DNA: 'सीमा पर गोलियां खाईं, दफ्तरों में धक्के...', जांबाज सैनिक की व्यथा ने पूरे सिस्टम को किया शर्मसार, जानिए क्या है पूरा मामला
ये योद्धा सिर्फ एक दिन के अपमान से नहीं टूटा है. कारगिल युद्ध के इस जवान के आत्मसम्मान पर बार-बार चोट की गई. ये सिलसिला 26 साल से चल रहा है.
मित्रो DNA में विश्लेषण की शुरुआत आज हम भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा के एक विचार से करेंगे. उनका मानना था कि 'एक सैनिक सिर्फ युद्ध के मैदान में ही सैनिक नहीं होता, वह जीवनभर देश का गौरव रहता है. अगर कोई समाज अपने सेवानिवृत्त सैनिकों की सुध नहीं ले सकता, तो वह अपनी सुरक्षा की नींव को खुद ही कमजोर कर रहा है. दुर्भाग्यवश कर्नाटक में यही हुआ.
जिस योद्धा ने कारगिल के युद्ध में पाकिस्तान को परास्त किया, वह देश की व्यवस्था से हार गया. जिसने दुश्मनों को हराया, जिसने देश के लिए जंग के मैदान में अपने पैर दे दिये..उसे हमारे देश का सिस्टम..पैर रखने के लिए भी जमीन नहीं दे पाया. वो सैनिक..जिसने अपनी आधी जवानी देश की रक्षा करते हुए खपाई और आधी जवानी..सरकारी दफ्तर और रिश्वतखोर बाबुओं के चक्कर काटते-काटते खपा दी. उसे आज जहर खाना पड़ा है. उसे सरकार और सिस्टम ने जहर खाने के लिए मजबूर कर दिया. मित्रो, कारगिल युद्ध में घायल हुए पूर्व सैनिक शिवानंद रेड्डी के साथ पिछले 26 साल से अन्याय हो रहा है. घनघोर उपेक्षा से आजिज आकर उन्होंने खुदकुशी करने की कोशिश की. आज वो अस्पताल में भर्ती हैं.
मित्रो, जो व्यक्ति देश के लिए अपना खून बहाने के लिए तैयार रहता है, वह देश से इस बात की उम्मीद रखने का हकदार है कि उसके साथ सम्मान और न्याय का व्यवहार किया जाए. लेकिन सेना के रिटायर्ड नायक एन.के. शिवानंद रेड्डी के साथ न तो न्याय हुआ और न ही उन्हें सम्मान मिला. बार-बार अपमानित और उपेक्षित होने के बाद उन्होंने जहर खा लिया और पिछले 6 दिनों से बेंगलुरु के एक अस्पताल के ICU में भर्ती हैं. मित्रो पूर्व सैनिक शिवानंद रेड्डी ने इसलिए जहर खा लिया क्योंकि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने उनके साथ बदसलूकी की थी. अपने अधिकार की मांग करने पर उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया.
ये योद्धा सिर्फ एक दिन के अपमान से नहीं टूटा है. कारगिल युद्ध के इस जवान के आत्मसम्मान पर बार-बार चोट की गई. ये सिलसिला 26 साल से चल रहा है. कर्नाटक में चिक्काबल्लापुर जिले के चिंतामणि के रहने वाले पूर्व सैनिक शिवानंद रेड्डी साल 2000 से इसी तरह अपमानित हो रहे हैं.
1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल वॉर हुई थी, तब वह मराठा लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट में नायक के पद पर तैनात थे. एक नाइट पेट्रोलिंग के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए, जिससे उनके दाहिने पैर में गंभीर चोट आई. पैर की चोट के कारण उन्हें मेडिकल ग्राउंड पर साल 2000 में रिटायर कर दिया गया. रिटायरमेंट के बाद ही देश के लिए दिव्यांग हुए सैनिक के रूप में उन्हें कृषि भूमि देने का वादा किया गया और जमीन के लिए फाइल की प्रक्रिया शुरू हुई. फिर वो जमीन की फाइल घूमती रही. इस टेबल से उस टेबल तक. इस अधिकारी से उस अधिकारी तक. कई अधिकारी बदल गए. कर्नाटक में कई सरकारें बदल गईं. लेकिन एक पूर्व सैनिक की फाइल पास नहीं हुई. उन्हें ज़मीन नहीं मिली.
जब पूर्व सैनिक शिवानंद रेड्डी को जमीन देने का वादा किया गया था, तब कर्नाटक में कांग्रेस के एस.एम. कृष्णा मुख्यमंत्री थे. वह मुख्यमंत्री से केंद्र में मंत्री बन गए. बाद में बीजेपी में आ गए. कर्नाटक में कांग्रेस, जेडीएस और बीजेपी की बारी-बारी से सरकारें बदलती रहीं, लेकिन सरहद पर खड़े होकर देश के लिए अपना पैर गंवाने वाले रिटायर्ड सैनिक शिवानंद रेड्डी को अपने घर में जमीन नहीं मिली. पिछले 26 सालों में शिवानंद रेड्डी ने सैकड़ों बार आवेदन जमा किए और अधिकारियों को प्रतिवेदन दिए. जब अधिकारियों ने उनकी फाइलों पर ध्यान नहीं दिया, तो उन्होंने चिक्काबल्लापुर में उपायुक्त और तहसीलदार कार्यालयों के बाहर कई बार शांतिपूर्ण धरने और विरोध प्रदर्शन किए. लेकिन किसी ने भी उन्हें न्याय नहीं दिया.
और सुनिए, अपनी फाइल को आगे बढ़ाने के लिए लगातार दफ्तरों के चक्कर काट रहे रिटायर्ड नायक शिवानंद रेड्डी से राजस्व विभाग के अधिकारियों ने 10 लाख रुपये की रिश्वत भी मांगी. ध्यान से सुनिएगा. जिस जवान ने बॉर्डर पर दिन-रात खड़े होकर देश की रक्षा की, वो जब रिटायर्ड हुआ, तो उसका अधिकार देने के बदले एसी दफ्तर में बैठकर काम करने वाले अधिकारियों ने रिश्वत की मांग की. शिवानंद ने इसकी शिकायत लोकायुक्त से कर दी, जिसके बाद जाल बिछाकर दो सरकारी कर्मचारियों सहित तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था.
केंद्रीय सतर्कता आयोग की वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट कल ही जारी हुई है, जिसमें दर्ज है कि पिछले साल सरकारी विभागों और संस्थानों के खिलाफ भ्रष्टाचार की कुल 70,584 शिकायतें मिलीं. जिन विभागों के खिलाफ शिकायतें मिलीं, उनमें बैंक और रेलवे शीर्ष स्थान पर थे. लेकिन दूसरे विभाग इससे अछूते हैं, ऐसा नहीं है. राजस्व विभाग को चौथे स्थान पर रखा गया है, जहां भ्रष्टाचार की 3 हजार से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गईं.
इसी राजस्व विभाग में 2022 में पूर्व सैनिक शिवानंद रेड्डी से 10 लाख रुपये मांगे गए थे. जब ये रिश्वत कांड हुआ था और अधिकारियों की नीति और नीयत पर सवाल उठे थे, तब जाकर साल 2022 में सरकार ने उन्हें जमीन का एक टुकड़ा अलॉट किया.
लेकिन जमीन का वो टुकड़ा भी ऐसा था, जो बंजर था. जिस पर खेती नहीं की जा सकती है. जबकि खेती की जमीन देने का वादा किया गया था. इसलिए रिटायर्ड नायक शिवानंद रेड्डी ने वो जमीन लेने से इनकार कर दिया. प्रशासन की दलील है कि हमने तो जमीन दी, लेकिन शिवानंद रेड्डी ने जमीन ली ही नहीं. सोचिए..ये कितनी बेशर्मी है कि 22 साल लगा दिए जमीन अलॉट करने में और खेती के नाम पर पेशकश भी की तो बंजर जमीन की.
- कर्नाटक के 'लैंड ग्रांट रूल्स, 1969' के अनुसार, हर गांव में उपलब्ध कुल भूमि का 10 प्रतिशत हिस्सा पूर्व सैनिकों और सैनिकों के लिए आरक्षित रखने का नियम है.
- जिला कलेक्टरों को हर गांव में इस आरक्षित भूमि की पहचान करके छह महीने के भीतर उसे अधिसूचित करने का कानूनी निर्देश दिया गया है.
- आवेदन प्राप्त होने के बाद तहसीलदार और जिला अधिकारियों को वरीयता सूची के आधार पर अनिवार्य रूप से जमीन का आवंटन करना होता है.
- सामान्य कृषि उद्देश्यों के लिए एक पात्र व्यक्ति को अधिकतम लगभग 5 एकड़ तक भूमि आवंटित की जा सकती है.
- यह जमीन मुख्य रूप से खेती और कृषि के उपयोग के लिए दी जाती है.
लेकिन कर्नाटक के चिक्काबल्लापुर के अधिकारी अब भी बेशर्मी के साथ कह रहे हैं कि उन्हें जमीन दी थी, लेकिन ली नहीं. क्यों नहीं ली, इस पर बात नहीं करते. ऐसे अधिकारियों को आज शिवानंद रेड्डी को इस तरह अस्पताल में देखकर अपने आसपास एक चुल्लू पानी ढूंढना चाहिए, क्योंकि पिछले 26 सालों में इन अधिकारियों ने न सिर्फ एक पूर्व फौजी को इधर से उधर टहलाया, बल्कि उसे बार-बार अपमानित करके उसके आत्मसम्मान पर चोट की.
मित्रो, शिवानंद रेड्डी का मामला कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह पूर्व सैनिकों के साथ होने वाली प्रशासनिक अनदेखी की सिर्फ एक और कड़ी है. विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कर्नाटक सरकार ने खुद माना कि सिर्फ दावणगेरे जिले में पूर्व सैनिकों के 328 आवेदन पिछले तीन साल से अधर में लटके हैं.
सरकार ने स्वीकार किया कि ये 328 आवेदन प्रशासनिक सुस्ती के कारण न तो स्वीकार किए गए हैं और न ही खारिज किए गए हैं. बेंगलुरु के रहने वाले रिटायर्ड मेजर एस. जयप्रकाश ने 2009 में जमीन के लिए आवेदन किया था, लेकिन 2019 तक संघर्ष करने के बाद भी उन्हें जमीन नहीं मिली. मेजर जयप्रकाश ने राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक को इस संबंध में चिट्ठियां लिखी थीं, लेकिन व्यवस्था से कोई ठोस मदद नहीं मिली.
दक्षिण कन्नड़ जिले के बेल्तंगडी के रहने वाले पूर्व सैनिक चंदप्पा डी.एस. 1997 में आतंकियों से लड़ते हुए जख्मी हुए थे. उन्होंने जमीन के लिए आवेदन दिया. 2004 से अब तक 300 से अधिक बार आवेदन जमा किए लेकिन अंत में उनकी सारी उम्मीदें टूटकर बिखर गईं. उन्हें जमीन नहीं मिली.
सोचिए... सरकार ने खुद नियम बनाए हैं. वैध नियम के तहत पूर्व सैनिकों, सैनिकों की विधवाओं या सैनिकों को जमीन आवंटित की जाती है. फिर भी सरकार उन्हें जमीन नहीं दे पा रही है. सवाल है कि अगर सरकार के पास जमीन नहीं है, तो फिर ऐसा नियम क्यों बनाया? और अगर है, तो फिर जमीन देती क्यों नहीं है? जाहिर है कि नीयत में खोट है. जब ज़ी न्यूज़ ने सरकार से सवाल पूछा तो उन्होंने संज्ञान लेने की बात कही है.
सोचिए..6 दिन पहले शिवानंद रेड्डी ने खुदकुशी और सरकार को कल पता चला. अब वो पता करवाएंगे कि पूर्व सैनिक को इतने सालों से जमीन क्यों नहीं मिली. मित्रो कर्नाटक सरकार के पास बहुत जमीन है. और उस जमीन में जमकर हेराफेरी भी हो रही है.
इसी साल कर्नाटक के मांड्या जिले के नागामंगला तालुका में 320 एकड़ सरकारी ज़मीन को गैरकानूनी तरीके से आवंटित कर दिया गया. फर्जी ग्रांट ऑर्डर, नकली नोटिस और जाली सरकारी मंजूरियां दिखाकर 200 करोड़ रुपये की जमीन फर्जी तरीके से बांट दी गई लेकिन कानूनी तरीके से पूर्व सैनिक को देने के लिए जमीन नहीं है.
2021 से 2026 के बीच मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण के तत्कालीन कमिश्नर जी.टी. दिनेश कुमार पर फर्जी दस्तावेज़ों और बैकडेटेड आवंटन पत्रों के जरिए अयोग्य लाभार्थियों को जमीन आवंटित करने का आरोप है.
सोचिए...सरकारी तंत्र जो घंटों में फर्जी आवंटन कर सकता है, वह एक दिव्यांग कारगिल वीर को 26 साल से जमीन खोजकर नहीं दे पा रहा है. मतलब साफ है कि सिर्फ नीति और नीयत का मामला है, इससे ज्यादा और कुछ नहीं है. सरकार के पास जमीन है, लेकिन अधिकारियों की मनमानी के कारण पूर्व सैनिक शिवानंद रेड्डी जैसे योद्धाओं को बरसों तक सिस्टम से लड़ना पड़ता है और हारकर जहर खाना पड़ता है. देश के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और कुछ भी नहीं हो सकता है.