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Success Story of Lieutenant Prajwal Samrit: 'किसी को शोहरत मिली, तो किसी को वसीयत, किसी को मिला सपना पूरा करने की विरासत.' एक ऐसे बेटे की सफलता की कहानी, जिसने दुनिया में आंखें ठीक से खोली भी नहीं थीं कि किस्मत ने उसके सिर से पिता का साया छीन लिया. जन्म के महज 45 दिन बाद जिस मां की आंखों में बेटे की किलकारी पर खुशी के आंसू होने चाहिए थे, वहां एक वीरांगना के दर्द और आंसुओं का सैलाब था. बेटे की उंगली थामने वाला हाथ और पत्नी का सुहाग, कारगिल की जंग में देश के नाम कुर्बान हो चुका था.
कारगिल युद्ध के दौरान महाराष्ट्र के वर्धा जिले की पुलगांव तहसील के रहने वाले प्रज्वल समरित के पिता लांस नायक कृष्णाजी समरित देश के लिए शहीद हो गए. पिता का चेहरा प्रज्वल ने कभी सामने से नहीं देखा, मगर उनकी हर सांस में देशसेवा का वही अधूरा सपना धड़कता था. आखिर दो-दो IIM के शानदार ऑफर्स को ठुकराकर प्रज्वल समरित ने लेफ्टिनेंट बनने तक का यह कठिन सफर कैसे तय किया? आइए जानते हैं.
साल 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान लेफ्टिनेंट प्रज्वल समरित के पिता लांस नायक कृष्णाजी समरित देश के लिए शहीद हो गए थे. प्रज्वल ने अपने पिता को कभी आँखों से नहीं देखा था, लेकिन उनकी बहादुरी के किस्से सुनकर बड़े हुए और यही वजह थी कि उन्होंने भारतीय सेना में जाने का पक्का इरादा कर लिया.
बचपन से ही प्रज्वल जानते थे कि उनके पिता सेना में अधिकारी बनना चाहते थे. पिता के इसी अधूरे सपने को सच करने के लिए उन्होंने लक्ष्य तय कर लिया. इसके लिए उन्होंने 12वीं की पढ़ाई के बाद एक साल का ड्रॉप लिया और नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) की तैयारी में जुट गए.
एनडीए के अपने पहले प्रयास और एसएसबी इंटरव्यू में उन्हें सफलता तो मिली, लेकिन मेडिकल परीक्षा पास न कर पाने के कारण वह अंतिम रूप से चयनित नहीं हो सके. हालांकि, इस असफलता ने उनके इरादों को कमजोर करने के बजाय और मजबूत कर दिया और वह अपने लक्ष्य पर डटे रहे.

भारतीय सेना में चयन न होने के कारण, उन्होंने पढ़ाई को छोड़ा नहीं. CAT परीक्षा में शामिल हुए और 97.51 पर्सेंटाइल के साथ उन्हें IIM इंदौर और IIM कोझिकोड में एडमिशन का मौका मिला, लेकिन उन्होंने दोनों आईआईएम से मिले ऑफर को ठुकरा दिया.
अपने पिता के सपने को पूरा करने की जिद ने प्रज्वल को आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के ऑफर्स से रोक लिया और उन्होंने अपना पूरा फोकस भारतीय सेना पर बनाए रखा. उनकी कड़ी मेहनत और लगन का नतीजा ये रहा कि 9वें प्रयास में उन्हें आखिरकार सफलता मिल गई. तमाम कड़े चरणों जैसे एसएसबी इंटरव्यू और मेडिकल परीक्षा को पार करने के बाद उनका चयन हुआ और उन्हें ट्रेनिंग के लिए आईएमए देहरादून भेजा गया.
कई वर्षों की कड़ी मेहनत आखिरकार रंग लाई और आर्मी की कठिन ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, दिसंबर 2024 में उन्हें भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन मिला. सेना में अधिकारी बनकर उन्होंने न सिर्फ अपने पिता का सपना पूरा किया, बल्कि हर उस युवा के लिए मिसाल कायम की जो देश सेवा का जज्बा रखता है. बेटे की इस ऐतिहासिक कामयाबी पर गर्व महसूस करते हुए मां सविता समरित ने कहा कि उनके पति की भी यही इच्छा थी कि उनका बेटा फौज में अफसर बने.