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राम-सीता विवाह के गाने में कव्वाली-सूफी बीट्स? 'रामायण' के म्यूजिक पर क्यों मचा बवाल

'रामायण' को लेकर दर्शकों में काफी बज बना हुआ है. हाल ही में फिल्म का गाना 'मंगल रंग' रिलीज हुआ, जिस पर कथित तौर पर कव्वाली और सूफी बीट्स के इस्तेमाल का आरोप लगा है. म्यूजिक डायरेक्टर एआर रहमान पर कई सवाल उठ रहे हैं.

Written By Kajol Gupta
Published: Oct 27, 2026, 10:58 PM IST | Updated: Oct 27, 2026, 11:06 PM IST
Image Credit: 'रामायण' के म्यूजिक पर क्यों मचा बवाल?
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भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे महंगी फिल्म ‘रामायण’ बनकर तैयार हो चुकी है और 6 नवंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है. हाल ही में इसका एक गीत रिलीज हुआ है, जो राम विवाह पर है, लेकिन आरोप है कि सीता और राम के विवाह वाले सीन में जो गाना बज रहा है, उसमें कव्वाली और सूफी बीट्स का इस्तेमाल किया गया है. राम विवाह में कव्वाली और सूफी बीट्स का प्रयोग सीधे-सीधे सनातनी आस्था पर चोट है. इसलिए बड़े स्तर पर लोग इसका विरोध कर रहे हैं. म्यूजिक डायरेक्टर एआर रहमान की मंशा पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं. इसलिए अब हम जनभावनाओं से जुड़े ‘रामायण’ में इस तरह के पाप करने वाली सोच का DNA टेस्ट करेंगे.

महान शिक्षाविद डॉ. के. एम. मुंशी का मानना था कि 'कला और सिनेमा का यह कर्तव्य है कि वह इन्हें आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करते समय इनके मूल रस और मर्यादा को दूषित न करे. कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर इनके सांस्कृतिक स्वरूप को बिगाड़ना अक्षम्य है.' लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम की जीवनगाथा पर बनी नई फिल्म में ऐसा ही अपराध करने का आरोप लगा है. 25 अक्टूबर को ‘रामायण’ फिल्म का नया सॉन्ग 'मंगल रंग' रिलीज हुआ. 145 सेकेंड के इस गाने को जैसे ही लोगों ने सुना, इसे आस्था पर चोट कहना शुरू कर दिया. संगीत के जानकारों का कहना है कि गाने के म्यूजिक में कव्वाली और सूफी बीट्स का प्रयोग हुआ है, जो एक तरह का पाप है. सबसे पहले हम आपको विवादित म्यूजिक का एक छोटा-सा हिस्सा सुनाना चाहेंगे.

इसी गाने पर लगा सूफी बीट्स डालने का आरोप

यही वह गाना है, जिसके म्यूजिक में शातिराना तरीके से सूफी बीट्स डालने का आरोप लगा है. लोग म्यूजिक डायरेक्टर एआर रहमान की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछ रहे हैं कि राम विवाह में सूफी बीट्स का क्या काम है? वे पूछ रहे हैं कि गाने में कव्वाली वाले म्यूजिक का इस्तेमाल क्यों किया गया है? लोग इसे सनातनी संस्कृति का घोर अपमान बता रहे हैं. पूछा जा रहा है कि पौराणिक महाकाव्य पर बनी फिल्म के गानों में बॉलीवुड फिल्मों जैसी धुनों की जगह शुद्ध संस्कृत और पारंपरिक संगीत का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? फिल्म मेकर्स का दावा है कि उन्होंने कंप्यूटर ग्राफिक्स के जरिए अयोध्या और सोने की लंका को बेहद शानदार दिखाया है और इस फिल्म पर 4 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि क्या फिल्म बनाने से पहले हमारी संस्कृति को लेकर ढंग से रिसर्च नहीं की गई थी?

म्यूजिक डायरेक्टर एआर रहमान पर उठ रहे सवाल

जिस फिल्म के मेकर्स का दावा है कि उसका मुख्य उद्देश्य व्यावसायिक आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति को पूरी दुनिया के सामने गर्व से और जनभावनाओं का पूरा आदर करते हुए पेश करना है, उसी फिल्म के सबसे महत्वपूर्ण गानों में सूफी बीट्स और कव्वाली का म्यूजिक डाल दिया गया और किसी ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया? हम आपको सुनाते हैं कि महाभारत में भीष्म पितामह का किरदार निभाने वाले मुकेश खन्ना किस तरह फिल्म मेकर्स और विशेषकर म्यूजिक डायरेक्टर एआर रहमान की सोच पर सवाल उठा रहे हैं.

कलाकार की स्वतंत्रता असीमित हो सकती है, लेकिन जब बात किसी समाज की गहरी आस्था और युगों पुराने सांस्कृतिक मूल्यों की हो, तो वहां संवेदनशीलता और सत्यनिष्ठा ही कलाकार का सबसे बड़ा धर्म होना चाहिए. जब पहली बार राम कथा पर धारावाहिक बना था, तब भी इसी धर्म का पालन किया गया था. जब राही मासूम रज़ा ने महाभारत के संवाद लिखे थे, तब भी उन्होंने इसी धर्म का पालन किया था, लेकिन इस बार संगीतकार एआर रहमान इसमें चूकते दिख रहे हैं.

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ये वही एआर रहमान हैं, जिन्होंने ‘छावा’ फिल्म में भी संगीत दिया था और बाद में उसी ‘छावा’ फिल्म को विभाजनकारी बता दिया था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि पिछले 8 वर्षों से उन्हें बॉलीवुड में काम मिलना कम हो गया है और इसका कारण सांप्रदायिक या धार्मिक हो सकता है. लेकिन सोचिए, उसी बॉलीवुड ने अपनी सबसे महंगी फिल्म और सनातन के ब्रांड एंबेसडर श्रीराम की फिल्म उन्हें दे दी. लोग पूछ रहे हैं कि क्या ‘रामायण’ फिल्म में म्यूजिक देते समय एआर रहमान ‘छावा’ फिल्म वाली सोच से तो प्रभावित नहीं थे? ऐसे सवालों के बीच उन्होंने एक इंटरव्यू में सफाई देते हुए कहा है कि उन्होंने अपना काम ईमानदारी से किया है. सोशल मीडिया पर आ रही प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देने की उनमें अब ज्यादा ऊर्जा नहीं बची है.

हालांकि, जिस ‘छावा’ को उन्होंने विभाजनकारी कहा था, उसके बारे में भी रहमान ने दावा किया था कि उन्होंने बहुत ईमानदारी से म्यूजिक दिया है. तो सवाल यह भी है कि क्या कव्वाली और सूफी बीट्स का इस्तेमाल परसेप्शन बनाने के लिए भी तो उसी ईमानदारी से नहीं किया गया है? क्योंकि फिल्मों का एक काम परसेप्शन बनाना भी है.

आइए ‘रामायण’ से समझें 

आप जब भगवान राम या माता सीता की कल्पना करते हैं, तो सीधे रामायण धारावाहिक के राम और सीता की छवि आपकी आंखों के सामने आती है. वही सरलता और सहजता दिखाई देती है. जो संगीत त्रेतायुग में था ही नहीं, जो सूफी संगीत 700 से 800 साल पहले आया, उसकी धुन पर राम विवाह का गाना बनेगा, तो क्या संदेश जाएगा? आज से एक-दो पीढ़ी बाद जब यह गाना बजेगा, तब इस फिल्म का रेफरेंस देकर दावा किया जाएगा कि राम विवाह में भी कव्वाली और सूफी संगीत बजता था. इसलिए इस संगीत पर घोर आपत्ति जताई जा रही है. हम आपको सुनाते हैं कि साधु-संत इस पर क्या कह रहे हैं.

पवित्रता केवल विचारों में ही नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति में भी होनी चाहिए. जब आप जनभावनाओं से जुड़े प्रतीकों को पर्दे पर उतारते हैं और उनकी कहानी बताते हैं, तो आपकी कला में श्रद्धा का अंश होना अनिवार्य है. जब इस अनिवार्यता को दरकिनार करके धूर्तता की जाती है, तो फिर क्या होता है, यह राम कथा से प्रेरित फिल्म ‘आदिपुरुष’ से सीखना चाहिए. 2023 में 600 करोड़ रुपये की लागत से यह फिल्म बनी थी, लेकिन इसके किरदारों के साथ जिस तरह का मजाक किया गया, उसे लोग स्वीकार नहीं कर पाए और वह फिल्म सुपर फ्लॉप रही. मेकर्स को 200 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा.

इसी साल एक फिल्म रिलीज हुई, ‘हनुमान अंश’. बहुत ही कम बजट की, बहुत ही साधारण तरीके से यह फिल्म बनाई गई थी, जिसमें कोई तामझाम नहीं था. कोई ऑस्कर विजेता संगीतकार नहीं था. फिल्म की सादगी और संगीत ने लोगों को इस तरह कनेक्ट किया कि 2 करोड़ रुपये की यह फिल्म अब तक साढ़े चार सौ करोड़ रुपये की कमाई कर चुकी है. इस फिल्म के गाने ग्लोबली सुपरहिट हो चुके हैं.

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दोनों फिल्मों में मूल अंतर क्या है?

मूल अंतर यह है कि रामायण के नाम पर ‘आदिपुरुष’ जैसी फिल्म में आस्था पर चोट की गई. उसके डायलॉग्स हों या फिर अभिनय, कहीं से भी लोग उससे कनेक्ट नहीं कर पाए, जबकि साधारण-सी फिल्म ‘हनुमान अंश’ की सादगी लोगों को पसंद आई. ‘रामायण’ के म्यूजिक डायरेक्टर हों या फिर फिल्म के निर्माता-निर्देशक, उन्हें ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्मों से सीखना चाहिए कि कैसे आस्था के जरिए लोगों को जोड़ा जाता है, न कि विवाद खड़ा किया जाता है.

जब कोई ‘रामायण’ या ‘महाभारत’ जैसे महाकाव्यों पर फिल्म बनती है, तो वह सिर्फ एक फिल्म नहीं होती, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था की व्याख्या होती है. लोग उन किरदारों में अपने आराध्यों को देखने की चेष्टा करते हैं. फिल्मकारों की चुनौती उन किरदारों से लोगों को कनेक्ट करने की भी होती है. इस फिल्म में साई पल्लवी ने माता सीता का किरदार निभाया है. माता सीता के किरदार की वेशभूषा और आभूषणों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.

साई पल्लवी को जो भारी कुंदन चोकर हार पहनाया गया है, वह तकनीक प्राचीन भारत की नहीं है. लोग इसे आस्था से खिलवाड़ बता रहे हैं. कई जानकारों का कहना है कि रामकथा जिस कालखंड की है, उस समय भारत में सोने के इतने परिष्कृत और भारी आभूषणों के पुरातात्विक साक्ष्य बेहद दुर्लभ हैं. गहनों के साथ-साथ माता सीता के दुपट्टे और साड़ियों पर जो भारी बॉर्डर और गोटा-पत्ती का काम है, उसे भी पूरी तरह मुगलकालीन कला बताया जा रहा है. कुल मिलाकर, साई पल्लवी को जो भारी सोने के गहने और 'कुंदन-मीनाकारी' ज्वेलरी पहनाई गई है, उसका डिजाइन त्रेतायुग की पौराणिक पृष्ठभूमि से मेल नहीं खाता. मित्रो, सीता बनीं साई पल्लवी निजी जीवन में भी विवादों में रही हैं. 2022 में उन्होंने कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की तुलना गो-तस्करी के शक में होने वाली मॉब लिंचिंग से कर दी थी. सिर्फ साई पल्लवी ही नहीं, भगवान राम का किरदार भी उस रणबीर कपूर को दिया गया है, जिन्होंने खुद स्वीकार किया था कि वह बीफ खाते हैं.

सोचिए, ऐसे कलाकारों के साथ करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ी फिल्म ‘रामायण’ बनाई गई है. ऊपर से अब राम-सीता विवाह के गाने में कव्वाली और सूफी संगीत को शातिराना अंदाज में मिश्रित करने का आरोप लग रहा है. यह यकीनन आस्था पर चोट है. फिल्म बनाने पर भारी-भरकम खर्च करने वाले अगर सनातन की समृद्ध विरासत और सांस्कृतिक पवित्रता के मायने समझ जाते, तो शायद यह विवाद नहीं होता. इसलिए कहते हैं कि जब आप लोगों की आस्था से जुड़े विषय पर फिल्म बनाते हैं, तो उससे पहले हर विषय पर, हर एंगल से शोध करना चाहिए और जनभावना और आस्था का सम्मान करना चाहिए.

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About the Author

काजोल गुप्ता जी न्यूज में सब एडिटर हैं और पिछले साढ़े 3 साल से डिजिटल मीडिया में काम कर रही हैं. कुछ समय तक उन्होंने नेशनल, बिहार-झारखंड और पॉलिटिकल बीट पर काम किया. इसके बाद बीते 2 साल से उन्होंने जी न्यूज में एंटरटेनमेंट बीट पर काम करना शुरू किया. अभी फिलहाल वह एंटरटेनमेंट बीट पर ही एक्टिव हैं. अपने करियर के दौरान काजोल ने बॉलीवुड इंडस्ट्री के जाने-माने डायरेक्टर और म्यूजिक इंडस्ट्री की हस्तियों के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू भी किए हैं. जी न्यूज से पहले उन्होंने सुदर्शन चैनल, इनखबर वेबसाइट और फ्रीलांस काम किया है. पिछले साढ़े तीन साल से जी न्यूज के साथ काम कर रही हैं. उन्होंने मास कम्युनिकेशन में सिंघानिया यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में ही पोस्ट ग्रेजुएशन की है. पत्रकारिता के साथ उन्हें कहानियां लिखने का भी काफी शौक है. आप काजोल के साथ kajol.gupta@India.com पर या एक्स और इंस्टाग्राम हैंडल्स पर कनेक्ट कर सकते है. सीधे ईमेल पर इनसे जुड़ सकते हैं.     
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