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Why Vance Call Indian Engineers Bonded Laborers? जब कोई देश किसी दूसरे देश की प्रतिभा पर अपनी पूरी अर्थव्यवस्था खड़ी करता है और फिर उसी प्रतिभा का अपमान करता है, तो इसे केवल राजनीति नहीं कहा जा सकता. यह उस प्रतिभा-पोषी पाखंड की लाचारी है, जो काम तो प्रवासियों से लेना चाहती है. लेकिन सम्मान देने में उनका दिल छोटा पड़ जाता है.
असल में ये पूरा मामला अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान से जुड़ा है. जिसमें उन्होंने अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों को बंधुआ मजदूर कह दिया. ध्यान दीजिए, जो अमेरिका मेहनती प्रवासियों के दम पर सुपर पावर होने का दंभ भरता है. वही देश अपने यहां काम करने वाले मेहनतकश प्रवासियों को बंधुआ मजदूर कह रहा है. जेडी वेंस का आरोप था कि अमेरिका की बड़ी कंपनियां बाहर से सस्ते मजदूर लाती हैं. कम वेतन देती हैं और अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छीन लेती हैं. उनका इशारा साफ तौर पर भारत और चीन के टेक पेशेवरों की तरफ था.
भारत के विदेश मंत्रालय ने वेंस की इस टिप्पणी पर कड़ा ऐतराज जताया है. भारत ने साफ कहा है कि इस तरह की भाषा बेहद अनुचित और अपमानजनक है. विदेश मंत्रालय ने अमेरिका को याद दिलाया कि अमेरिका का इतिहास ही प्रवासियों की मेहनत से बना है. बंधुआ मजदूर जैसे शब्दों में औपनिवेशिक काल की दर्दनाक यादें झलकती हैं. भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित हैं, बेहद कुशल हैं और वे अमेरिका में इनोवेशन और रिसर्च को नई रफ्तार दे रहे हैं.
अब सवाल उठता है कि आखिर अमेरिकी उपराष्ट्रपति इतने हताश-परेशान क्यों हैं. इसके पीछे एक राजनीतिक गणित है और एक आधा-अधूरा आंकड़ा है. जेडी वेंस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वीजा धोखाधड़ी का मुद्दा उठाया. उन्होंने दावा किया कि एच-वन-बी वीजा पर आने वाले विदेशी कर्मचारियों को अमेरिकी नागरिकों के मुकाबले बीस हजार डॉलर कम सैलरी मिलती है. आउटसोर्सिंग कंपनियों के मामले में यह अंतर 48 हजार डॉलर तक पहुंच जाता है.
वेंस ने खास तौर पर टेक दिग्गज कंपनी माइक्रोसॉफ्ट को निशाने पर लिया. उन्होंने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले एक साल में छह हजार अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला. लेकिन इसी दौरान कंपनी को छह हजार तीन सौ एच-वन-बी वीजा और करीब तीन हजार ग्रीन कार्ड की मंजूरी मिली. वेंस ने इसे अमेरिकी कामगारों के साथ धोखा बताया और कहा कि कंपनियां मुनाफा कमाने के लिए विदेशी कर्मचारियों को बंधुआ मजदूर की तरह इस्तेमाल कर रही हैं.
#DNAमित्रों | भारतीय प्रतिभा का अपमान कर रही ट्रंप सरकार! प्रतिभा पर अमेरिका के 'पाखंड' का पोस्टमार्टम 'बंधुआ मजदूर' पर भारत-यूएस तनाव का विश्लेषण #DNA #DNAWithRahulSinha #America #India #DonaldTrump @rahulsinhatv https://t.co/5JaTULwZtt
— Zee News (@ZeeNews) October 9, 2026
बात सिर्फ जुबानी हमलों तक नहीं रुकी. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के प्रशासन ने आठ बड़ी आईटी कंपनियों पर एक्शन भी ले लिया. अमेरिकी श्रम विभाग ने इन आठ कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़ी पर्म यानी P.E.R.M प्रक्रिया से सस्पेंड कर दिया है. इन कंपनियों में भारत की चार प्रमुख कंपनियां शामिल हैं- टाटा, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल. इनके अलावा यूएस की टेक कंपनी कॉग्नि-जेंट, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी, फ्रांस की कैप-जेमिनी पर भी यह रोक लगाई गई है.
यहां आपको एच-वन-बी वीजा और पर्म प्रक्रिया का अंतर बहुत ध्यान से समझना होगा. एच-वन-बी एक अस्थायी वर्क वीजा है, जो तीन साल के लिए मिलता है. जबकि पर्म प्रक्रिया अमेरिका में हमेशा के लिए बसने यानी ग्रीन कार्ड पाने का पहला कदम है. पर्म प्रक्रिया में रोक लगने से पहले से काम कर रहे कर्मचारियों का एच-वन-बी वीजा रद्द नहीं होगा. लेकिन जो भारतीय कर्मचारी ग्रीन कार्ड पाने की कतार में खड़े होने वाले थे, उनका इंतजार अब और लंबा हो जाएगा.
अब जरा जेडी वेंस के उस दावे का सच समझिए. उन्होंने कहा कि भारतीय कर्मचारी कम वेतन पर काम करने वाले बंधुआ मजदूर हैं. हमारी शोधशाला से जो तथ्य सामने आए हैं. वो बताते हैं कि अमेरिका में पच्चीस साल से ऊपर के 77 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकियों के पास ग्रेजुएट या उससे ऊंची डिग्री है. भारतीय परिवारों की औसतन सालाना कमाई 1 लाख 51 हजार डॉलर से ज्यादा है, जो अमेरिका में सबसे ज्यादा है. फिर इन्हें बंधुआ मजदूर कैसे कहा जा सकता है.
रही बात माइक्रोसॉफ्ट की 6 हजार भर्तियों की, तो उसका सच भी जान लीजिए. अमेरिकी इमीग्रेशन डेटा के अनुसार, कुल एच-वन-बी मंजूरियों में से करीब 64 प्रतिशत नौकरियां नई नहीं होतीं. वे पहले से काम कर रहे कर्मचारियों का या तो वीजा एक्सटेंशन है या स्टेटस चेंज. यानी वेंस ने दो अलग-अलग आंकड़ों को मिलाकर एक राजनीतिक नैरेटिव गढ़ दिया.
राजनीतिक स्वार्थ के लिए बयानों का बदलना अमेरिका में कोई नई बात नहीं है. इसे आप एलन मस्क और डॉनल्ड ट्रंप के रिश्तों से समझ सकते हैं. कल तक ट्रंप और मस्क के बीच कड़वाहट थी, दोनों एक-दूसरे पर सार्वजनिक हमले कर रहे थे. लेकिन 8 अक्टूबर को ट्रंप ने एलन मस्क को वाशिंगटन में नेशनल मेडल ऑफ साइंस से सम्मानित किया और उन्हें अमेरिका का नेशनल ट्रेजर यानी राष्ट्रीय खजाना बता दिया.
यह दिखाता है कि अमेरिकी राजनीति में नीतियां सिद्धांतों से कम और सहूलियत से ज्यादा तय होती हैं. जो उद्योगपति सत्ता के काम आए, वह राष्ट्रीय खजाना बन जाता है. वहीं, जो भारतीय इंजीनियर दिन-रात मेहनत करके अमेरिकी टेक कंपनियों को खड़ा करता है, चुनावी भाषणों में उसे बंधुआ मजदूर बता दिया जाता है.
अमेरिका को यह समझना होगा कि समस्या भारतीय इंजीनियर नहीं हैं, समस्या वीजा नियमों की वह व्यवस्था है जो कर्मचारियों को कंपनियों पर निर्भर बनाती है. अगर अमेरिका को अपने नागरिकों की नौकरियां बचानी हैं तो वह अपने कानूनों को सख्त करे. लेकिन अमेरिका को महाशक्ति बनाने वाले भारतीय टैलेंट का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.