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भारत में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे वक्त में हो रहा है, जब दुनिया दो बड़े युद्धों से जूझ रही है. यूरोप में रूस और यूक्रेन के बीच लंबे समय से युद्ध जारी है. वहीं एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच भी तनाव युद्ध में बदल चुका है. ब्रिक्स सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान भी शामिल होंगे. ऐसे में ईरान-अमेरिका युद्ध का मुद्दा सम्मेलन के एजेंडे में रहना तय माना जा रहा है.
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि युद्ध का असर सिर्फ संबंधित देशों तक सीमित नहीं है. तेल की कीमत, महंगाई, सप्लाई चेन और वैश्विक विकास पर इसका सीधा असर पड़ रहा है. भारत लगातार युद्ध के बजाय बातचीत और कूटनीति को समाधान का रास्ता बताता रहा है. ब्रिक्स के मंच पर भी भारत इसी नीति को आगे बढ़ा सकता है. खास बात यह है कि ईरान के साथ रूस और चीन भी इस मंच पर मौजूद रहेंगे. ऐसे में युद्ध को लेकर बातचीत का रास्ता निकालने की कोशिश हो सकती है.
पीएम मोदी और पेजेश्कियान के बीच फिर होगी मुलाकात
ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय बातचीत भी होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की हाल के दिनों में यह दूसरी मुलाकात होगी. पिछले महीने SCO समिट के दौरान किर्गिस्तान में दोनों नेताओं की मुलाकात हुई थी. करीब 30 मिनट चली इस बैठक में ईरान-अमेरिका युद्ध का मुद्दा उठा था. पीएम मोदी ने बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान निकालने पर जोर दिया था. भारत ने यह भी स्पष्ट किया था कि वह क्षेत्र में शांति के लिए होने वाली कोशिशों का समर्थन करता रहेगा.
युद्ध का सबसे बड़ा असर अर्थव्यवस्था पर
भारत की चिंता सिर्फ युद्ध के विस्तार को लेकर नहीं है. इसका बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है. इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस के अनुमानों के मुताबिक, अमेरिका-ईरान युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था को करीब 2.2 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है. यह अनुमान युद्ध के शुरुआती दौर का है, इसलिए हालात बिगड़ने पर नुकसान और बढ़ सकता है. IMF ने युद्ध शुरू होने से पहले वैश्विक विकास दर 3.4 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था. बाद में इसे घटाकर करीब 3 फीसदी कर दिया गया. ईरान को भी भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है. अनुमान के मुताबिक उसके नुकसान का आंकड़ा करीब 145 अरब डॉलर है, जो उसकी GDP के लगभग 40 फीसदी के बराबर है. अमेरिका में भी टैक्सपेयर और उपभोक्ताओं पर आर्थिक दबाव बढ़ा है. मूडीज एनालिटिक्स के मुताबिक यह बोझ कम से कम 132 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी युद्ध का असर पड़ा है और करीब 300 अरब डॉलर के नुकसान का अनुमान है.
भारत में त्योहार से पहले बिगड़ा रसोई का बजट
युद्ध का असर अब आम लोगों की जेब पर भी दिखाई देने लगा है. पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का असर धीरे-धीरे रोजमर्रा की दूसरी चीजों तक पहुंच रहा है. तेल की कीमत बढ़ने के बाद ट्रांसपोर्ट महंगा होता है और इसका असर खाद्य पदार्थों से लेकर बाहर खाने तक पर पड़ता है.
सब्जियों की कीमत बढ़ने के पीछे बारिश और सप्लाई से जुड़ी दिक्कतों का भी असर है. लेकिन तेल और गैस की महंगाई ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है.
त्योहारों से पहले महंगाई का खतरा
भारत में त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है. आने वाले हफ्तों में नवरात्र और दिवाली जैसे बड़े त्योहार हैं. ऐसे समय में आमतौर पर बाजार में मांग बढ़ती है. लेकिन इस बार लोगों की चिंता यह है कि बढ़ती कीमतें त्योहार का बजट बिगाड़ सकती हैं. अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है और तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो आने वाले दिनों में महंगाई का दबाव कम होने के बजाय बढ़ सकता है.
100 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल
ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष का नया चरण शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत फिर तेजी से बढ़ी है. ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई और इसके बाद भी तेजी जारी रही. कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गई. यानी एक दिन में ही कच्चे तेल के दाम में करीब 4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. भारत के लिए चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि देश अलग-अलग स्रोतों से अलग-अलग किस्म का कच्चा तेल आयात करता है. औसत खरीद कीमत करीब 109 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने का अनुमान है.
तेल कंपनियों पर बढ़ रहा घाटे का दबाव
तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर पेट्रोलियम कंपनियों पर पड़ रहा है. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर तेल कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 23 रुपये प्रति लीटर का घाटा हो रहा था. LPG सिलेंडर पर भी करीब 200 रुपये का नुकसान बताया गया है. अब जब कच्चा तेल 105 डॉलर के पार पहुंच चुका है, तो कंपनियों पर दबाव और बढ़ गया है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, जैसा कि कुछ अनुमानों में आशंका जताई गई है, तो भारत में भी इसका असर दिख सकता है. ऐसे में त्योहारों से ठीक पहले महंगाई का एक और झटका लगने की आशंका बढ़ जाएगी.
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ईरानी राष्ट्रपति की सुरक्षा भी रहेगी बेहद कड़ी
अमेरिका-ईरान युद्ध और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की भारत यात्रा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कड़ी रहने वाली है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पेजेश्कियान की सुरक्षा में ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC की अंसार-उल-महदी प्रोटेक्शन यूनिट की अहम भूमिका रहती है. विदेश यात्रा के दौरान इस यूनिट के कमांडो राष्ट्रपति के सुरक्षा घेरे में रहते हैं.राष्ट्रपति का विशेष विमान ईरान के हवाई क्षेत्र से निकलते समय लड़ाकू विमानों की सुरक्षा में उड़ान भरता है. सुरक्षा कारणों से विमान के रूट और रडार से जुड़ी जानकारी को भी गोपनीय रखा जाता है.
भारत पहुंचने से पहले पहुंचती है एडवांस टीम
राष्ट्रपति की विदेश यात्रा से पहले ईरान की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों की एडवांस टीम मेजबान देश पहुंचती है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह टीम यात्रा से करीब 7 से 10 दिन पहले पहुंचकर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेती है. होटल, काफिले और दूसरे महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा जांच की जाती है. संचार के लिए विशेष जैमर और एन्क्रिप्टेड सैटेलाइट कम्युनिकेशन जैसी तकनीक का इस्तेमाल भी किया जाता है. ऐसे समय में जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है, पेजेश्कियान की भारत यात्रा सिर्फ कूटनीतिक लिहाज से ही अहम नहीं है, बल्कि सुरक्षा के नजरिए से भी बेहद संवेदनशील मानी जा रही है.
ब्रिक्स में भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता क्या होगी?
भारत के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां हैं. एक तरफ वह युद्ध को बातचीत और कूटनीति के जरिए खत्म कराने की कोशिशों को आगे बढ़ाना चाहता है, दूसरी तरफ उसे अपनी अर्थव्यवस्था और आम लोगों को बढ़ती महंगाई से बचाना है. ईरान के राष्ट्रपति की मौजूदगी, रूस और चीन की भागीदारी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध के बढ़ते असर को देखते हुए ब्रिक्स सम्मेलन इस मुद्दे पर बातचीत का अहम मंच बन सकता है. भारत के लिए संदेश साफ है. युद्ध जितना लंबा चलेगा, तेल और महंगाई का दबाव उतना बढ़ेगा. इसलिए शांति की कोशिश सिर्फ कूटनीतिक जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक जरूरत भी बन चुकी है.