थप्पड़ की सियासत में दब गया सड़क का असली सवाल: 15 घंटे में उखड़ी दिल्ली की रोड, 16 करोड़ की ‘क्विक रोड’ में क्या है पूरा खेल?
दिल्ली के तिलकनगर में रातों-रात बनी सड़क 15 घंटे में उखड़ गई. थप्पड़ विवाद के बीच सड़क की गुणवत्ता, 16 करोड़ के बजट, क्विक रोड सिस्टम, जवाबदेही और देशभर में खराब सड़क निर्माण के बड़े सवालों की पड़ताल करती ये रिपोर्ट.
दिल्ली में एक मंत्री का थप्पड़कांड आज भी चर्चा में है. इस पर लगातार सियासत हो रही है. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल प्रवेश वर्मा के थप्पड़कांड को जेन-जी के अपमान से जोड़ रहे हैं, तो सरकार आरोप लगा रही है कि विपक्षी पार्टियां सरकारी काम में अड़ंगा लगा रही हैं. सरकार और विपक्ष के बीच जारी जुबानी जंग और थप्पड़ की गूंज में वो असली मुद्दा, सड़क गायब हो गया है जिसकी वजह से ये सब हुआ है.
15 घंटे भी नहीं चली सड़क, क्यों उठे सवाल?
सार्वजनिक तौर पर अभी उस सड़क के स्तरहीन निर्माण पर चर्चा होनी चाहिए. सवाल ये पूछा जाना चाहिए कि ऐसी सड़क क्यों बनाई गई जो 15 घंटे भी नहीं चली? आखिर रातों-रात तिलकनगर में सड़क बनवाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म की तरह सरकार का सड़क बनाने वाला विभाग भी सड़कों की ऐसी क्विक डिलीवरी क्यों करता है जिसकी कोई गारंटी नहीं होती? इन्हीं सवालों के साथ अब इंस्टेंट रोड और सड़कों की क्विक डिलीवरी सिस्टम को समझना जरूरी है.
दिल्ली के तिलकनगर में पीडब्ल्यूडी विभाग ने रातों-रात एक सड़क बनाई, क्योंकि 5 अक्टूबर को गुरुद्वारे में एक कार्यक्रम होना है. शनिवार की रात ये सड़क बनकर तैयार हुई और रविवार को दिल्ली सरकार के पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रवेश वर्मा सड़क का निरीक्षण करने पहुंचे. इसी दौरान आम आदमी पार्टी के विधायक जरनैल सिंह भी वहां पहुंच गए. जरनैल सिंह ने बताया और दिखाया कि सड़क निर्माण की क्वालिटी कितनी खराब है. सड़क को उखाड़कर वह प्रवेश वर्मा को दिखा रहे थे. इसी दौरान कुछ ऐसा हुआ, जिसके बाद प्रवेश वर्मा ने एक लड़के को थप्पड़ मार दिया.
सड़क की क्वालिटी से ज्यादा थप्पड़ पर सियासत
इस थप्पड़कांड के बाद से सड़क की क्वालिटी से ज्यादा थप्पड़ पर राजनीति होने लगी. आज अरविंद केजरीवाल उस सड़क पर गए, जहां हंगामा हुआ था. उन्होंने वहां से भी प्रवेश वर्मा के थप्पड़कांड का जिक्र किया और फिर इसे जेन-जी से जोड़ दिया. जहां सड़क के स्तरहीन निर्माण पर चर्चा होनी चाहिए, वहां थप्पड़ को लेकर राजनीति हो रही है.
अरविंद केजरीवाल को सड़क की घटिया क्वालिटी से ज्यादा थप्पड़ पर दुख हो रहा है. इसमें कहीं से कोई संदेह नहीं है कि मंत्री प्रवेश वर्मा को आत्मनियंत्रण रखना चाहिए था. थप्पड़ मारने के बजाय सड़क निर्माण पर जवाब देना चाहिए था. उन्होंने जो किया, उसे कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है. लेकिन अरविंद केजरीवाल जैसे नेता को अगर सड़क की घटिया क्वालिटी से ज्यादा थप्पड़ पर दुख हो रहा है, तो इसका मतलब बहुत साफ है कि उनके लिए सड़क की घटिया क्वालिटी से ज्यादा महत्वपूर्ण थप्पड़ और जेन-जी के नाम पर राजनीति है. और सिर्फ अरविंद केजरीवाल नहीं हैं. देश के तमाम नेताओं के लिए सड़क की घटिया क्वालिटी से बड़ा मुद्दा थप्पड़कांड हो गया है.
रातों-रात सड़क बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?
प्रवेश वर्मा को भी ये लगा कि वह थप्पड़ को लेकर सियासी तौर पर घिर चुके हैं, तो उन्होंने सड़क को लेकर 189 सेकंड का एक वीडियो बनाया. इसमें उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की कि सड़क इसलिए उखड़ रही थी क्योंकि उनकी सरकार ने ऑन डिमांड सड़क की क्विक डिलीवरी की थी. यानी इंस्टेंट रोड बनाया था.
इससे ये सवाल उठता है कि अचानक ही रातों-रात सड़क बनी. दिल्ली में डेढ़ साल से बीजेपी की सरकार है, फिर इस सड़क को रात में दबाव में क्यों बनाना पड़ा? क्या पिछले डेढ़ साल में टेंडर निकालकर सड़क बनाने का समय नहीं मिला? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि जैसा कि मंत्री और उनके अधिकारी खुद कह रहे हैं कि ये तात्कालिक रूप से बनाई गई है, तो फिर रातों-रात इसका सामान और इसे बनाने का खर्च कहां से हुआ? क्या ये दिल्ली के आम टैक्सपेयर के पैसों की बर्बादी नहीं है?
तिलकनगर की सड़क पहले से थी तय
तिलकनगर की सड़क अचानक नहीं बनी है. इसे बनना पहले से तय था. वहां पर कोलतार और कंक्रीट मिलाकर सड़क की पक्की परत बिछाने का काम चल रहा है. सरल शब्दों में कहें तो वहां पहले से तय था कि सड़क ठीक करना है.
यह काम दिल्ली की आउटर रिंग रोड पर हो रहा है. यह हिस्सा जनकपुरी डिस्ट्रिक्ट सेंटर चौक से लेकर नजफगढ़ नाले तक का है. इसकी कुल लंबाई करीब साढ़े 5 किलोमीटर है और इसमें सड़क के दोनों तरफ और ऊपर बने एलिवेटेड कॉरिडोर का हिस्सा भी शामिल है.
इस पूरे काम को करने के लिए सरकार की तरफ से पौने सोलह करोड़ रुपये का अनुमानित बजट तय किया गया है. लेकिन मंत्री और इंजीनियर सब कह रहे हैं कि सड़क अचानक बन गई.
ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सड़क की क्वालिटी देखने गए एक्सपर्ट ने दावा किया कि ऑन-डिमांड क्विक डिलीवरी की गई इस सड़क की कोई गारंटी नहीं है.
क्विक डिलीवरी वाली सड़क कितने दिन चलेगी?
जो सड़क बनी है, उसकी क्वालिटी बहुत ही निम्नस्तरीय है. यह दावा हमारा नहीं है, क्योंकि हम या हमारी टीम सड़क क्वालिटी एक्सपर्ट नहीं हैं. जो एक्सपर्ट हैं, वो कह रहे हैं कि इस सड़क को किसी भी तरह से बना दिया गया है. अगर सरकार को इस दावे पर कोई शक है, तो उसे एक्सपर्ट्स से बात करनी चाहिए.
जिस सड़क की क्विक डिलीवरी की जाती है, वो कितने दिन चलेगी, ये कोई नहीं जानता. ये भी हो सकता है कि 4 महीने चले, 6 महीने चले या फिर दो महीने बाद से ही जगह-जगह टूटने लगे. क्योंकि इसी दिल्ली के तिमारपुर में इसी तरह रातों-रात एक सड़क की क्विक डिलीवरी हुई थी और चार महीने के अंदर ही सड़क पर गड्ढे हो गए.
सिर्फ दिल्ली नहीं, देशभर में सड़क की क्विक डिलीवरी
सड़क की क्विक डिलीवरी सिर्फ दिल्ली में नहीं है. पूरे देश में इसके एक्सपर्ट हैं. हर राज्य में सड़क बनाने वाले विभाग में विशेषज्ञ बैठे हुए हैं, जो बिना टेंडर निकाले, बिना किसी फॉर्मेलिटी के, रातों-रात सड़क बनाकर तैयार कर देते हैं. शर्त ये होती है कि सड़क बनाने का कोई ऊपर से दबाव हो. जैसा कि दिल्ली के तिलकनगर में हुआ, इसी तरह नवंबर 2025 में उत्तराखंड में भी हुआ था.
तब राष्ट्रपति को नैनीताल जाना था. रातों-रात नैनीताल-काठगोदाम मार्ग को बनाकर चमका दिया गया. राष्ट्रपति वहां से लौटकर गईं और कुछ घंटे के बाद ही सड़क उखड़ने लगी थी.
इसी तरह पिछले महीने बिहार में भी हुआ था, जहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को मधुबनी जाना था. जहां जाना था, वहां की सड़क खराब थी और रातों-रात सड़क बना दी गई. ऐसी रातों-रात बनने वाली सड़कों के लिए कोई टेंडर नहीं निकलता है, लिहाजा इसका एग्जैक्ट आंकड़ा नहीं है. लेकिन ऐसा देशभर में होता है. किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या किसी और वीआईपी के दौरे से पहले सड़क बनकर तैयार कर दी जाती है.
दिल्ली में सड़कें कौन बनाता है?
दिल्ली में चार अलग-अलग विभाग अलग-अलग सड़कें बनाते हैं. दिल्ली की प्रमुख सड़कें दिल्ली सरकार का PWD बनाता है. स्थानीय सड़कें और गलियां MCD बनाती है. नई दिल्ली नगरपालिका क्षेत्र की सड़कें NDMC बनाती है. इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्र और अपने अधीन आने वाली सड़कें अलग-अलग एजेंसियां बनाती हैं.
तिलकनगर वाली सड़क को PWD ने बनाया था. PWD विभाग ने इस साल सड़क की मरम्मत के लिए 475 करोड़ रुपये का बजट रखा है. मतलब, पौने पांच सौ करोड़ रुपये से सड़कों की सिर्फ मरम्मत की जाती है. मरम्मत के नाम पर जो होता है, वो तिलकनगर में दिखा है.
सड़क सिर्फ रास्ता नहीं, बड़ी अर्थव्यवस्था है
ये अखिल भारतीय राष्ट्रीय स्तर की समस्या है. देशभर में करीब पौने 64 लाख किलोमीटर सड़कों का नेटवर्क है. इसमें हर तरह की सड़कें शामिल होती हैं.
IIT कानपुर के एक अध्ययन के मुताबिक, नेशनल हाईवे बनाने में सालाना करीब 33 करोड़ कार्य-दिवस पैदा होते हैं. कार्य-दिवस का मतलब है एक व्यक्ति का एक दिन काम करना. मतलब, राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने से साल भर में लगभग 13 लाख लोगों को पूरे साल काम मिलने के बराबर रोजगार पैदा होता है.
सड़क निर्माण, सुधार और रखरखाव से जुड़े कामों के लिए केंद्र सरकार ने 2026-27 में लगभग 3 लाख 29 हजार करोड़ रुपये का बजट रखा है. इसमें मजदूरों से लेकर सीमेंट, बिटुमेन, मशीन और ढुलाई तक कई कारोबार जुड़े हैं. यह हर दिन करीब 900 करोड़ रुपये के बजट के बराबर है.
सड़क टूटे तो जिम्मेदार कौन?
देश में सड़क बनाने के लिए लंबा-चौड़ा बजट है. ये आम लोगों के टैक्स के पैसे से खर्च होता है. पूरा सिस्टम इसमें लगा हुआ है. फिर भी रखरखाव के नाम पर ऐसी सड़कें बनाई जाती हैं, जो कुछ ही घंटों के अंदर टूट जाती हैं. सड़क के टूटने के बाद इसके रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होती है, वो भी जानना चाहिए.
पहली जिम्मेदारी उस सरकारी विभाग की है, जिसकी सड़क है. मतलब, PWD ने बनाई तो उसकी या फिर NHAI ने बनाई तो उसकी जिम्मेदारी है. विभाग यह कहकर नहीं बच सकता कि काम ठेकेदार ने किया था. जांच में देखा जाना चाहिए कि गलती सड़क के डिजाइन में थी, घटिया सामग्री या निर्माण में, इंजीनियर के निरीक्षण में, या समय पर मरम्मत न करने में.
राष्ट्रीय राजमार्ग की कुछ EPC परियोजनाओं में ठेकेदार को बिटुमिनस सड़क यानी डामर से बनी सड़क का मेंटेनेंस 5 सालों तक करना पड़ता है, जबकि कंक्रीट से बनी सड़क का मेंटेनेंस 10 सालों तक ठेकेदार को ही करना पड़ता है.
फिर भी सड़कें टूट रही हैं और सड़क के टूटने का खामियाजा भी आम लोगों को ही चुकाना पड़ता है.
गड्ढों की कीमत जान से चुकानी पड़ रही है
2024 में सड़कों पर गड्ढों के कारण 5 हजार 432 सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं, जिनमें 2 हजार 385 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. अकेले दिल्ली में गड्ढों की वजह से 84 दुर्घटनाएं हुईं और 16 लोगों की मौत हुई. ये सिर्फ एक साल का आंकड़ा है.
सड़क हादसों की तीन वजहें हो सकती हैं. एक गाड़ी चलाने वालों की अपनी गलती. दूसरा सड़क निर्माण की घटिया क्वालिटी और तीसरा, उस सड़क का समय पर मेंटेनेंस नहीं करना. और ये सिर्फ दिल्ली की समस्या नहीं है. ये राष्ट्रीय स्तर की समस्या है.
सिंगापुर में AI से सड़कों की निगरानी
क्षेत्रफल में दिल्ली से लगभग आधा है सिंगापुर. सड़क क्वालिटी के मामले में सिंगापुर पहले स्थान पर है. सिंगापुर की लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी अपनी 9,500 लेन-किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों की निगरानी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वीडियो एनालिटिक्स का उपयोग करती है. इन वाहनों में लगे हाई-डेफिनिशन कैमरे सड़क पर आए किसी भी छोटे क्रैक या खामी को तुरंत पकड़ लेते हैं. क्लाउड सिस्टम पर इसकी रिपोर्ट भेज देते हैं और 24 घंटे के अंदर उसे ठीक भी कर दिया जाता है.
भारत में हाईवे या मुख्य सड़कों पर गड्ढा दिखने या रिपोर्ट होने के 1 से 2 दिन के भीतर उसे ठीक करने का नियम है, लेकिन यहां पर मौसम देखकर सड़कों का मेंटेनेंस किया जाता है. बारिश में टूटी सड़कें 2 से 3 महीने तक वैसी ही पड़ी रहती हैं. नगर निगमों या ग्रामीण निकायों की सड़कों पर बजट की कमी या टेंडर प्रक्रियाओं में देरी के कारण गड्ढे ठीक होने में कई बार 6 महीने से लेकर 1 साल तक का वक्त भी लग जाता है. और कई जगह तो कई सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन सड़कें ठीक नहीं होतीं और होती भी हैं तो 24 घंटे में उखड़ने लग जाती हैं.
चालान की वसूली हो सकती है तो सड़क की जवाबदेही क्यों नहीं?
आज ही सड़क और वाहन चालकों से ट्रैफिक चालान वसूलने के लिए सख्त कदम उठाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्देश दिए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई आदमी गाड़ी चलाते हुए ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करता है, तो सिर्फ ई-चालान जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि चालान की रकम वसूलने के लिए नए उपाय अपनाने होंगे.
जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा कि अगर लोग ट्रैफिक चालान का भुगतान नहीं करते हैं, तो अधिकारी बिजली बिल सहित अन्य सरकारी बकाया राशि से जोड़कर चालान की रकम वसूलने के नए तरीके अपनाएं.
सख्ती से वाहन चालकों से ट्रैफिक चालान वसूलना चाहिए, जिससे कि वो ट्रैफिक नियम तोड़ने से परहेज करें. लेकिन एक सवाल ये भी है कि देश की सर्वोच्च अदालत इस पर भी विचार करे कि लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके जो सड़क बनती है, वो अगर तुरंत टूट जाए या सड़कों पर गड्ढे हों, तो इसकी वसूली किससे की जाए. इसके लिए किससे चालान वसूला जाए ताकि आम लोगों के पैसे बर्बाद न हों.