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ड्रोन के खतरे से निपटने के लिए DRDO ने एक कार्यक्रम शुरु किया है. इस एंटी ड्रोन का नाम है शील्ड. शील्ड नाम के इस प्रोग्राम में DRDO ने प्राइवेट कंपनियों को शामिल होने का न्योता दिया है. इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल यानी प्रस्ताव जारी होने का कदम पूरा कर लिया गया है. DRDO चाहता है कि निजी क्षेत्र की कंपनियों के विशेषज्ञों की राय और उनकी काबिलियत को भी शील्ड प्रोग्राम में शामिल किया जाए. दरअसल DRDO जल्द से जल्द इस सिस्टम को तैयार करना चाहता है. इसी वजह से निजी कंपनियों को भी प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाने का फैसला किया गया है.
आधुनिक युद्ध में ड्रोन सबसे बड़ा हथियार बन चुका है. ये एक ऐसा हथियार है जिसकी लागत कम है. जिसे दागने के लिए दुश्मन के क्षेत्र में जाने का जोखिम नहीं उठाना पड़ता, और इसकी मारक क्षमता किसी बड़े रॉकेट से कम नहीं है. जिस तरह पिनाका जैसा बड़ा रॉकेट किसी बिल्डिंग को तबाह कर सकता है. उतना ही नुकसान एक ड्रोन भी पहुंचा सकता है.
अब तक ड्रोन को मार गिराने के लिए एयर डिफेंस सिस्टम का प्रयोग किया जाता रहा है. यही पर एक पेंच फंसा है. ड्रोन के मुकाबले उसे मार गिराने वाली मिसाइल की लागत कहीं ज्यादा है.इसी वजह से शील्ड के जरिए DRDO एक ऐसा हथियार विकसित करना चाहती है. जिसे दागने की लागत ड्रोन की कीमत से भी कम बैठे. शील्ड प्रोग्राम के लिए DRDO ने माइक्रोवेव्स यानी सूक्ष्म तरंगों के परीक्षण का फैसला किया है. इसलिए पहले ये समझना जरूरी है कि माइक्रोवेव्स यानी सूक्ष्म तरंगे क्या होती हैं.
दरअसल ये ऊर्जा की सूक्ष्म तरंगे होती हैं. इन तरंगों के जरिए चुंबकीय और विद्युत ऊर्जा भेजी जाती है. आपके घर का वाई-फाई और माइक्रोवेव अवन भी ऐसी ही तरंगों पर काम करता है. फर्क सिर्फ इतना है कि घर के वाई-फाई में सामान्य स्तर की सूक्ष्म तरंगों का प्रयोग किया जाता है. जबकि DRDO हाई पावर माइक्रो वेव्स के इस्तेमाल का प्लान बना रहा है.
DRDO का लक्ष्य एक ऐसा यंत्र तैयार करना है जो इतनी तेज ऊर्जा की सूक्ष्म तरंगे भेजे, जिनके जरिए प्रति सेकेंड 4 करोड़ छोटे-छोटे कंपन पैदा हो सकें. ये सब जानते हैं कि ड्रोन के अंदर माइक्रो चिप्स लगी होती हैं. ड्रोन का अपना एक वाइरिंग यानी इलेक्ट्रिक सिस्टम भी होता है. अगर सूक्ष्म तरंगों से प्रति सेकेंड निकले 4 करोड़ कंपन किसी ड्रोन से टकराएंगे तो उसके अंदर स्थित चिप्स और इलेक्ट्रिक सिस्टम अस्त व्यस्त हो जाएंगे. यानी ड्रोन को उड़ने की ऊर्जा देने वाला सिस्टम या फिर धमाका करने वाले सिस्टम पर असर पड़ेगा. ऐसी स्थिति में हाई पावर सूक्ष्म तरंगों से टकराकर ड्रोन नीचे गिर जाएगा.
DRDO ने इस सिस्टम का एक प्रतीकात्मक वीडियो भी जारी किया है. अब हम आपको DNA की वीडियो वॉल पर यही वीडियो दिखाने जा रहे हैं. इस वीडियो में आपको नजर आएगा कैसे एक माइक्रो वेव जेनरेटर से तरंगें छोड़ी जा रही हैं. ये तरंगें सैकड़ों की तादाद में आए छोटे ड्रोन से टकरा रही हैं. तरंगों के संपर्क में आते ही ये ड्रोन निष्क्रिय होकर नीचे गिर जाते हैं.
इस तरीके के एंटी ड्रोन सिस्टम से कई फायदे होंगे. जिनमें पहला फायदा होगा कि ड्रोन के अंदर मौजूद विस्फोटक या बम को फटने का मौका नहीं मिलेगा. ड्रोन निष्क्रिय होकर चाहे टारगेट के नजदीक गिरे या फिर किसी नागरिक इलाके में. जब धमाका ही नहीं होगा तो ड्रोन से किसी किस्म का नुकसान नहीं होगा.
DRDO जिस शील्ड प्रोग्राम पर काम कर रहा है. उसका दूसरा बड़ा फायदा है लागत में बड़ा फर्क. जैसा कि हमने आपको बताया था एक सस्ते ड्रोन को मारने के लिए हवाई रक्षा प्रणाली का इस्तेमाल एक महंगा सौदा है. जब DRDO ये सिस्टम तैयार कर लेगा, तो लागत में कितना फर्क पड़ेगा. ये भी देखना और समझना जरूरी है.
विस्फोटक से लदे एक FPV यानी छोटे ड्रोन की कीमत तकरीबन 50 से 55 हजार रुपए पड़ती है. दूसरी तरफ शील्ड जैसे सिस्टम से सूक्ष्म तरंगों को एक बार दागने की कीमत तकरीबन 80 रुपए पड़ेगी. अगर दुश्मन एक साथ 10 ड्रोन दागता है तो वो लगभग साढ़े पांच लाख रुपए खर्च करेगा. जबकि इन 10 ड्रोन को मार गिराने के लिए शील्ड पर तकरीबन 800 रुपए का खर्च आएगा. यानी DRDO का एंटी ड्रोन सिस्टम कई गुना सस्ता साबित होगा.
इसी दिक्कत का सामना रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन कर रहा है. रूस को ईरान के शाहेद ड्रोन की तकनीक मिल चुकी है. आधुनिक इंजन से चलने वाले रूसी ड्रोन को बनाने की लागत 66 लाख रुपए पड़ती है. इन ड्रोंस को मार गिराने के लिए यूक्रेन को पेट्रियट जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता है. एक पेट्रियट मिसाइल की कीमत तकरीबन 28 करोड़ रुपए है. इसी वजह से यूक्रेन ने भी सूक्ष्म तरंगों के सिस्टम विकसित करने की कोशिश की है, लेकिन यूक्रेन इसमें कामयाब नहीं हो पाया है. ड्रोन और मिसाइल का ये युद्ध यूक्रेन पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने इसी किस्म के एक सिस्टम का इस्तेमाल किया था. इस सिस्टम का नाम था D-4. D-4 के जरिए पाकिस्तान से आए ड्रोंस को निष्क्रिय किया गया था.
फर्क इतना है कि D-4 के जरिए ड्रोन के सिग्नल बाधित किए गए थे. कुछ ड्रोन के सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल को जाम यानी बंद कर दिया गया था. शील्ड इसी तकनीक का बड़ा विस्तार है. इस तकनीक के जरिए ना सिर्फ ड्रोन के सिग्नल बाधित किए जाएंगे. बल्कि ड्रोन ने अगर खुद को दोबारा उड़ाने की कोशिश की तो वो भी रोक दिया जाएगा. शील्ड नाम का ये सिस्टम विकसित होते ही भारत दुनिया के उन चुनींदा देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जिनके पास ऐसे ड्रोन रोकने वाले सिस्टम हैं.
अगर माइक्रोवेव यानी सूक्ष्म तरंगों के जरिए ड्रोन गिराने वाले सिस्टम की बात करें. तो इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है अमेरिका. अमेरिका के पास मॉर्फियस नाम का एंटी ड्रोन सिस्टम है. अमेरिकी सिस्टम की खासियत ये है कि इसे जमीन और आसमान से भी इस्तेमाल किया जा सकता है. यानी इस सिस्टम को हेलीकॉप्टर में भी फिट किया जा सकता है. दूसरे नंबर पर चीन है जिसके पास हरिकेन नाम का सिस्टम है. चीन के एंटी ड्रोन सिस्टम की एक लिमिट है. ये 3 किलोमीटर से ज्यादा दूर ड्रोन को हिट नहीं कर सकता. इजरायल भी एक ऐसा ही सिस्टम विकसित कर चुका है. अब भारत का नंबर है जो शील्ड प्रोग्राम पर तेजी से काम कर रहा है.
जिन देशों के पास तरंग आधारित एंटी ड्रोन सिस्टम है. उनमें से सिर्फ अमेरिका और इजरायल ही ऐसे दो देश हैं. जिनके सिस्टम को जंग में इस्तेमाल किया जा चुका है. खासकर इजरायल की तकनीक अमेरिका और चीन से भी पावरफुल साबित हुई है. इजरायल के एंटी ड्रोन सिस्टम का नाम है फेज़र. फेज़र की विशेषता ये है कि ड्रोन को मार गिराने के लिए. ये इजरायली सिस्टम माइक्रो वेव्स के साथ ही साथ लेजर तकनीक का भी इस्तेमाल करता है. अगर सूक्ष्म तरंगों के वार से कोई ड्रोन बच गया तो फेज़र से निकलने वाली हाई पावर लेजर उस ड्रोन को हवा में ही जला देती है.
अब हम आपको भारत की शील्ड तकनीक का एक और बड़ा फायदा बता देते हैं. ये फायदा है दुश्मन की तकनीक का पता लगाना. शील्ड का मकसद ड्रोन को निष्क्रिय कर उसे गिराना है. ऐसी प्रक्रिया में ड्रोन नष्ट नहीं होता. ड्रोन को कब्जे में लेकर उसकी इंजीनियरिंग का पता लगाया जा सकता है. इससे ना सिर्फ विदेशी तकनीक का पता चलता है. बल्कि ड्रोन की तकनीकी खामियों के बारे में भी जानकारी हासिल की जा सकती है.
भारत के शील्ड प्रोग्राम की जानकारियां समझने के बाद आचार्य चाणक्य की एक नीति याद आती है. अर्थ शास्त्र में आचार्य चाणक्य ने एक नीति के बारे में बताया है.
इस नीति को कहा जाता है - शस्त्रेण शस्त्रं शाम्यति. इसका अर्थ है कि शत्रु के शस्त्र को ज्यादा शक्तिशाली शस्त्र से ही निरस्त किया जा सकता है. अर्थशास्त्र में बताया गया है कि शासक और सेनापति को प्रति अस्त्रों का विकास करना चाहिए. ये ऐसे शस्त्र और अस्त्र होते हैं जो युद्ध के मैदान में दुश्मन के शस्त्रों को निष्क्रिय या नाकाम कर देते हैं.
जितनी दिलचस्पी के साथ आप हमारा विश्लेषण देख रहे हैं. यकीन मानिए उतनी ही फिक्र के साथ ये खबर पाकिस्तान में भी देखी जा रही होगी. इसकी वजह है पाकिस्तान का नया-नवेला ड्रोन. जो इस्लामिक जगत के कथित खलीफा तुर्किए ने दिया है. इस ड्रोन का नाम है बायकार. तुर्किए ने इस ड्रोन के साथ-साथ पाकिस्तान को दिए दूसरे हथियारों का एक वीडियो भी साझा किया है.
इस वीडियो में सबसे पहले आपको बायकार ड्रोन नजर आएगा. तुर्किए का दावा है कि इस ड्रोन की रेंज यानी हमला करने की दूरी 2 हजार किलोमीटर है. दावा ये भी है कि एक बार उड़ान भरने के बाद ये ड्रोन 13 घंटे तक हवा में रह सकता है.
तुर्किए ने तो तारीफों के पुल बांधकर पाकिस्तान को अपने ड्रोन बेच दिए हैं, लेकिन पाकिस्तान की परेशानी को दरकिनार नहीं किया जा सकता. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के पारंपरिक एयर डिफेंस ने तुर्किए में बने ड्रोंस को मार गिराया था. अब भारत..शील्ड जैसी महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। वैसे, तुर्किये के ड्रोन पर इतराने वाले पाकिस्ता को ये समझना चाहिए कि तुर्किए के जो ड्रोन...भारत की आकाश हवाई रक्षा प्रणाली को नहीं भेद पाए, वो शील्ड जैसी आधुनिक तकनीक से कैसे निपटेंगे.