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308 पहियों वाले इस विशाल ट्रक की तस्वीरें आपने सोशल मीडिया पर जरूर देखी होंगी. करीब 100 फीट लंबा यह ट्रक पिछले चार महीने से सड़क पर है. कभी इसे ओडिशा में देखा गया, तो कभी झारखंड, बिहार और अब उत्तर प्रदेश में. लेकिन सवाल है कि यह ट्रक आखिर जा कहां रहा है? और करीब चार महीने बाद भी यह अपनी मंजिल तक क्यों नहीं पहुंच पाया है?
इस ट्रक की कहानी अप्रैल में शुरू हुई. मशीन को बेल्जियम से समुद्र के रास्ते भारत भेजा गया. करीब एक महीने की समुद्री यात्रा के बाद यह मशीन ओडिशा के पारादीप पोर्ट पहुंची. इसके बाद कागजी कार्रवाई और जरूरी मंजूरी में एक महीने से ज्यादा समय लगा. क्लियरेंस मिलने के बाद मशीन को सड़क के रास्ते उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के लिए रवाना किया गया.
यह ट्रक पारादीप से झारखंड होते हुए बिहार पहुंचा और फिर उत्तर प्रदेश के चंदौली पहुंचा. अब तक करीब 1000 किलोमीटर का सफर पूरा हो चुका है. अभी इसे गाजीपुर, गोरखपुर और बलरामपुर होते हुए करीब 500 किलोमीटर और जाना है. फिलहाल यह वाराणसी में है. इस ट्रक को देखने के लिए रास्ते में लोगों की भीड़ जुट रही है. इसकी वजह इसका असामान्य आकार है. एक दिन में सिर्फ 8 से 10 किलोमीटर की रफ्तार. अब सवाल है कि करीब 1500 किलोमीटर का सफर पूरा करने में चार महीने से ज्यादा समय क्यों लग रहा है?
जिस दूरी को सामान्य वाहन करीब 50 घंटे में तय कर सकते हैं, उसे यह ट्रक महीनों में पूरा कर रहा है. इसकी वजह है इसका आकार और इसके साथ चल रहा पूरा काफिला. जिस मशीन को यह ट्रक लेकर जा रहा है, उसकी लंबाई 41 मीटर, चौड़ाई 6 मीटर और ऊंचाई 7 मीटर है. इसका वजन 1 लाख 64 हजार किलो है. इतनी बड़ी मशीन को ले जाने के लिए खास ट्रक का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके साथ 14 सपोर्ट वाहन भी चल रहे हैं. इनमें JCB, क्रेन और ट्रेलर शामिल हैं. करीब 40 लोगों की टीम भी इस काफिले के साथ है. इसके बावजूद यह काफिला एक दिन में सिर्फ 8 से 10 किलोमीटर ही आगे बढ़ पा रहा है.
इस ट्रक को रास्ता देने के लिए कई जगहों पर खास इंतजाम करने पड़े हैं. कहीं फुट ओवर ब्रिज के हिस्से हटाए गए हैं, तो कहीं साइन बोर्ड हटाए गए हैं. बिजली के पोल और तार भी हटाने पड़े हैं. कई जगह हाई टेंशन बिजली लाइन को कुछ समय के लिए बंद किया गया. कुछ जगह स्ट्रीट लाइट हटाई गईं. सड़कों को चौड़ा किया गया और कीचड़ वाले रास्तों पर वैकल्पिक रास्ता बनाया गया.
अब सवाल है कि इस मशीन को इतनी दूर ले जाने के लिए इतनी तैयारी क्यों करनी पड़ रही है? दरअसल, यह मशीन एक ऐसे प्लांट का हिस्सा है, जहां गन्ने के अवशेष से बायो-प्लास्टिक बनाया जाएगा. बायो-प्लास्टिक ऐसा प्लास्टिक है जिसे सामान्य प्लास्टिक की तुलना में पर्यावरण के लिए कम नुकसानदायक माना जाता है. सालाना 80 हजार टन बायो-प्लास्टिक बनाने का दावा. कंपनी का दावा है कि प्लांट शुरू होने के बाद हर साल 80 हजार टन बायो-प्लास्टिक का उत्पादन होगा. इसे आसान भाषा में समझें तो 80 हजार टन बायो-प्लास्टिक से करीब 180 करोड़ दो लीटर वाली कोल्ड ड्रिंक की बोतलें बनाई जा सकती हैं. यही वजह है कि इस प्लांट की अहम मशीन को लखीमपुर खीरी तक पहुंचाने के लिए इतना बड़ा इंतजाम किया गया है.