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प्रसिद्ध अमेरिकी राजनीतिक दार्शनिक और लेखक फ्रांसिस फुकुयामा का विचार है कि संस्थाओं पर आम लोगों का विश्वास ही लोकतंत्र की असली मुद्रा है. जब चुनाव कराने वाली संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं तो पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का दिवाला निकल जाता है. भारतीय निर्वाचन आयोग, भारत की ये संवैधानिक संस्था आज ट्रेंड कर रही है. चर्चा की वजह एक अखबार की रिपोर्ट है. इस रिपोर्ट में दावा किया गया है मुख्य चुनाव आयुक्त और बाकी के दो चुनाव आयुक्तों के बीच फैसलों को लेकर मतभेद है. दावा ये भी किया गया है कि साथियों की आपत्तियों के बाद भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपनी मर्जी से फैसले लिए. अखबार की इस रिपोर्ट के बाद विपक्ष. चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनाव की पवित्रता पर सवाल उठा रहा है. इसलिए अब इस विवाद का विस्तार से विश्लेषण करते हैं.
अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के दौरान कई अहम मसलों पर चुनाव आयोग में एकराय नहीं थी. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए. दावा है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में 14 बार आपत्तियां दर्ज की. 16 अप्रैल को एक ही दिन में चार बार आपत्ति जताई गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि ये आपत्तियां उन फैसलों और निर्देशों को लेकर थीं, जो दोनों चुनाव आयुक्तों के मुताबिक उनकी सहमति के बिना जारी किए गए.
दोनों चुनाव आयुक्तों ने जो आपत्तियां दर्ज कराई थीं, उनका संबंध मतदाता सूची में नए वोटर्स के रजिस्ट्रेशन, नाम हटाने-जोड़ने और पूरी मतदाता सूची की निगरानी और सुरक्षा से जुड़ा था. अब जानते हैं कि रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति की किन घटनाओं को विशेष तौर पर रेखांकित किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक असहमति का पहला बड़ा मुद्दा वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 में बदलाव से जुड़ा है. चुनाव आयोग की वेबसाइट पर ऑनलाइन फॉर्म 6 में एक नया हिस्सा जोड़ा गया. इसमें आवेदक से उसके माता-पिता का नाम पिछले SIR में दर्ज होने से जुड़ी जानकारी मांगी गई. आरोप है कि इस बदलाव के लिए जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस फैसले पर चुनाव आयोग में सहमति नहीं थी.
SIR पर CEC ने चुनाव आयुक्तों की नहीं सुनी? 24 घंटे में 4 आपत्ति.. क्या अनसुनी कर दी गई?
चुनाव आयोग में 'कलह' के दावे का DNA टेस्ट#DNA #DNAWithRahulSinha #SIR #CEC #ElectionCommission @rahulsinhatv pic.twitter.com/G8HdhQ3SVd— Zee News (@ZeeNews) September 23, 2026
मतभेद का दूसरा बिंदु इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर और ECINET से जुड़ा है. पहले वोटर लिस्ट से जुड़े काम ERO-Net नाम के सॉफ्टवेयर पर होते थे. 22 जनवरी 2026 को चुनाव आयोग ने ECINet लॉन्च किया. रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर सवाल उठाए कि क्या इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर को वोटर लिस्ट तक पूरा एक्सेस मिल रहा है. क्योंकि कागज पर फैसला इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर करता है. लेकिन कई मामलों में अधिकारी सिर्फ वही कार्रवाई कर पा रहे थे, जिसकी अनुमति सॉफ्टवेयर देता था.
4 नवंबर 2025 को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू के निर्देश पर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर ने IT विभाग के अधिकारियों को चिट्ठी लिखी, इसमें कहा गया था कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर, जिला निर्वाचन अधिकारी और मुख्य चुनाव अधिकारी के कानूनी अधिकारों में बदलाव नहीं होना चाहिए.
2 जनवरी 2026 को डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर संजय कुमार ने फिर पत्र लिखकर ये बात दोहराई. इसके करीब 20 दिन बाद ECINet लॉन्च किया गया.
16 अप्रैल 2026 को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने लिखा कि IT विभाग ने पिछले कुछ महीनों में कई नए मॉड्यूल और पोर्टल बनाए, लेकिन इसकी जानकारी उन्हें या आयोग के सामने नहीं रखी गई. यानी बदलाव की सूचना चुनाव आयुक्त को नहीं दी गई.
29 मई को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर संजय कुमार को पत्र लिखकर ऑडिट का सुझाव दिया. 13 जुलाई को संधू ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया.
28 जुलाई 2026 सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग को IT विभाग के प्रशासन का अतिरिक्त प्रभार दिया गया. मनीष गर्ग ने काम संभालने के कुछ घंटों में ही डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर संजय कुमार को IT की निगरानी से हटा दिया. आरोप है कि इसके लिए आयोग से मंजूरी नहीं ली गई.
29 जुलाई को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कैबिनेट सेक्रेटरी को पत्र लिखकर इस बदलाव को कानून का उल्लंघन बताया. दोनों चुनाव आयुक्तों ने मनीष गर्ग के खिलाफ कार्रवाई की मांग की.
30 जुलाई को चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मिलकर मनीष गर्ग का आदेश रद्द कर दिया.
14 अगस्त को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने IT सिस्टम और वोटर लिस्ट को लेकर चिंता जताई. कहा कि मुख्य चुनाव अधिकारी, डिप्टी चुनाव अधिकारी और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के पद पर तैनात कई अधिकारियों को ERONet का सही और पूरा एक्सेस नहीं है.
पश्चिम बंगाल में SIR में हटाए गए 34 लाख मामलों को लेकर भी चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि ट्राइब्यूनल में पेंडिंग मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आयोग की तरफ से याचिका दायर करने के लिए किसे और किसके द्वारा अधिकृत किया गया. उन्होंने आपत्ति जताई कि इस मामले में उन्हें और पश्चिम बंगाल की मुख्य निर्वाचन अधिकारी को जानकारी नहीं दी गई थी.
अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक गोवा में 97 वोटर्स जांच के बाद फाइनल वोटर लिस्ट में जोड़े जाने के योग्य थे. लेकिन सॉफ्टवेयर में नाम जोड़ने का विकल्प नहीं था. रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कैबिनेट सेक्रेटरी को अलग-अलग चिट्ठी लिखी. चिट्ठी में कामकाज के बंटवारे. कामकाज में बदलाव और वोटर लिस्ट से जुड़े IT सिस्टम की निगरानी को लेकर आपत्ति जताई गई. इन चिट्ठियों के बाद 9 सितंबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई. चार महीनों में तीनों के बीच पहली बैठक थी.
अखबार की रिपोर्ट ने जो सवाल उठाए हैं, उसने विपक्ष को फिर SIR और चुनावी प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगाने का अवसर दे दिया. विपक्ष के नेताओं ने इस पर सवाल उठाए हैं. चुनाव आयुक्तों में मतभेद और आयोग के कामकाज पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट पर चुनाव आयोग ने 8 प्वाइंट का बयान जारी किया है. बयान में आयोग ने कहा है कि सभी ऑफिशियल फैसले पूरी तरह से कानूनी तौर पर मान्य हैं. सभी फैसले कानून के मुताबिक ही लिए गए हैं. चुनाव आयोग के सदस्यों के सवाल स्टैंडर्ड एडमिनिस्ट्रेटिव प्रैक्टिस का हिस्सा हैं. चुनाव आयुक्तों ने जो सुझाव दिए वो चुनावी प्रक्रिया को और बेहतर बनाने के लिए थे.
हर फैसले से पहले अलग-अलग विचार और बातचीत. फैसला लेने की प्रक्रिया का हिस्सा है. 10 महीने की कुछ खास घटनाओं को हाईलाइट करना. तस्वीर का सिर्फ एक हिस्सा दिखाना है. चुनाव आयोग की चिट्ठी में कुछ बड़े प्वाइंट भी सामने आए हैं.
चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रख कर ये बताने की कोशिश की है कि चुनाव आयुक्तों में कोई मतभेद नहीं है. चुनाव आयोग से जुड़े पूर्व अधिकारियों का कहना है कि तीनों चुनाव आयुक्तों को एक साथ सामने आना चाहिए. पूर्व चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने जी न्यूज पर कहा कि तीनों चुनाव आयुक्त को साथ आकर बयान देना चाहिए.
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है. संविधान में चुनाव आयोग के कामकाज और अधिकार की पूरी व्याख्या है. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 चुनाव आयुक्तों की शक्तियों और फैसले की प्रक्रिया को पूरी तरह परिभाषित करती है. जानते हैं कि चुनाव आयोग में फैसले लेने को लेकर नियम क्या कहता है.
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 (1) के मुताबिक कामकाज और कामकाज के बंटवारे की प्रक्रिया केवल सर्वसम्मत निर्णय से तय होगी.
धारा 18(2) के अनुसार आयोग का पूरा कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से होगा.
धारा 18(3) के मुताबिक अगर मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों में मतभेद हो, तो फैसला बहुमत की राय के अनुसार तय होगा.
सरल भाषा शब्दों में कहें तो चुनाव आयोग में फैसले के लिए सर्वसम्मति पहला नियम है, सहमति नहीं बने तो बहुमत से फैसला होता है. CEC को वीटो का अधिकार नहीं है. मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के वोट बराबर है. चुनाव आयोग में कामकाज, फैसलों की प्रक्रिया कानूनी तौर पर पूरी तरह साफ है. लेकिन कामकाज और चुनाव आयुक्तों की शक्तियों को लेकर विवाद पहले भी हुआ है. अतीत में हुए विवाद की संक्षिप्त जानकारी भी महत्वपूर्ण है.
अक्टूबर 1993 में सरकार ने चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय बना दिया था. मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के साथ एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति को आयुक्त नियुक्त किया गया. नाराज टीएन शेषन सुप्रीम कोर्ट चले गए. उनकी याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि
अनुच्छेद 324 आयोग को बहु-सदस्यीय संस्था बनने की अनुमति देता है. कोर्ट ने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों को शेषन के बराबर मताधिकार प्राप्त हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने सर्वसम्मति नहीं तो बहुमत वाले नियम की व्याख्या भी की.
दूसरा प्रमुख विवाद 2019 लोकसभा चुनाव के समय आया. जब चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने PM मोदी के चार और अमित शाह के एक भाषण को आदर्श आचार संहिता में दी गई क्लीन चिट पर असहमति जताई. 21 मई 2019 को पूर्ण आयोग ने 2-1 से तय किया कि असहमति फाइल में तो दर्ज होगी पर आदेश में उसे शामिल नहीं किया जाएगा.
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में असहमति का भी अधिकार होता है. पहले भी चुनाव आयुक्त असहमति जताते रहे हैं. असहमति के इस अधिकार को विवाद बताने वाले विपक्षी नेताओं पर बीजेपी सवाल उठा रही है.
इस विवाद के बीच आज चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में चीफ जस्टिस को शामिल करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इन याचिकाओं पर अब संविधान पीठ सुनवाई करेगी. याचिका पर सुनवाई कर रहे दो जज. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की राय अलग-अलग थी.
जस्टिस दीपांकर दत्ता सैद्धांतिक रूप से इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने के पक्ष में नहीं थे. उनका कहना था कि दो जजों की बेंच भी फैसला सुना सकती है. लेकिन बेंच के दूसरे साथी जज से एकराय नहीं होने के कारण उन्होंने कहा कि मामले में बेवजह देरी ना हो इसलिए बेहतर होगा कि चीफ जस्टिस पांच जजों की संविधान पीठ का गठन करें. वहीं जस्टिस एस सी शर्मा का मानना था कि सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ को करनी चाहिए.
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि मौजूदा स्वरूप में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले पैनल का झुकाव सरकार की तरफ है. यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और कैबिनेट मंत्री वाले पैनल में कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री के सुझाव के विपरीत राय रखेंगे. ऐसे में नेता विपक्ष की भूमिका सिर्फ सजावटी रह जाती है.