DNA:'नॉटी बॉय' रॉकेट ने रचा इतिहास! हर 5 मिनट में आपदा और 30 मिनट में सीमा की निगरानी करेगी भारत की नई सैटेलाइट
इसरो के 'नॉटी बॉय' रॉकेट ने रचा इतिहास। हर 5 मिनट में प्राकृतिक आपदा और 30 मिनट में सीमा की निगरानी करेगी नई सैटेलाइट. जानिए इस मिशन की ताकत और खासियतें.
मित्रो, पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन..डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार कहा था - भारत ने ये साबित कर दिया है कि कम संसाधनों और बाधाओं के बावजूद हमारा संकल्प और अथक परिश्रम..देश को ब्रह्मांड की ऊंचाइयों तक ले जा सकता है . आज कलाम साहब की इन पंक्तियों को याद करने की वजह है वो बाधा..जिसे पार कर भारत ने अंतरिक्ष में एक और मील का पत्थर स्थापित कर दिया है .
ISRO ने एक और सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजा है . जिस सैटेलाइट को भेजा गया है उसका नाम है EOS-05 और जिस व्हीकल से इसे लॉन्च किया गया है, उसे नाम दिया गया है नॉटी बॉय . ये सैटेलाइट इसरो के सतीश धवन स्पेस सेंटर से की गई है . अनुमान के मुताबिक 9 सितंबर को ये सैटेलाइट तय कक्षा में स्थापित हो जाएगी . अगले 2 महीनों के अंदर सैटेलाइट पूरी तरह से अपना डाटा भेजना शुरु भी कर देगी .
नॉटी बॉय नाम की कहानी
सबसे पहले हम आपको इस सैटेलाइट लॉन्च से जुड़ा दिलचस्प पहलू बताते हैं . जैसा कि हमने आपको बताया कि जिस रॉकेट से सैटेलाइट भेजी गई है उसको नॉटी बॉय नाम दिया गया है . अब इस नाम की कहानी भी सुनिए और समझिए . दरअसल ये रॉकेट कुछ मौकों पर सैटेलाइट लॉन्च नहीं कर पाया है, और कुछ पर कामयाब लॉन्चिंग को भी अंजाम दिया है . इस रॉकेट की पिछली 19 में से 6 लॉन्च विफल हो गई थीं . इसी वजह से इसे नॉटी बॉय का नाम दिया गया . यानी एक ऐसा शरारती बच्चा जो अपनी मर्जी से ही काम करता है . मन आया तो सैटेलाइट लॉन्च की और मन नहीं है तो नहीं की . नॉटी बॉय से जुड़ी इस दिलचस्प कहानी के बाद . अब हम आपको उस सैटेलाइट की विशेषताएं बताने जा रहे हैं . जिसे इसरो के नॉटी बॉय ने अंतरिक्ष में भेजा है .
EOS-05 की खासियत
EOS-05 भारत की पहली ऐसी इमेजिंग सैटेलाइट है जो जियोसिंक्रोनस कक्षा में स्थित होगी . अब बहुत ध्यान से इस आधुनिक तकनीक का मतलब समझिएगा . इमेजिंग का मतलब होता है लगातार धरती के हिस्सों की निगरानी करना . यानी ये सैटेलाइट लगातार भारत के अलग अलग हिस्सों की निगरानी करेगी और निगरानी से जुड़ा डाटा इसरो को भेजेगी . अब आपको जियोसिंक्रोनस कक्षा के मायने भी बताते हैं . आमतौर पर अंतरिक्ष में सैटेलाइट पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थित होती हैं . यानी जब धरती घूमती है तो सैटेलाइट पृथ्वी के अलग अलग हिस्सों के ऊपर होती है . जबकि जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने के साथ साथ घूमती है . यानी जिस हिस्से पर नजर रखनी है . सैटेलाइट लगातार उस हिस्से या क्षेत्र का डाटा जुटाती रहती है .
हर 5 मिनट में डिजास्टर जोंस पर नजर
EOS-05 सैटेलाइट की विशेषताएं आपने समझ लीं . अब इस सैटेलाइट का असली काम समझना भी जरूरी है . ये सैटेलाइट हर 5 मिनट में भारत के डिजास्टर जोंस पर नजर रखेगी . डिजास्टर जोंस वो इलाके होते हैं जहां बाढ़ या तूफान जैसी प्राकृतिक आपदा आने की आशंका ज्यादा होती है . सैटेलाइट से ये पहले ही पता चल जाएगा कि कौन से इलाके में बाढ़ या तूफान आने की संभावना है . इसी जानकारी के आधार पर राहत, रेस्क्यू की पहले से प्लानिंग की जा सकती है .
सैन्य निगरानी में भी इस्तेमाल
हालांकि इसरो ने EOS-05 को सिविलियन यानी नागरिकों के लिए इस्तेमाल होने वाली सैटेलाइट करार दिया है, लेकिन इसका सैन्य इस्तेमाल भी किया जा सकता है . इस सैटेलाइट के जरिए हर 30 मिनट में भारत के किसी भी हिस्से की निगरानी की जा सकती है . इसे कुछ यूं समझिए . अगर भारतीय सीमा के पास किसी किस्म का सैन्य जमावड़ा या हरकत होती है . तो सिर्फ 30 मिनट के अंदर ये सैटेलाइट ऐसी गतिविधि को पकड़ लेगी .
भारत ने बनाया एक और रिकॉर्ड
इस सैटेलाइट की लॉन्च के साथ भारत ने एक और रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है . दुनिया में भारत दूसरा ऐसा देश बन गया है जिसके पास हाई रेसोल्यूशन वाली जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट है .भारत के अलावा सिर्फ चीन के पास ये तकनीक है . अमेरिका भी कुछ इसी किस्म की सैटेलाइट्स का इस्तेमाल करता है, लेकिन अमेरिकी सैटेलाइट सिर्फ सैन्य निगरानी के लिए इस्तेमाल की जाती हैं . इसी वजह से अमेरिका ने कभी अपनी जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट्स का सच नहीं कबूला है .
कायरोजेनिक इंजन के पीछे संघर्ष
इसरो की इस कामयाबी पर पूरे देश को गर्व है, लेकिन इस कामयाबी के पीछे संघर्षों का लंबा इतिहास भी है. नॉटी बॉय नाम के जिस रॉकेट से सैटेलाइट लॉन्च की गई है, उसके अंदर कायरोजेनिक इंजन लगा है. ये एक ऐसा इंजन होता है जो तरल अवस्था वाली गैसों को ईंधन की तरह जलाकर रॉकेट को तेज गति देता है. इस इंजन को बनाना भारत के लिए बेहद मुश्किल था.
भारत ने 70 से 80 के दशक के बीच में कायरोजेनिक इंजन को बनाना शुरु किया था . 90 के दशक में रूस ने सहयोग देना शुरु भी कर दिया था . लेकिन भारत की इस यात्रा को पहला झटका अमेरिका ने दिया था . अमेरिका ने रूस पर प्रतिबंध लगा दिए थे और भारत को इंजन में सहयोग मिलना बंद हो गया था . प्रतिबंधों के बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने देश के अंदर ही इंजन का डिजाइन और ढांचा तैयार किया. इंजन तैयार होने के बाद उसके सैकड़ों परीक्षण भी किए गए. वर्ष 2010 में इस इंजन के प्रेशर सिस्टम में दिक्कतें आने लगी. इसरो ने इस बाधा को भी पार किया और आखिरकार वो इंजन बना, जो आज नॉटी बॉय के जरिए सैटेलाइट को लॉन्च कर रहा है.
'मानव जब जोर लगाता है...'
मित्रो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था - मानव जब जोर लगाता है . पत्थर पानी बन जाता है . दिनकर साहब की ये पंक्तियां..आज इसरो के संघर्ष और कामयाबी को समर्पित करनी चाहिए.