एक-दूसरे को दुश्मन बताने वाले ट्रंप और जिनपिंग अचानक गले क्यों मिले? जिनपिंग के भव्य स्वागत से क्या पाने की है चाहत
Xi Jinping's US Visit: एक-दूसरे को दुश्मन बताने वाले ट्रंप और जिनपिंग यूएस में अचानक गले मिल रहे हैं? आखिरकार ट्रंप, जिनपिंग के भव्य स्वागत से क्या पाना चाहते हैं.
Significance of Xi Jinping US Visit: अमेरिका और चीन ऐसे देश हैं, जिनके बीच दुनिया की आर्थिक और रणनीतिक ताकत बनने की प्रतिस्पर्धा चल रही है. ताइवान जैसे मुद्दे पर दोनों देशों के बीच युद्ध जैसा तनाव भी बन चुका है. लेकिन गुरुवार को जिनपिंग, ट्रंप के बुलावे पर साथ मिलकर चलने की रणनीति बनाने के लिए अमेरिका पहुंचे. जहां डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पत्नी मेलानिया ट्रंप के साथ सारे प्रोटोकॉल तोड़कर उनका भव्य स्वागत किया.
जिनपिंग के लिए व्हाइट हाउस में भव्य राजकीय स्वागत समारोह का आयोजन किया गया. जो व्हाइट हाउस के साउथ लॉन से रोज गार्डन तक फैला हुआ था. यानी इसका दायरा काफी बड़ा था. समारोह की शुरुआत साउथ पोर्टिको पर हुई, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और मेलानिया ट्रंप ने हाथ मिलाकर शी जिनपिंग का गर्मजोशी से स्वागत किया. इस ऐतिहासिक स्वागत में अमेरिका की थल सेना, नौसेना, और वायुसेना के कुल 479 सैनिकों ने हिस्सा लिया.
जिनपिंग का यूएस में ग्रैंड वेलकम
इसके बाद व्हाइट हाउस के रोज गार्डन में एक भव्य सैन्य परेड आयोजित की गई, जहां दोनों नेताओं ने ट्रूप रिव्यू यानी सैनिकों का निरीक्षण किया. इस समारोह के अंत में आसमान में अमेरिकी वायुसेना के एक B-2 स्पिरिट और चार F-22 रैप्टर लड़ाकू विमानों ने एक शानदार फ्लाईपास्ट किया. ये दुनिया के सबसे आधुनिक विमान हैं .
इस शानदार स्वागत के साथ साथ आज सारी दुनिया की नजर इस बात पर भी टिकी थी कि ये दोनों नेता व्हाइट हाउस से क्या संदेश देते हैं. पहले अमेरिका के राष्ट्रपति ने बोलने की शुरुआत की. डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उनके और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच का रिश्ता आपसी सम्मान पर टिका हुआ है. अमेरिका और चीन ने मिलकर काम करते हुए उन तमाम चुनौतियों से निपटने में शानदार प्रगति की है, जिनका दोनों देश वर्तमान में सामना कर रहे हैं.
ट्रंप ने बताया कि दोनों देश अधिक संतुलित व्यापारिक संबंध बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. जिसमें अमेरिकी किसानों और पशुपालकों के लिए बाज़ार के नए अवसर खोलना शामिल है. यानी चीन मे अमेरिकी कृषि उत्पादों की एंट्री होगी. ट्रंप ने बताया दोनों पक्षों के बीच सुरक्षा, तकनीक और सुपर इंटेलिजेंस जैसे बेहद अहम मुद्दों पर भी गंभीर चर्चा होगी.
ट्रंप ने भरोसा जाहिर किया इन क्षेत्रों में आज लिए गए फैसले आने वाले कई दशकों तक दुनिया में शांति और समृद्धि को बढ़ावा देंगे. भाषण के अंत में ट्रंप ने एक चीनी शब्द 'गंग-हो' जिक्र किया, जिसे अमेरिकी मरीन ने अपनाया है और जिसका चीनी भाषा में अर्थ "मिलकर काम करना" होता है. यानी ट्रंप ने संकेत दिया चीन और अमेरिका अब मिलकर काम करेंगे.
ट्रंप ने जिनपिंग को सेकंड वर्ल्ड वॉर की दिलाई याद
डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका और चीन के सहयोग की याद दिलाते हुए दूसरे विश्वयुद्ध का भी जिक्र किया. जिसमें अमेरिकी पायलटों ने चीन की रक्षा के लिए युद्ध लड़ा. दोनों देशों के सैनिकों ने साझा दुश्मन का सामना किया. डोनाल्ड ट्रंप अब जिनपिंग के साथ वैसा ही सहयोग चाहते हैं.
ट्रंप ने व्हाइट हाउस में जिनपिंग का स्वागत किया और जिनपिंग ने व्हाइट हाउस में अपने संबोधन की शुरुआत चीन के 140 करोड़ लोगों की तरफ से अमेरिका को 250वें स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देकर कीं. जिनपिंग ने कहा कि दोनों देशों के हित एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं, इसलिए दोनों को पूरी ईमानदारी के साथ एक-दूसरे का सहयोग करना चाहिए.
शी जिनपिंग ने उम्मीद जताई कि अमेरिका में काम कर रही चीनी कंपनियों के साथ पूरी तरह से निष्पक्ष और समान व्यवहार किया जाएगा. उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन दोनों की यह जिम्मेदारी है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास मानव भलाई के लिए हो और यह हमेशा इंसानों के नियंत्रण में रहे.
जिनपिंग ने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा 'स्वस्थ' होनी चाहिए. यह एक-दूसरे से आगे निकलने और बेहतर बनने की होड़ होनी चाहिए, न कि हार-जीत की कोई लड़ाई.
जिनपिंग ने यूएस को 2 पांडा देने का किया एलान
जिनपिंग ने कहा कि चीन और अमेरिका अलग-अलग हैं, लेकिन स्पष्ट, गहरे और निरंतर संवाद के जरिए दोनों देश एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और आपसी विश्वास बढ़ा सकते हैं.
जिनपिंग ने आगाह किया कि भले ही दोनों देशों के आपसी सहयोग से दुनिया की हर समस्या न सुलझे, लेकिन इस सहयोग के बिना दुनिया की कई बड़ी समस्याओं का समाधान करना बेहद मुश्किल हो जाएगा . जिनपिंग ने अमेरिका को दो पांडा गिफ्ट करने का भी ऐलान किया.
व्हाइट हाउस में इससे पहले कई नेताओं का ऐसा स्वागत हो चुका है. लेकिन जिनपिंग के अमेरिका पहुंचने पर ट्रंप ने उनका जिस अंदाज में स्वागत किया. उसे अभूतपूर्व कहा जा रहा है.
अमेरिका में राष्ट्रपतियों की ओर से किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष का एयरपोर्ट जाकर स्वागत करने का रिवाज नहीं है. इससे पहले 15 अगस्त 2025 को डोनाल्ड ट्रंप ने अलास्का में प्रोटोकॉल तोड़कर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का हवाई अड्डे पर स्वागत किया था. ट्रंप के अलावा किसी राजनीतिक राष्ट्राध्यक्ष का हवाई अड्डे पर जाकर स्वागत करने वाले आखिरी अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी थे. उन्होंने साल 1962 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेरोल्ड मैकमिलन का इस तरह स्वागत किया था.
आज ट्रंप, जिनपिंग के स्वागत में रेड कारपेट बिछा रहे हैं तो इसके केंद्र में वो बाजार और पैसा है. जिससे अमेरिका और चीन दोनों ही अपनी जेब भरना चाहते हैं. जिसके लिए इतनी भव्य तैयारियां की गई हैं. जिसके लिए दोनों नेता अपनी कीमती वक्त खर्च कर रहे हैं.
सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी कर रहे एक-दूसरे की तारीफ
अमेरिका में दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों के नेताओं की मुलाकात हो रही है. ऐसे में दोनों देशों की जीडीपी को आधार बनाया जाए तो दोनों नेताओं के एक मिनट की कीमत मिलाकर लगभग 1 हजार करोड़ रुपये हो जाती है. इसका पूरा कैलकुलेशन हम आपको आगे बताएंगे, लेकिन पहले इस मुलाकात की असली वजह को समझिए.
आज डोनाल्ड ट्रंप शी जिनपिंग और चीन की तारीफ कर रहे हैं. यही ट्रंप चीन को इतिहास में किसी भी देश द्वारा की गई सबसे बड़ी बौद्धिक संपदा चोरी का दोषी बता चुके हैं. कोविड को चाइना वायरस कह चुके हैं. जिनपिंग को क्रूर बता चुके हैं, जबकि जिनपिंग भी ताइवान पर अमेरिका को रेड लाइन क्रॉस ना करने की धमकी दे चुके हैं. इसके बावजूद अगर दोनों नेता एक साथ खड़े हुए हैं तो इसकी सबके बड़ी वजह अपने बाजार और पैसे को बचाना है.
इस बैठक से डोनाल्ड ट्रंप जो सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल करना चाहते हैं . वो अमेरिकी जनता से जुड़ी है. ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिकी जनता की जेब पर बोझ न बढ़े, ताकि उनकी कुर्सी बची रहे. अमेरिका खुद बहुत कम सामान बनाता है. जूते, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, खिलौने और रोज़मर्रा के सामान के लिए वह चीन पर निर्भर है.
अमेरिका को हर साल कितने का माल बेचता है चीन?
चीन हर साल अमेरिका को लगभग 525 बिलियन डॉलर यानी 44 लाख करोड़ रुपये का माल बेचता है. अगर चीन से व्यापार बिगड़ता है या नए टैरिफ लगते हैं, तो अमेरिकी सुपरमार्केट्स में कीमतें रातों-रात बढ़ जाएंगी. चीन से सप्लाई रुकी, तो वॉलमार्ट और अमेजन पर इलेक्ट्रॉनिक्स, खिलौने और कपड़े 50% तक महंगे हो जाएंगे.
अमेरिकी वोटर पहले से महंगाई और महंगे बैंक लोन की मार झेल रहा है. ऊपर से तेल की कीमतों का बढ़ना आग में घी का काम कर रहा है. अमेरिका में नवंबर में मध्यावधि चुनाव हैं. इतिहास गवाह है कि अमेरिकी नागरिक विदेश नीति या ताइवान के मुद्दे पर नहीं, बल्कि गैस और पेट्रोल की कीमत और किराने के बिल को देखकर वोट करते हैं. जो फिलहाल काफी हद तक चीन पर भी निर्भर है. इस वक्त अमेरिका की स्थिति चीन से आर्थिक विवाद करने की नहीं है. यही वजह है कि वह उस पर डोरे डाल रहा है.
दोनों मुल्कों को एक-दूसरे की जरूरत क्यों है?
आज आपको इसकी वजह भी समझनी चाहिए. अमेरिका में अगस्त की महंगाई दर 3.4% रही, जो सुरक्षित माने जाने वाले 2% के लक्ष्य से काफी ऊपर है. 23 सितंबर को कच्चे तेल की कीमतों में करीब 4% का उछाल आया, जिससे पेट्रोल पंपों पर कीमतें बढ़ने का सीधा खतरा पैदा हुआ. अमेरिकी शेयर बाजार S&P 500 लगभग 1 प्रतिशत गिरा. अमेरिका में ब्याज दरें 5% तक पहुंच गई हैँ . जिससे होम लोन की दरें 6.5% के पार हैं और कर्ज लेना महंगा बना हुआ है.
अगर चीन पर प्रस्तावित 60% टैरिफ लागू होता है या रूस से तेल खरीदने की वजह से 100% टैरिफ लगता है तो तो हर अमेरिकी परिवार पर सालाना लगभग 1,500 डॉलर यानी करीब सवा लाख रुपये का अतिरिक्त महंगाई बोझ पड़ेगा.
ट्रंप को नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में संसद की 435 सीटों पर मुकाबला करना है... सामान की सप्लाई रोककर महंगाई बढ़ी तो चुनावी हार तय है.
यही मजबूरी ट्रंप को जिनपिंग का ऐतिहासिक स्वागत करने के लिए मजबूर कर रही है. नहीं तो जिस तरह ट्रंप चीन को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते रहे हैं. वे कभी उनके लिए रेड कारपेट नहीं बिछाते. इससे पहले अमेरिका में जो जिनपिंग का स्वागत करता था, वो ट्रंप के निशाने पर आ जाता था.
यूएस को पसंद नहीं करते जिनपिंग, फिर क्यों गए अमेरिका?
आपको डॉनल्ड ट्रंप का वर्ष 2012 का एक सोशल मीडिया पोस्ट जानना चाहिए. तब बराक ओबामा ने उनकी अगवानी की थी. तब ट्रंप ने कहा था, 'यह पूरी तरह गलत है! बराक ओबामा आज चीन के उपराष्ट्रपति शी जिनपिंग की पेंटागन में मेजबानी कर रहे हैं. वहां संगीत और तोपों की सलामी के साथ पूरे राजकीय सम्मान समारोह का आयोजन किया जा रहा है.'
सोचिए जो ट्रंप वर्ष 2012 में व्हाइट हाउस में जिनपिंग के स्वागत में तोप चलाने और बैंड बजवाने से नाराज थे. उन्होने एयरपोर्ट पर ही जिनपिंग के लिए ये व्यवस्था करवा दी. वैसे जिनपिंग भी ट्रंप और अमेरिका को इतना पसंद नहीं करते. लेकिन आज उनके सामने भी अपने बाजार को बचाने की चुनौती है. इसीलिए ट्रंप से मिलने के लिए अमेरिका चले आए. आज आपको जिनपिंग की मजबूरियों के बारे में भी जानना चाहिए.
अगस्त में चीन की घरेलू खुदरा बिक्री सिर्फ 0.4% बढ़ी, जिसका मतलब है कि देश के 140 करोड़ लोग बाजार में खरीदारी नहीं कर रहे. जनवरी से अगस्त के बीच चीन के रियल एस्टेट निवेश में 20% की भारी गिरावट आई, जिससे अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले हाउसिंग सेक्टर में भारी संकट है.
चीन में 16 से 24 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 19% के चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है.
घरेलू मंदी के बावजूद, अगस्त में चीन का वैश्विक निर्यात डॉलर मूल्य में 25% की तेज रफ्तार से बढ़ा.
चीन में फैक्ट्रियां बंद होने का अंदेशा
चीन के पास 3.2 ट्रिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, लेकिन इसे बनाए रखने और अपनी मुद्रा बचाने के लिए उसे लगातार अमेरिकी डॉलर की बिक्री की जरूरत है. अब आप शी जिनपिंग की सीधी मजबूरी समझिए. घरेलू मांग ठप होने के बावजूद चीन की फैक्टरियां केवल इसलिए चल रही हैं क्योंकि वो दुनिया को सामान बेच रही हैं.
ऐसे में अगर चीन के लिए अमेरिकी बाजार बंद हुआ तो फैक्टरियां बंद होंगी और चीन बेरोजगारी बेकाबू हो जाएगी. इससे घरेलू मोर्चे पर शी जिनपिंग के लिए स्थितियां बिगड़ जाएंगी. इसीलिए जिनपिंग भी ट्रंप से कोई विवाद नहीं चाहते.
ऐसा नहीं है कि ट्रंप को सिर्फ चीन में बने हुए उत्पादों की जरूरत है. चीन से उन्हें अपनी कंपनियों के लिए कच्चे माल की सप्लाई भी चाहिए. साथ ही, अमेरिका अपने उत्पादों को एक बाजार के तौर पर चीन में पहुंचाना भी चाहता है. जिससे चुनाव के पहले अमेरिका में अच्छा माहौल बने.
अमेरिका की सबसे बड़ी औद्योगिक कमजोरी यह है कि उसकी आधुनिक मिसाइलों, फाइटर जेट्स और इलेक्ट्रिक गाड़ियों की चाबी चीन के हाथ में है. दुनिया के रेयर अर्थ खनन में चीन की हिस्सेदारी 70%, रिफाइनिंग में 85% और इनसे बनने वाले विशेष चुंबकों के उत्पादन में 90% है. चिप बनाने में काम आने वाले 'गैलियम' के उत्पादन पर तो चीन का 99% नियंत्रण है. यानी दुनिया को गैलियम की सप्लाई चीन से ही होती है.
चीन से क्या चाहते हैं डोनाल्ड ट्रंप?
डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिकी फैक्टरियों तक इन खनिजों की बिना रुकावट डिलीवरी हो.
2025 में चीन ने निर्यात लाइसेंस रोककर यह दिखा दिया था कि अगर अमेरिका टैरिफ लगाएगा, तो चीन अमेरिकी रक्षा और टेक उत्पादन की कमर तोड़ सकता है.
नवंबर के मध्यावधि चुनावों में ट्रंप को अमेरिकी जनता को यह साबित करना है कि उनकी नीतियों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सीधा फायदा हुआ है. इसके लिए उन्हें चीन से अमेरिकी अखबारों और न्यूज चैनल में हेडलाइन बनने वाले बड़े सौदे चाहिए. अमेरिका चाहता है कि चीन हर साल 2.5 करोड़ टन अमेरिकी सोयाबीन खरीदे.
अमेरिका के कुछ बड़े राज्यों में किसान ट्रंप का सबसे मजबूत वोट बैंक हैं. चीन की ओर सेसोयाबीन की खरीद सीधे इन किसानों की जेब भरती है. गुरुवार को व्हाइट हाउस के संबोधन में ट्रंप ने इसके संकेत भी दिए.
ट्रंप कम तकनीक वाले सामान्य घरेलू सामान जैसे चाकू, स्टेशनरी, नोटबुक पर टैरिफ कम करके महंगाई कम करना चाहते हैं. लेकिन अमेरिका गाड़ियों, उन्नत चिप्स, AI तकनीक और रक्षा से जुड़े उत्पादों पर कड़े टैरिफ और पाबंदियां पूरी तरह बरकरार रखने की कोशिश में हैं.
ईरान की कंट्रोलिंग में मदद चाहते हैं ट्रंप
इसके अलावा अमेरिका ईरान को कंट्रोल करने में भी चीन की मदद चाहता है. चीन के समुद्री तेल निर्यात का 80% से ज्यादा हिस्सा यानी लगभग 14 लाख बैरल प्रतिदिन अकेला चीन खरीदता है. यानी ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चीनी की खरीद पर टिकी है. ट्रंप चाहते हैं कि चीन अपने इस आर्थिक प्रभाव का इस्तेमाल करके ईरान को मजबूर करे कि वह लाल सागर में हूती के हमलों पर रोक लगाए और क्षेत्र में तनाव घटाए.
फिलहाल चीन ने निजी तौर पर हूती विद्रोहियों को संयम बरतने के लिए कहा है. लेकिन वह ईरान पर कोई कड़ा आर्थिक दबाव या प्रतिबंध लगाने को तैयार नहीं है. यानी प्रभाव होना एक बात है और उसका इस्तेमाल अमेरिका के हित में करना बिल्कुल दूसरी बात. ट्रंप इस बैठक में जिनपिंग को इसके लिए राजी करने की कोशिश करेंगे.
ऐसा नहीं है कि जिनपिंग यहां पर सिर्फ ट्रंप का भला करने आए हैं. जिनपिंग के पास भी ट्रंप के लिए डिमांड की लंबी लिस्ट है. अमेरिका ने चीन को दिए जाने वाले एडवांस्ड AI चिप्स और चिप बनाने वाली मशीनों पर सख्त पाबंदी लगा रखी है. इससे चीन का सेमीकंडक्टर और AI सेक्टर पिछड़ रहा है.
चीन अमेरिकी चिप और तकनीक पर लगी पाबंदियों में ढील चाहते हैं. यह चीन के भविष्य और सुपरपावर बनने की सबसे बड़ी जरूरत है. शी जिनपिंग चाहते हैं कि अमेरिका इन 'टेक प्रतिबंधों में ढील दे, ताकि चीन को अत्याधुनिक तकनीक और मशीनरी मिल सके. लेकिन अमेरिका के लिए ये आसान नहीं.
ताइवान पर अमेरिकी रुख बदलवाना चाहते हैं जिनपिंग
चीन, अमेरिका से रूसी तेल की खरीद पर भी विवाद नहीं चाहता. इसके अलावा जिनपिंग ताइवान पर अमेरिकी रुख में कूटनीतिक बदलाव भी चाहते हैं. चीन चाहता है कि अमेरिका ताइवान को आधुनिक रक्षा उपकरण और हथियार बेचना बंद करे. हालांकि, अमेरिका का इस मामले में रुख ढुलमुल वाला है. वह कहता है कि यूएस ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन नहीं करता. लेकिन जिनपिंग चाहते हैं कि अमेरिका यह कहे कि हम ताइवान की स्वतंत्रता का विरोध करते हैं. इसका मतलब होगा कि अमेरिका आधिकारिक तौर पर ताइवान के अलग देश बनने के खिलाफ खड़ा है.
यह शी जिनपिंग के लिए सबसे बड़ी घरेलू राजनीतिक जीत होगी. यानी शी सिर्फ एयरपोर्ट का रेड कार्पेट स्वागत नहीं चाहते, वे ताइवान पर ठोस कूटनीतिक रियायत चाहते हैं. लेकिन ऐसा करना भी ट्रंप के लिए आसान नहीं होगा. क्योंकि ताइवान की रक्षा करना अमेरिका की पुरानी और लोकप्रिय रणनीति है.
दुनिया पर ट्रंप और जिनपिंग की मुलाक़ात का व्यापक असर होगा. लेकिन ये हालात तब पैदा होंगे, जब दोनों देशों के बीच कोई बड़ा समझौता हो या दोनों नेता संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हो जाएं.
ट्रंप ने जिनपिंग के स्वागत के लिए भव्य तैयारी की. प्रोटोकॉल तोड़कर ख़ुद जिनपिंग के स्वागत के लिए पहुंच गए. इसके बावजूद विश्लेषकों को दोनों देशों के बीच किसी बड़े समझौते की उम्मीद काफ़ी कम है.
दोनों मुल्कों के बीच गहरा अविश्वास
अमेरिका और चीन के संबंधों में अविश्वास सबसे बड़ी रुकावट है. दोनों को एक-दूसरे पर ज़रा भी भरोसा नहीं है. वो व्यापार और तकनीक से लेकर कूटनीति तक एक-दूसरे को शक की नज़र से देखते हैं. यहां तक कि दोनों एक-दूसरे पर जासूसी और टेक्नोलॉजी की चोरी का आरोप भी लगाते हैं. अमेरिका टैरिफ लगाता है तो उसके जवाब में तुरंत चीन भी टैरिफ लगा देता है.
पिछले एक साल में दोनों नेताओं के बीच 2 बार पहले भी मुलाक़ात हो चुकी है. पिछले साल अक्टूबर में दक्षिण कोरिया में दोनों की द्विपक्षीय बैठक हुई थी. उसके बाद इस साल मई में ट्रंप ने चीन का दौरा किया था. लेकिन अविश्वास की वजह से ट्रंप और जिनपिंग के बीच पिछली मुलाक़ातों में कोई बड़ा समझौता नहीं हो पाया.
दोनों देशों के बीच ये अविश्वास ईरान युद्ध की वजह से और बढ़ा है. अमेरिका लगातार आरोप लगाता रहा है कि युद्ध में चीन, ईरान की मदद करता है. अमेरिका के मुताबिक़ चीन ने ईरान को मिडिल ईस्ट में अमेरिका के ठिकानों की हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरें मुहैया कराई.जुलाई में इन तस्वीरों की मदद से ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी एयर बेस पर हमला किया, जिसमें 3 अमेरिकी सैनिक मारे गए.
साथ ही चीन, ईरान को मिसाइल और ड्रोन समेत कई हथियारों की सप्लाई कर रहा है. ईरान के तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार भी चीन ही है जिससे ईरान को युद्ध लड़ने के लिए पैसा मिल रहा है. यानी अमेरिका के मुताबिक़ चीन डबल गेम कर रहा है. उसे लगता है कि चीन सबके सामने तो शांति की बात करता है लेकिन पीछे से ईरान को मज़बूत कर रहा है. जिनपिंग के साथ मुलाक़ात में ट्रंप ईरान को मदद का मुद्दा उठा सकते हैं जिससे तनाव बढ़ सकता है.
दोनों के बीच व्यापार बढ़ने की कितनी उम्मीदें?
व्यापार को लेकर भी दोनों देशों के बीच बातचीत में एक झटका लगा है. जिनपिंग के अमेरिका दौरे से पहले उम्मीद लगाई जा रही थी कि चीन अमेरिका की बोइंग कंपनी के साथ 500 विमान ख़रीदने का समझौता करेगा. लेकिन अब इसको लेकर दोनों देश पूरी तरह चुप है. एयरोस्पेस इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि मई में 200 प्लेन ख़रीदने का जो समझौता हुआ था, उसी को अंतिम रूप दे दिया जाए तो बड़ी बात है.
अमेरिका में कुछ हफ़्ते बाद होने वाले मिड टर्म चुनाव की वजह से ट्रंप के सामने मजबूरी है कि वो अमेरिकी सोयाबीन और दूसरे कृषि उत्पादों के लिए चीन का बाज़ार खुलवाएं. अगर वो ऐसा करने में सफल रहे तो अमेरिका के कृषि बेल्ट में ट्रंप की पार्टी को फायदा होगा. ये ट्रंप का सबसे बड़ा वोट बैंक है.
वहीं चीन की घरेलू आर्थिक चुनौतियों की वजह से जिनपिंग के लिए अमेरिका से व्यापार युद्ध टालना ज़रूरी है. अभी कुछ देर पहले हमने बताया था कि चीन प्रॉपर्टी संकट, घरेलू खपत में कमी और बेरोज़गारी जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है. इस स्थिति में जिनपिंग व्यापार युद्ध का नया मोर्चा नहीं खोलना चाहेंगे.
इस वजह से दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध भले ही थम जाए. लेकिन इस बात की संभावना नहीं है कि शिखर सम्मेलन से अमेरिका और चीन का दशकों पुराना अविश्वास दूर हो जाएगा.