौती नहीं है. सुरक्षित जमीन तलाशना, जमीन का अधिग्रहण करना और इसके बाद निर्माण पूरा करना भी लंबी प्रक्रिया बन जाती है.
सरकार के अनुसार हिमाचल में 28 स्कूल भवनों का निर्माण चल रहा है, जबकि 14 अन्य भवनों के लिए धनराशि जारी की जा चुकी है. कई दूसरे स्कूलों के मामलों में जमीन उपलब्ध नहीं होने या भूमि अधिग्रहण लंबित होने से निर्माण आगे नहीं बढ़ पाया है. यानी समस्या केवल बजट की नहीं है. पहाड़ी राज्य में उपयुक्त जमीन मिलना और अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होना भी बड़ी चुनौती है. सरकार स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए केंद्र की समग्र शिक्षा योजना के तहत नए भवन, अतिरिक्त कमरे, मरम्मत और आपदा से क्षतिग्रस्त भवनों के पुनर्निर्माण जैसे काम कर रही है.
हिमाचल में पिछले तीन वर्षों में 1,526 स्कूल बंद या पुनर्गठित किए गए. सरकार का तर्क है कि कम नामांकन वाले स्कूलों के विलय और युक्तिकरण से संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. शिक्षा विभाग के पास 1,473 स्कूल भवन हैं, जिनमें से 577 भवन दूसरे विभागों और सामुदायिक संस्थाओं को दिए जा चुके हैं. इनका इस्तेमाल पंचायत, महिला मंडल, युवक मंडल, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य, आयुष और पशुपालन जैसी गतिविधियों में हो रहा है. वहीं उत्तराखंड में 2020 से 2025 के बीच 826 प्राथमिक स्कूल बंद हुए. टिहरी में 262, पौड़ी गढ़वाल में 120 और पिथौरागढ़ में 104 स्कूल बंद हुए.
शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक स्कूलों की स्थिति को केवल भवन या मर्जर के आंकड़ों से नहीं देखा जा सकता. हिमाचल के 2025-26 समग्र शिक्षा दस्तावेज में 3,462 एकल-शिक्षक स्कूलों और कम नामांकन वाले स्कूलों की स्थिति पर भी ध्यान दिया गया है. ऐसे में बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए शिक्षक, सुरक्षित परिवहन, डिजिटल सुविधाएं और बुनियादी सुविधाएं जरूरी हैं.
उत्तराखंड में कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के बच्चों को नजदीकी बड़े स्कूलों में भेजने की व्यवस्था की जा रही है और 808 हेडमास्टरों की नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है. विशेषज्ञों के नजरिए से असली चुनौती यह है कि बच्चों को बेहतर सुविधाएं देने के साथ उन्हें अपने गांव और पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा से जोड़े रखा जाए.