DNA: प्रदूषण का सवाल: दीपावली पर ही क्यों जागती है पर्यावरण की चिंता?
क्या पर्यावरण की चिंता सिर्फ दीपावली के समय ही सामने आती है? जानिए क्यों सर्दियों के बाकी महीनों में होने वाले प्रदूषण पर चुप्पी साध ली जाती है और क्या है इस मौसमी बहस का सच.
पर्यावरण की सुरक्षा और स्वच्छ हवा में सांस लेना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है. एक स्वस्थ वातावरण में जीने के लिए शुद्ध हवा आवश्यक है, लेकिन हमारे देश में पर्यावरण को लेकर जताई जाने वाली चिंता अक्सर एक खास मौके पर ही देखने को मिलती है. हाल ही में मुंबई में दीपावली के दौरान वायु प्रदूषण और पटाखों को लेकर शुरू हुआ विवाद इसी चुनिंदा सोच को उजागर करता है.
देश के सबसे अमीर नगर निगम, बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) ने वायु प्रदूषण के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए बॉलीवुड हस्तियों और खेल जगत के दिग्गजों को शामिल करते हुए एक वीडियो अभियान तैयार करवाया था. इस अभियान में अभिनेत्री दीया मिर्जा, माधुरी दीक्षित, निशिगंधा वाड और भारतीय क्रिकेटर अजिंक्य रहाणे जैसे जाने-माने चेहरे शामिल थे. वीडियो संदेश में इन हस्तियों ने लोगों से अपील की थी कि वे दीपावली पर शोर न मचाएं, आतिशबाजी न करें और पटाखे न फोड़कर पर्यावरण को सुरक्षित रखें.
वीडियो जारी होते ही गरमाई सियासत
हालांकि, इस वीडियो के जारी होते ही मुंबई की सियासत गरमा गई. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेताओं ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया. बीजेपी नेताओं का कहना था कि मुंबई के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि दीपावली कैसे मनाई जाती है और किसी को भी इस तरह की नसीहत देने की जरूरत नहीं है. बढ़ते राजनीतिक विरोध और विवाद के बाद, बीएमसी ने आनन-फानन में दीया मिर्जा का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा दिया और उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया.
यह मामला अदालत तक पहुंचा. मुंबई हाईकोर्ट की जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की पीठ ने इस पूरे विवाद पर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
धर्मनिरपेक्षता और पर्यावरण: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और पर्यावरण से जुड़े गंभीर मुद्दे को किसी भी तरह का धार्मिक या राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए.
सराहनीय प्रयास: हाईकोर्ट ने माना कि दीया मिर्जा ने कोर्ट के पूर्व निर्देशों के अनुरूप वायु प्रदूषण पर एक अच्छा और सकारात्मक संदेश दिया था.
जल्दबाजी पर फटकार: अदालत ने बीएमसी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि उसे किसी राजनीतिक दबाव या प्रतिक्रिया में आकर जल्दबाजी में कदम उठाने की जरूरत नहीं थी.
एकजुटता की भावना: कोर्ट ने जोर देकर कहा कि स्वास्थ्य, प्रदूषण और पर्यावरण जैसे संवेदनशील विषयों पर गुटबाजी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. मुंबई शहर एकजुटता और अपनेपन से चलता है, इसलिए किसी गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी से सामाजिक संतुलन नहीं बिगड़ना चाहिए.
वीडियो री-अपलोड करने का निर्देश: हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि बीएमसी ने जिन वीडियो संदेशों को हटाया था, उन्हें तुरंत फिर से सोशल मीडिया पर अपलोड किया जाए.
दीया मिर्जा की सफाई और उठा सवाल
सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में शुरू हुए इस विवाद से आहत होकर दीया मिर्जा ने अपनी बात रखी. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस जागरूकता अभियान के लिए उन्होंने बीएमसी से एक भी रुपया फीस नहीं ली थी. यह वीडियो जनहित में रिकॉर्ड किया गया था. उन्होंने सवाल उठाया कि वायु प्रदूषण एक बेहद गंभीर विषय है और इसे कम करने के हर प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए, फिर इसकी आलोचना क्यों की जा रही है?
निःसंदेह, वायु प्रदूषण एक बड़ी चिंता का विषय है और इसके समाधान के लिए कदम उठाए जाने चाहिए. लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या सिर्फ दीपावली के पटाखों से ही मुंबई की हवा जहरीली होती है? क्या पूरे साल मुंबई की हवा पूरी तरह शुद्ध रहती है और दीपावली आते ही प्रदूषण का स्तर अचानक खतरनाक स्तर (रेड लाइन) को पार कर जाता है?
प्रदूषण के असली गुनहगार: आंकड़ों की जुबानी
यदि हम मुंबई में वायु प्रदूषण के वास्तविक कारणों का विश्लेषण करें, तो आंकड़े एक अलग ही कहानी बयां करते हैं. वैज्ञानिक अध्ययनों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, वायु प्रदूषण में पटाखों का कुल योगदान 1 प्रतिशत से भी कम होता है.
मुंबई की हवा को विषैला बनाने में मुख्य रूप से निम्नलिखित कारक जिम्मेदार हैं:
1. सड़क की धूल और कंस्ट्रक्शन (40% - 45%)
मुंबई में हो रहे बेधड़क निर्माण कार्य (कंस्ट्रक्शन) और उड़ने वाली धूल शहर के वायु प्रदूषण में लगभग आधे हिस्से के बराबर यानी 40 से 45 प्रतिशत का योगदान देते हैं.
2. वाहनों का धुआँ (25% - 30%)
शहर की सड़कों पर दिन-रात दौड़ने वाली गाड़ियाँ प्रदूषण बढ़ाने में लगभग एक-तिहाई (25 से 30 प्रतिशत) जिम्मेदार हैं.
3. औद्योगिक क्षेत्र और फैक्ट्रियाँ (15%)
कारखानों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला विषैला धुआँ प्रदूषण का 15 प्रतिशत हिस्सा है. यही कारण है कि चेंबूर, माहुल और ट्रॉम्बे जैसे औद्योगिक बेल्ट लगातार पॉल्यूशन हॉटस्पॉट बने रहते हैं.
4. कचरा और डंपिंग यार्ड (10%)
डंपिंग यार्ड्स में लगने वाली आग और खुले में जलाए जाने वाले कचरे से निकलने वाली जहरीली गैसें हवा में 10 प्रतिशत तक जहर घोलती हैं.
इसके अलावा, सर्दियों के मौसम में हवा की गति धीमी हो जाती है और समुद्री हवा का प्राकृतिक चक्र सुस्त पड़ जाता है. जमीन के करीब मौजूद ठंडी हवा दूषित कणों को ऊपर आसमान में नहीं जाने देती, जिससे शहर के ऊपर धुंध की एक मोटी चादर बन जाती है.
साल भर के प्रदूषण पर खामोशी क्यों?
जो लोग दीपावली आते ही पर्यावरण संरक्षण पर ज्ञान देने लगते हैं, उनकी खामोशी साल के बाकी दिनों में हैरान करने वाली होती है. यदि मुंबई के एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के आंकड़ों पर नजर डालें:
- इस साल जनवरी और फरवरी के महीनों में मुंबई का AQI 170 से 200 के बीच रिकॉर्ड किया गया था.
- मुंबई जैसे तटीय शहर के लिए, जहां औसतन AQI 50 से 100 के बीच रहता है, 200 तक पहुंचना अत्यंत चिंताजनक है.
गौरतलब है कि जनवरी या फरवरी में कोई दीपावली नहीं होती और न ही उस दौरान पटाखे फोड़े जाते हैं. इसके बावजूद उस समय किसी सेलिब्रिटी ने सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर चिंता जाहिर नहीं की. यहां तक कि बीएमसी को भी उस वक्त यह ख्याल नहीं आया कि वह हस्तियों से अपील करवाकर निर्माण कार्यों या गाड़ियों के धुएं पर कोई संदेश जारी करे. बीएमसी को पर्यावरण की याद सिर्फ दीपावली के ऐन वक्त पर ही क्यों आती है?
नए साल और शादियों के पटाखों पर सन्नाटा
पटाखे सिर्फ दीपावली की रात ही नहीं फोड़े जाते. प्रतिबंधों के बावजूद नए साल के जश्न और शादी-ब्याह के कार्यक्रमों में जमकर आतिशबाजी की जाती है.
नए साल के मौकों पर मुंबई के AQI के आंकड़े खुद गवाही देते हैं:
- 2026 नया साल: औसत AQI 175 से 210 तक पहुंच गया.
- 2025 नया साल: औसत AQI 150 से 180 के बीच रहा.
- 2024 नया साल: औसत AQI 220 से 260 दर्ज किया गया.
- 2023 नया साल: औसत AQI 280 से 310 के बेहद खराब स्तर तक पहुंच गया था.
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि नए साल के जश्न में होने वाली आतिशबाजी से भी हवा गंभीर रूप से प्रदूषित होती है. लेकिन क्या कभी नए साल के पटाखों के खिलाफ कोई बड़ा अभियान चलाया गया?
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पर्यावरण के प्रति सजग रहने वाली दीया मिर्जा ने दिसंबर 2022 में नए साल से ठीक पहले एक वीडियो जारी किया था, लेकिन उसमें उन्होंने नए साल पर पटाखे न फोड़ने की अपील करने के बजाय सिर्फ प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्ति पाने का संकल्प लेने की बात कही थी.
सेलेक्टिव एप्रोच और समाधान का सही रास्ता
सवाल हिंदू या मुसलमान का बिल्कुल नहीं है, और न ही इसे धार्मिक चश्मे से देखा जाना चाहिए-जैसा कि कोर्ट ने भी साफ तौर पर कहा है. असल सवाल है प्रदूषण को लेकर अपनाई जाने वाली सेलेक्टिव सोच (चयनात्मक रवैया) का.
जब विवाह समारोहों या नए साल के जश्न में पटाखे जलाए जाते हैं, तब पर्यावरणविदों या सेलिब्रिटीज की तरफ से कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं आती. लेकिन जैसे ही दीपावली का त्यौहार आता है, नसीहतों की बौछार शुरू हो जाती है. जिस कारक का कुल प्रदूषण में योगदान 1 प्रतिशत से भी कम है, उस पर 100 प्रतिशत ध्यान केंद्रित कर देना व्यावहारिक समाधान नहीं है.
यदि बीएमसी और पर्यावरण के प्रति जागरूक हस्तियां सचमुच शहर को स्वच्छ हवा देना चाहती हैं, तो उन्हें निम्नलिखित ठोस कदम उठाने होंगे:
- मुख्य कारणों पर नियंत्रण: प्रदूषण के सबसे बड़े कारणों जैसे - सड़क की धूल, कंस्ट्रक्शन साइट्स, पुराने वाहनों और कारखानों पर सख्त कार्रवाई की जाए.
- निरंतर जागरूकता अभियानों का आयोजन: बीएमसी को सिर्फ त्यौहारों के समय जागने के बजाय साल के हर महीने प्रदूषण नियंत्रण पर जागरूकता संदेश जारी करने चाहिए.
- कंस्ट्रक्शन साइट्स की मॉनिटरिंग: निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल को रोकने के लिए नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए, क्योंकि यह विभाग सीधे बीएमसी के अधिकार क्षेत्र में आता है.
दीपावली जैसे मौकों पर केवल पटाखों को निशाना बनाकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के बजाय, यदि प्रशासन और सेलिब्रिटीज प्रदूषण के 99 प्रतिशत जिम्मेदार कारणों पर ध्यान केंद्रित करें, तभी नागरिकों को सही अर्थों में स्वच्छ और सुरक्षित हवा मिल पाएगी.
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