दिल्ली में प्रदर्शनकाल चल रहा है. पिछले 10 दिनों से हर दिन धरना-प्रदर्शन हो रहा है. विपक्ष लगातार सड़कों पर है और बीच-बीच में सत्ताधारी दल भी मैदान में उतरने लगा है. बीजेपी के टारगेट पर कांग्रेस है. जबकि कांग्रेस समेत विपक्ष के निशाने पर SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं. लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन करना गलत नहीं है. लेकिन दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन में यूएन का शामिल होना चिंताजनक है. नॉर्वे की प्रसिद्ध एजेंडा-जीवी पत्रकार का शामिल होना खतरनाक है.
लेकिन सवाल है कि एक ही मुद्दे पर एक जैसी सोच रखने के बाद भी..कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक साथ क्यों नहीं आ पा रही? सोमवार को कांग्रेस के मार्च में समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसे विपक्षी दल साथ थे लेकिन आम आदमी पार्टी..अपना प्रदर्शन अलग क्यों चला रही थी? कांग्रेस..आम आदमी पार्टी के साथ-साथ, कॉकरोच जनता पार्टी से भी दूरी बनाकर क्यों चल रही है?
जेएनयू में यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर कांग्रेस सांसद और JNU के बर्खास्त प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजाम के खिलाफ बीजेपी सड़क पर उतरी. सुबह के समय बीजेपी महिला मोर्चा की कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस दफ्तर की ओर मार्च निकाला तो दोपहर में कांग्रेस ने बाराखंभा रोड से सुप्रीम कोर्ट की तरफ मार्च निकाला. कांग्रेस के मार्च में इंडिया गठबंधन में शामिल तमाम पार्टियों के नेता भी शामिल थे. उधर आम आदमी पार्टी ने अलग से प्रदर्शन किया. कॉकरोच जनता पार्टी ने मंगलवार को फिर सड़क पर उतरने का ऐलान किया है. मतलब सभी पार्टियां अपने अपने हिसाब से सड़क पर प्रासंगिकता बनाने में जुटी हैं.
जयप्रकाश नारायण का मानना था कि 'राजनीति में कोई भी स्थायी रूप से प्रासंगिक नहीं होता. आपकी प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करती है कि आप आज जनता के दुखों के साथ सड़क पर कितने मुस्तैद हैं.' इसी मूलमंत्र को आत्मसात करते हुए जेपी के धुर विरोधी कांग्रेस और जेपी की अनुयायी तमाम पार्टियां सड़क पर हैं.
#DNAमित्रों | पहले आकाशवाणी.. फिर राजघाट.. अब सुप्रीम कोर्ट AAP और CJP.. कांग्रेस के साथ क्यों नहीं आई? राहुल-प्रियंका के 'सुप्रीम कोर्ट मार्च' का विश्लेषण #DNA #DNAWithRahulSinha #DelhiProtest #RahulGandhi #SupremeCourt @rahulsinhatv https://t.co/2klfyt6TXA
— Zee News (@ZeeNews) October 12, 2026
राहुल गांधी, प्रियंका गांधी के साथ कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे आज फिर सड़क पर उतरे. पिछले एक हफ्ते में पांचवीं बार कांग्रेस के शीर्ष नेता सड़क पर उतरे हैं. कांग्रेसी नेता देश में लोकतंत्र की स्थिति, चुनाव प्रणाली में कथित धांधली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की शिकायत लेकर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से मिलना चाहते थे. लेकिन चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने मुलाकात करने से इनकार कर दिया. इसके बावजूद इंडिया गठबंधन के नेताओं ने मार्च निकाला.
सड़क पर उतरने से पहले इंडिया गठबंधन के सभी वरिष्ठ सांसद और नेता कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में एकजुट हुए. इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे मौजूद थे. उनके साथ राहुल गांधी और प्रियंका के अलावा कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और कई वरिष्ठ सांसद और नेता थे. समाजवादी पार्टी की ओर से रामगोपाल यादव और अवधेश प्रसाद के अलावा कई सांसद शामिल थे. शिवसेना के उद्धव गुट के संजय राउत मौजूद थे. जेएमएम की महुआ माझी, एनसीपी की सुप्रिया सुले, टीएमसी की ममता बनर्जी, आरजेडी के तेजस्वी यादव और लेफ्ट पार्टियों से दीपांकर भट्टाचार्य, डी. राजा जैसे वरिष्ठ नेता शामिल थे. इनके अलावा अलग-अलग पार्टियों के सांसद भी मौजूद थे.
कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई इस बैठक में आज की रणनीति पर चर्चा हुई. इंडिया गठबंधन के सभी नेताओं ने ये तय किया कि वो बाराखंभा रोड से चलकर सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे और वहां एक औपचारिक कानूनी याचिका दायर करेंगे. मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने में नेताओं को देरी हो गई इसलिए पहले ही 10 दलों के 11 नेताओं की तरफ से वकील एस. प्रसन्ना ने याचिका दाखिल की. अब आप जानिए, इस याचिका में क्या है?
याचिका में कोर्ट से मांग की गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच जिन भी फैसलों पर आपसी असहमति थी उनका पूरा विस्तृत रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश किया जाए. याचिका में मांग की गई है कि वोटर रजिस्ट्रेशन फॉर्म-6 को बदलने के लिए जो बैठक हुई थी, उसमें किसने क्या बात कही, किसने क्या सुझाव दिया और अंतिम फैसला किसने लिया, उस पूरी बैठक की लिखित रिपोर्ट कोर्ट के सामने रखी जाए. जब तक मामलों की सुनवाई पूरी ना हो जाए तब तक SIR प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोकने का आदेश दिया जाए.
सूत्रों के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि इस याचिका से जुड़ी सभी कागजी और तकनीकी प्रक्रियाएं आज रात ही पूरी कर ली जाएं. अगर कहीं कोई गलती है तो उसे तुरंत ठीक करवा लिया जाए, ताकि जल्द से जल्द इस पर सुनवाई हो सके.
चीफ जस्टिस ने इंडिया गठबंधन के नेताओं से मुलाकात करने से इनकार कर दिया था. मुख्य न्यायाधीश का तर्क था कि इस मुद्दे से जुड़ी कई याचिकाएं पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं, इसलिए इस तरह की मुलाकात उचित नहीं है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया किससे मिलेंगे और किससे नहीं, इसे लेकर कोई संवैधानिक नियम नहीं है. यह पूरी तरह से उनके विवेक पर निर्भर करता है. लेकिन 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों के आचरण के लिए एक आचार संहिता अपनाई गई थी.
इसमें कहा गया है कि जजों को ऐसा कोई भी काम करने से बचना चाहिए, जिससे समाज या किसी राजनीतिक दल को ये संदेश जाए कि न्यायपालिका किसी एक पक्ष की तरफ झुकी हुई है. अगर किसी मुद्दे पर अदालत में पहले से मुकदमे चल रहे हैं तो न्यायाधीश उस विषय पर अदालत कक्ष के बाहर किसी भी पक्ष से औपचारिक या अनौपचारिक चर्चा नहीं कर सकते.
भारतीय लोकतंत्र में यह एक बेहद मजबूत परंपरा रही है कि कार्यपालिका यानी सरकार और विपक्ष, दोनों के राजनीतिक एजेंडे से न्यायपालिका खुद को पूरी तरह दूर रखती है. यही कारण है कि मुख्य न्यायाधीश ने इंडिया गठबंधन के नेताओं से मुलाकात करने से इनकार कर दिया और उन्हें अदालत में औपचारिक याचिका दायर करने के लिए कहा.
मुख्य न्यायाधीश इंडिया गठबंधन की याचिका पर जल्द सुनवाई करने के लिए गंभीर हैं. इसके बावजूद कांग्रेस की केरलम प्रदेश कमेटी ने उनके खिलाफ आज विवादित पोस्ट कर दिया. CJI पर सवाल उठाते हुए केरलम कांग्रेस ने लिखा- अगर कानून-व्यवस्था आपका क्षेत्र नहीं है, तो अभी इस्तीफा दे दीजिए. हम आपकी जगह ऐसा व्यक्ति ढूंढ लेंगे, जो इसे संभाल सके.
कांग्रेस की इस पोस्ट पर केंद्र सरकार ने घोर आपत्ति जताई. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने लिखा कि सभी देशविरोधी गिरोह हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों को नष्ट करने के लिए हाथ मिला रहे हैं, लेकिन सभी देशभक्त भारतीय भी इसके खिलाफ एक साथ आएंगे. इनका अगला टारगेट न्यायपालिका ही है.
सरकार के हमले के बाद कांग्रेस बैकफुट पर आ गई. दिल्ली में कांग्रेस के नेताओं ने इस मानसिकता से खुद को अलग कर लिया. इसके बाद केरलम कांग्रेस ने पोस्ट डिलीट कर लिया. मुख्य न्यायाधीश पर विवादित पोस्ट के बाद किस तरह बीजेपी आक्रामक है और कांग्रेस डिफेंसिव दिख रही है. अब आप ये जानिए.
केरलम कांग्रेस ने चीफ जस्टिस पर ये विवादित पोस्ट इसलिए किया था क्योंकि उन्होंने कहा था कि दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी पाबंदियां और कानून-व्यवस्था का मामला अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. ऐसे ही तर्क के साथ चीफ जस्टिस ने इंडिया गठबंधन के डेलिगेशन से भी मिलने से मना कर दिया था.
मुख्य न्यायाधीश के मिलने से इनकार करने के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली को किला बना दिया गया है. लोगों को दिल्ली आने से रोका जा रहा है. बस और ट्रेन बंद की जा रही हैं. उन्होंने कहा कि जो लोग लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं, उन्हें सख्त सजा भुगतनी होगी.
जॉर्ज ऑरवेल का मानना है कि 'राजनीति में भाषा को इस तरह तैयार किया जाता है कि वह सिर्फ एक दावा न लगे, बल्कि एक नैतिक विजय की तरह दिखे. राहुल गांधी यही कर रहे हैं. इससे पहले भी वह कई बार अधिकारियों को लेकर ऐसे दावे कर चुके हैं.
इस बार उन्होंने विपक्ष के मार्च की तुलना शिव की बारात से भी की है. इस पर भारतीय जनता पार्टी ने घोर आपत्ति जताई. सोमवार को इंडिया गठबंधन का जो मार्च निकला था, उसमें कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी थी. तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल भी शामिल थे. एनसीपी का शरद पवार गुट और शिवसेना का उद्धव गुट भी शामिल था. झारखंड मुक्ति मोर्चा और लेफ्ट पार्टियां भी शामिल थीं.
इस प्रदर्शन में कमोबेश सभी विपक्षी पार्टियों के नेता मौजूद थे, लेकिन आम आदमी पार्टी के नेता नहीं थे. बल्कि, वो अलग से प्रदर्शन कर रहे थे. आज कोई पहली बार नहीं है, जब आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन के विरोध-प्रदर्शन से खुद को अलग किया हो. 6 अक्टूबर को जब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने आकाशवाणी भवन परिसर के अंदर करीब 8 घंटे तक लंबा धरना दिया था, उसमें भी आम आदमी पार्टी के नेता शामिल नहीं थे. जबकि धरने से पहले 'सेव डेमोक्रेसी मार्च' में इंडिया गठबंधन के सांसद मौजूद थे.
7 अक्टूबर को जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने लंच पर विपक्षी पार्टियों को बुलाया था, उसमें भी आम आदमी पार्टी के नेता नहीं पहुंचे. उसके बाद जब विपक्ष सड़क पर उतरा, तो उसमें भी आप शामिल नहीं थी. 8 अक्टूबर को कांग्रेस नेता ने फिर लंच पर बुलाया. उस दिन समाजवादी पार्टी के नेता शामिल हुए, लेकिन आम आदमी पार्टी के नेता उस दिन भी नहीं पहुंचे.
9 अक्टूबर को मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेता पैदल मार्च करते हुए राष्ट्रपति भवन पहुंचे और वहां राष्ट्रपति से मुलाकात की. उस मार्च में भी आम आदमी पार्टी के नेता शामिल नहीं थे.
राजनीतिक तौर पर यह बहुत ही दिलचस्प है कि कांग्रेस या इंडिया गठबंधन और आम आदमी पार्टी, दोनों का मुद्दा एक है, दोनों का लक्ष्य भी एक है और दोनों सड़क पर भी उतर रहे हैं, लेकिन दोनों के बीच एक निश्चित दूरी है. सवाल है कि यह दूरी आखिर किस मजबूरी की वजह से है? आपको यह भी जानना चाहिए.
भले ही इनका मुद्दा एक हो, लेकिन आम आदमी पार्टी अब व्यावहारिक रूप से इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है. पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं. दोनों के लिए पंजाब महत्वपूर्ण है और दोनों को एक-दूसरे के खिलाफ वोट मांगना है. गुजरात, दिल्ली और हरियाणा में भी दोनों पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ लड़ती हैं.
अरविंद केजरीवाल जानते हैं कि इंडिया गठबंधन के मंच पर जाने से राहुल गांधी को नेतृत्व और श्रेय मिलेगा. आम आदमी पार्टी जानती है कि कांग्रेस के बजाय CJP का मंच उसे युवाओं और लोगों से सीधे जोड़ेगा. यही कारण है कि आम आदमी पार्टी CJP के मंच पर दिखती है, लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडिया गठबंधन के किसी भी धरना-प्रदर्शन से दूर रहती है.
अमेरिकी राजनीतिक विश्लेषक एच. एल. मेंकेन का मानना है कि, "राजनीति में आपकी प्रासंगिकता सिर्फ इस बात से नहीं है कि आप सरकार के कितने खिलाफ हैं, बल्कि इस बात से भी है कि आप अपने सहयोगियों से कितने आगे खड़े हैं." एक तरह से राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल के बीच नेतृत्व को लेकर ऐसी ही स्थिति है.
जिस इंडिया गठबंधन में अधिकतर विपक्षी पार्टियां शामिल हैं, वो केंद्र सरकार के खिलाफ लगातार सड़क पर उतर रहा है. उसी मुद्दे पर आम आदमी पार्टी इंडिया गठबंधन से अलग धरना-प्रदर्शन कर रही है. और उसी मुद्दे पर आम आदमी पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी के साथ खड़ी भी दिखती है.
10 अक्टूबर को जब कॉकरोच जनता पार्टी ने आंदोलन का आह्वान किया था, उसमें आम आदमी पार्टी के नेता शामिल थे. आंदोलन के दौरान जब CJP प्रमुख अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया गया, तो अरविंद केजरीवाल सड़कों पर उतरे. लेकिन 6 अक्टूबर से लगातार प्रदर्शन कर रहे राहुल गांधी और कांग्रेस के नेता कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से दूर रहे.
एक और बात. जिस दिन कांग्रेस का प्रदर्शन होता है, उस दिन कॉकरोच जनता पार्टी सड़क से दूर रहती है और जिस दिन कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन का आह्वान करती है, उस दिन कांग्रेस के नेता सड़क पर नहीं उतरते. CJP के किसी भी आंदोलन या प्रदर्शन में आज तक राहुल गांधी शामिल नहीं हुए हैं. पेपरलीक को लेकर जब सोनम वांगचुक अनशन कर रहे थे तब औपचारिकता के लिए पवन खेड़ा वहां जरूर पहुंचे थे. लेकिन चुनाव आयोग के मुद्दे पर दोनों के रास्ते बिल्कुल अलग हैं. तो सवाल है कि क्या राहुल गांधी यह मान चुके हैं कि आम आदमी पार्टी और CJP दोनों एक हैं? इसलिए कांग्रेस के नेताओं ने CJP के आंदोलन से दूरी बना ली है?
एक और दिलचस्प तथ्य ये भी है कि कांग्रेस और CJP में भले ही दूरी हो, लेकिन इंडिया गठबंधन में शामिल कई दल ऐसे हैं, जो दोनों के धरना-प्रदर्शनों में शामिल हो रहे हैं. इनमें समाजवादी पार्टी, टीएमसी, आरजेडी और लेफ्ट पार्टियां हैं, जिनके नेता दोनों के मंच पर दिखते हैं. यही कारण है कि बीजेपी इन धरना-प्रदर्शनों को लेकर विपक्षी पार्टियों के नेताओं की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा रही है. हम आपको सुनाते हैं कि आज के धरना-प्रदर्शन पर बीजेपी क्या कह रही है.
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल कहते थे कि, "जनता हमेशा उस आवाज़ के पीछे चलती है, जो सबसे ज्यादा आश्वस्त और आक्रामक लगती है. शब्दों का युद्ध वही जीतता है, जो आखिरी और सबसे तीखा प्रहार करता है."
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और SIR को लेकर इस वक्त सरकार और विपक्ष के बीच ऐसी ही लड़ाई चल रही है. विपक्षी पार्टियां सरकार को घेरने के लिए अलग-अलग स्तर पर धरना-प्रदर्शन कर रही हैं, तो उन्हें जवाब देने के लिए बीजेपी भी उतनी ही आक्रामक दिखने की कोशिश कर रही है.