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ब्रिक्स की सफलता से घबराए ट्रंप या ट्रेड डील के लिए दबाव? भारत पर 100% टैरिफ के बिल के पीछे क्या है वजह

Trump Tariffs on India-China: क्या डोनाल्ड भारत के नेतृत्व में दिल्ली में हुए ब्रिक्स के सम्मेलन की सफलता से घबरा गए हैं या फिर वे ट्रेड डील के लिए भारत पर दबाव बनाने की रणनीति पर चल रहे हैं? आखिर भारत पर 100% टैरिफ के बिल के पीछे असल वजह क्या है.

Edited By Devinder Kumar
Published: Sep 17, 2026, 12:12 AM IST | Updated: Sep 17, 2026, 12:18 AM IST
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Trump Move to Impose Tariffs on India: आचार्य चाणक्य का विचार है कि शासक को प्रजा से कर उसी तरह वसूलना चाहिए जैसे मधुमक्खी फूलों से रस लेती है. फूल को नुकसान पहुंचाए बिना और केवल उतना ही जितना आवश्यक हो. कर यानी टैक्स राष्ट्र के अर्थतंत्र की नींव है. इसलिए इसे तय करने का आधार भी वैज्ञानिक होना चाहिए. लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप टैरिफ के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं उसका आधार वैज्ञानिक और नियम आधारित नहीं है. वो मनमाना है. अमेरिका की प्रतिनिधि सभा में चुनिंदा देशों पर 100% टैरिफ लगाने के प्रस्ताव पर वोटिंग हो रही है. इसलिए अब हम टैरिफ के नाम पर अमेरिका की मनमानी का विश्लेषण करेंगे.

अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में आज एक महत्वपूर्ण बिल पर वोटिंग हो रही है. इस बिल में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है. यानी अगर कोई देश रूस से तेल या गैस खरीदता है तो अमेरिका उस देश से आयात किए जानेवाले सामान पर कीमत के बराबर टैक्स लगाएगा. अर्थात 100 रुपये के सामान पर 100 रुपए टैक्स लगेगा.

फिर टैरिफ को हथियार बनाने जा रहे ट्रंप

बिल अमेरिका की प्रतिनिधि सभा में पास हुआ तो राष्ट्रपति ट्रंप को अधिकार मिल जाएगा कि वो रूस से तेल और गैस आयात करनेवाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा सकते हैं. बिल में राष्ट्रपति को ये अधिकार दिया गया है कि वो संबंधित देशों पर कितना टैक्स लगाते हैं. ये कानून लागू होने के 5 साल बाद स्वतः समाप्त हो जाएगा.

7 अगस्त 2026 के ये बिल अमेरिकी सीनेट में पास हो चुका है. सीनेट में इसके पक्ष में 86 और विरोध में 11 वोट पड़े थे. प्रतिनिधि सभा में भी बिल को लेकर एक राउंड वोटिंग हो चुकी है. सदन में इसे आगे बढाने को लेकर हुई वोटिंग में पक्ष में 214 और विरोध में 211 वोट पड़े थे. यानी ये बिल प्रतिनिधि सभा में पास होने की उम्मीद है.

बिल में पहले किसी देश का नाम नहीं था. लेकिन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में एक संशोधन लाया गया. संशोधन में चीन, तुर्किए जैसे देशों के साथ भारत का नाम भी शामिल किया गया. यानी भारत पर 100% टैरिफ लगाने की मंशा जताई गई है.

ब्रिक्स की सफलता से उखड़े हुए हैं ट्रंप

अब 100 टैरिफ वाले बिल की टाइमिंग पर ध्यान दीजिए. दिल्ली में जैसे की ब्रिक्स की सफल बैठक का समापन होता है, दुनिया में इस बैठक और भारत के नेतृत्व की गूंज होती है, अमेरिका में भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले बिल पर चर्चा शुरू हो जाती. इसलिए ये सवाल उठ रहा है कि क्या भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स की एकजुटता और ब्रिक्स समिट की कामयाबी से ट्रंप डर गए हैं. क्या ट्रंप ब्रिक्स में भारत की केंद्रीय भूमिका को लेकर घबराहट में हैं. इसे समझने के लिए ब्रिक्स समिट में हुए कुछ फैसलों को समझना होगा.

बैठक में डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए आपसी व्यापार और निवेश में अपनी करंसी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया. इसके लिए क्रॉस-पेमेंट सिस्टम और पेमेंट टास्क फोर्स को मजबूत करने पर सहमति बनी. समझिए इससे दुनिया में डॉलर की बादशाहत को चुनौती मिलेगी.

न्यू डेवलपमेंट बैंक का विस्तार करने और इसके जरिए सदस्य देशों की करंसी में कर्ज देने पर सहमति बनी. इससे अमेरिकी वर्चस्व वाले फाइनेंशियल संस्थानों जैसे IMF और विश्व बैंक की मनमानी घटेगी साथ ही अमेरिका के पेमेंट सिस्टम स्विफ्ट पर भी निर्भरता कम होगी.

ब्रिक्स देशों ने संरक्षणवाद और एकतरफा टैरिफ का विरोध किया. ट्रंप टैरिफ के नाम पर जो कर ये उसका संगठित विरोध है. ब्रिक्स के मंच से राष्ट्रपति पुतिन ने स्पष्ट शब्दों में ये भी कहा कि जो देश प्रतिबंध और टैरिफ लगाते हैं वो पिछड गए हैं.

दुनिया में भारत की बढ़ती भूमिका से लग रहा डर

ये सबकुछ भारत के नेतृत्व में दिल्ली में हुआ. ब्रिक्स का हर निर्णय अमेरिका को अपने प्रभुत्व पर हमला और चुनौती लगा. ध्यान रखिए इन फैसलों के केंद्र में भारत था. ये वर्ल्ड ऑर्डर में भारत की बढ़ती भूमिका का प्रमाण है. यही बात ट्रंप को डरा रही है. इसलिए रूस से तेल आयात के बहाने 100 प्रतिशत टैरिफ वाले बिल को आगे बढ़ाया गया है.

वैसे ये पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने भारत के खिलाफ टैरिफ को हथियार बनाया है. अगस्त 2025 में ट्रंप ने भारत पर कुल मिलाकर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया था. बहाना यही था. भारत रूस से तेल खरीदता है. लेकिन बाद में ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत तक किया. हालांकि अमेरिकी कोर्ट के फैसले के बाद फिलहाल 10 प्रतिशत टैरिफ ही लागू है. सवाल ये है कि ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ क्यों घटाया क्योंकि टैरिफ से भारत पर कम और अमेरिका पर ज्यादा असर पड़ रहा था.

अमेरिका में जितनी जेनरिक दवाएं इस्तेमाल होती हैं उसका 50% भारत से आयात होता है. अमेरिका अपने इस्तेमाल का 99 प्रतिशत कैस्टर ऑयल यानी अरंडी का तेल भारत से आयात करता है. अमेरिका 94 प्रतिशत पॉलिश्ड हीरे भारत से खरीदता है. कई कैटेगरी में 85 प्रतिशत इंजन समेत मोटर वाहन अमेरिका भारत से आयात करता है.

भारत पर टैरिफ लगा तो अमेरिकन होंगे परेशान

लिस्ट लंबी है, हमने कुछ ही वस्तुओं की जानकारी आपको दी है. अगर 100 प्रतिशत टैरिफ लगता है तो अमेरिका में भारतीय प्रोडक्ट महंगे होंगे, जिससे महंगाई बढ़ेगी. ईरान वॉर और तेल संकट के कारण आम अमेरिकी पहले ही महंगाई की मार झेल रहे हैं. अगर ट्रंप भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाते हैं तो इससे भारत की कम और अमेरिका की परेशानी ज्यादा बढ़ेगी.

आपके मन में ये सवाल जरूर होगा कि अगर ट्रंप 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला कर लेते हैं तो उससे भारत पर क्या और कितना असर होगा. अमेरिका के साथ हम सालाना करीब साढ़े 14 लाख करोड़ रुपए का व्यापार करते है तो 100 प्रतिशत टैरिफ से शुरू में हमें झटका लगेगा ये तय है. लेकिन इस झटके से उबरने के लिए भारत ने पहले ही तैयारी की है, अपने प्रोडक्ट्स के लिए नए बाजार की तलाश की है.

भारत ने अप्रैल 2026 में न्यूजीलैंड के साथ फ्री ट्रेड डील की. इस समझौते पर न्यूजीलैंड की संसद में आज ही मुहर लगी है. ये समझौता अक्टूबर 2026 में लागू हो जाएगा. दिसंबर 2025 में ओमान के साथ ट्रेड डील हुई थी. ये समझौता इसी साल जून के महीने से लागू हो गया. जुलाई 2025 में ब्रिटेन के साथ ट्रेड डील हुई थी. ये समझौता इसी साल जुलाई से लागू हो चुका है.

यूरोपीय यूनियन के साथ जनवरी 2026 में ऐतिहासिक ट्रेड डील को लेकर फ्रेमवर्क जारी हुआ. इसे मदर ऑफ आल डील्स कहा गया. क्योंकि यूरोपीय यूनियन और भारत मिलकर एक चौथाई ग्लोबल GDP को प्रतिनिधित्व करते हैं. यानी भारतीय प्रोडक्ट्स को यूरोप में बड़ा बाजार मिल गया है.

भारत पर ट्रंप टैरिफ का ज्यादा असर क्यों नहीं पड़ेगा?

यानी भारत ने ट्रंप की टैरिफ वाली मनमानी से बचने के लिए पहले ही रास्ता तैयार किया है. अपने सामान के लिए नए बाजार की तलाश की है. इसलिए तात्काल अमेरिकी टैरिफ भारत को नुकसान पहुंचा सकता है. लेकिन लंबी अवधि में बाजार विविधीकरण से नुकसान बेहद कम हो जाएगा. हां अमेरिका को नुकसान जरूर होगा. क्योंकि भारत दवाओं जैसे जरूरी सामान अमेरिका को निर्यात करता है.

ट्रंप भी ये बात अच्छे से जानते हैं. इसलिए पहले उन्होंने भारत को टैरिफ से डराने की कोशिश की थी. फिर टैरिफ हटाया और ट्रेड डील की बात आगे बढ़ाई. ट्रंप चाहते हैं कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील हो  ताकि अमेरिका को जरूरी सामान की आपूर्ति सुनिश्चित हो और अमेरिकी कंपनियों को भारत के बाजार में और जगह मिले. भारत अमेरिका के ट्रेड डील के लिए फरवरी 2025 के बाद कई राउंड की बैठक हो चुकी है.

13 फ़रवरी 2025 को राष्ट्रपति ट्रंप और पीएम मोदी ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते की वार्ता औपचारिक रूप से शुरुआत की थी. 2 फ़रवरी 2026 को ट्रंप और पीएम मोदी फ़ोन कॉल के बाद ट्रंप ने डील की घोषणा की थी. फरवरी में अंतरिम समझौते का फ्रेमवर्क तय हुआ था.

लेकिन डील फाइन नहीं हो पाई क्योंकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ को अवैध ठहरा दिया. इससे डील के लिए जो कानूनी फ्रेमवर्क तय किया गया वो प्रभावित हुआ. दूसरी तरफ भारत ने भी ट्रेड डील के लिए अपने व्यापारिक प्रतिस्पर्धियों से बेहतर टैरिफ के लिए दबाव बनाया.

भारत पर दबाव बढ़ाकर क्या चाहते हैं ट्रंप?

सितंबर के आखिरी में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल अमेरिका में G20 ट्रेड मिनिस्टीरियल की बैठक में जाएंगे. इस दौरान ट्रेड डील पर बात आगे बढ़ सकती है. यानी एक तरफ ट्रंप भारत के साथ ट्रेड डील करना चाहते हैं. दूसरी तरफ अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का बिल पेश किया गया है. ये भी तब जब ट्रेड डील पर चर्चा आगे बढ़नेवाली है. समझिए ये अमेरिका की दवाब वाली रणनीति है. ट्रंप प्रशासन दवाब बनाकर ट्रेड डील में अपने लिए कई छूट चाहता है. इसके लिए बहाना रूस से तेल आयात को बनाया जा रहा है.

ईरान युद्ध और होर्मुज संकट को देखते हुए भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सप्लाई के वैकल्पिक रूट्स तलाशे हैं. 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी देने वाला अमेरिका आज भारत का सबसे बड़ा LPG सप्लायर है. भारत के LPG आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से ज्यादा है. जैसे भारत अमेरिका से LPG आयात कर रहा है वैसे ही रूस से क्रूड ऑयल आयात कर रहा है. ये सिर्फ भारत के हित में ही नहीं है. पूरी दुनिया के हित में भी है. कैसे उसे समझते हैं.

भारत रूस से रोजाना करीब 21 लाख बैरल क्रूड आयात कर रहा है. अगस्त के महीने में भारत ने जितना कच्चा तेल आयात किया उसमें रूस से आए कच्चे तेल की हिस्सेदारी करीब 45 प्रतिशत तक रहा.

कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई में रूस की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत है. अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर दे तो क्या होगा. ये महत्वपूर्ण सवाल है क्योंकि ईरान विवाद के कारण तेल सप्लाई के विकल्प बहुत सीमित रह गए हैं. समझिए अगर दुनिया के देश तेल रूस से तेल खरीदना बंद कर दें तो कच्चा तेल 10 प्रतिशत तक महंगा हो जाएगा.

भारत ने रूस से तेल नहीं खरीदा तो बढ़ जाएगी महंगाई

भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है. भारत अगर रूस से तेल खरीदना बंद कर दे तो क्रूड ऑयल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. रूस से तेल खरीद बंद करने पर भारत के लिए क्रूड प्रति बैरल 4 से 8 तक महंगा हो जाएगा.

यानी रूस भारत रूस से तेल नहीं खरीदता तो क्रूड महंगा होगा इससे पूरी दुनिया के लिए तेल महंगा होगा. भारत को भी महंगा क्रूड खरीदना होगा. ये सबके लिए नुकसानदेह है. इसलिए भारत ने साफ-साफ कहा है कि एनर्जी पर हम राष्ट्रहित में फैसला करेंगे.

भारत पहले भी कह चुका है अपनी उर्जा जरूरत को पूरा करने के हम स्वतंत्र फैसला करेंगे. ट्रंप ये बात जानते हैं. फिर 100 प्रतिशत टैरिफ वाला बिल क्यों. समझिए ब्रिक्स के मंच से भारत की ताकत को पूरी दुनिया ने देखा. अमेरिका इसे अपने प्रभुत्व को चुनौती के तौर पर देख रहा है. इसलिए टैरिफ का डर दिखाया जा रहा है. हालांकि टैरिफ वाले इस दिखावटी डर के पीछे भी अमेरिका का हित है. इसके जरिए ट्रंप भारत से ट्रेड डील में अपने लिए रियायत चाहते हैं.
 

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अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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