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भारत में विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त का विरोध कर रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त सत्ताधारी दल को चुनावी लाभ पहुंचा रहे हैं. दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. मंगलवार को भी कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता और कार्यकर्ता जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे, जबकि पटना में वामपंथी छात्र संगठन आइसा के कार्यकर्ताओं ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन किया.
इस बीच, राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों के नेताओं को चाय पर चर्चा के लिए अपने आवास पर बुलाया. बैठक में आंदोलन को लेकर आगे की रणनीति पर चर्चा हुई. सवाल यह है कि विपक्ष का प्रदर्शन कब तक जारी रहेगा, आगे की रणनीति क्या होगी और सरकार का इस पूरे मामले पर क्या रुख है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका मंगलवार को समर्थकों के साथ जंतर-मंतर पहुंचे. यहां उन्होंने नारेबाजी की, जिसके बाद पुलिस ने सभी को हिरासत में ले लिया. सरकार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगहों की सूची से हटा दिया है. इसके बावजूद CJP के नेता और कार्यकर्ता वहां प्रदर्शन करने पहुंचे.
राहुल ने चाय पर बुलाया.. कौन-कौन आया ? प्रोटेस्ट कब तक चलेगा.. रास्ता कैसे निकलेगा? राहुल गांधी की 'चाय पर चर्चा' का विश्लेषण #DNA #DNAWithRahulSinha #RahulGandhi #INDIABloc #GyaneshKumar @rahulsinhatv https://t.co/cUqj799PhR
— Zee News (@ZeeNews) October 13, 2026
जब दिल्ली में जंतर-मंतर पर CJP के नेता प्रदर्शन कर रहे थे, उसी समय करीब 1,000 किलोमीटर दूर पटना में वामपंथी छात्र संगठन आइसा के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे. उनका प्रदर्शन भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ था. इस बार CJP और आइसा ने अलग-अलग जगहों पर प्रदर्शन किया. जंतर-मंतर पर CJP के नेता अकेले थे और NEET आंदोलन के समय से उनके साथ रहे आइसा के कार्यकर्ता उनके साथ नहीं थे. यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 24 घंटे पहले इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन में आइसा की नेहा बोरा शामिल हुई थीं. वह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ प्रदर्शन की अग्रिम पंक्ति में नजर आई थीं. मंगलवार को नेहा बोरा राहुल गांधी के आवास पर आयोजित चाय पार्टी में भी मौजूद थीं और उन्हें वहां अपनी बात रखने का मौका मिला.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले 12 दिनों से विपक्ष लगातार प्रदर्शन कर रहा है. राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के शीर्ष नेताओं ने 6 अक्टूबर से सड़कों पर उतरना शुरू किया था. इसके बाद 7, 8, 9 और 12 अक्टूबर को भी इंडिया गठबंधन के नेताओं ने प्रदर्शन किया. वहीं, 10 अक्टूबर को CJP ने प्रदर्शन का ऐलान किया था.
लगातार हो रहे इन प्रदर्शनों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आंदोलन कब तक जारी रहेगा. मौजूदा हालात से संकेत मिल रहे हैं कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की संभावना फिलहाल बेहद कम है. मुख्य चुनाव आयुक्त रोजाना की तरह अपने दफ्तर आ रहे हैं और कामकाज संभाल रहे हैं. सरकार भी अपने रुख में नरमी के संकेत नहीं दे रही है. दूसरी ओर, विपक्ष जिस आक्रामकता के साथ लगातार प्रदर्शन कर रहा है, उसके लिए अब पीछे हटना आसान नहीं होगा. ऐसे में सवाल उठता है कि आगे का रास्ता क्या होगा. क्या विपक्ष का प्रदर्शन इसी तरह जारी रहेगा और क्या इस आंदोलन के बीच ही चुनाव भी होते रहेंगे.
अगले साल यानी 2027 में सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में फरवरी-मार्च के दौरान चुनाव होने की संभावना है. इसका मतलब है कि करीब पांच महीने बाद उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में मतदान की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. विपक्ष का कहना है कि वह SIR और वोट चोरी के मुद्दे को छोड़ने वाला नहीं है.
विपक्ष अब सरकार को दो मोर्चों पर घेरने की तैयारी कर रहा है. इसी रणनीति पर चर्चा के लिए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार को विपक्षी सांसदों को अपने आवास पर चाय पार्टी के लिए बुलाया. राहुल गांधी के आवास पर हुई इस बैठक में कांग्रेस के अलावा राष्ट्रीय जनता दल (RJD), झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM), समाजवादी पार्टी (SP), ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC), शिवसेना का उद्धव ठाकरे गुट, CPI(M), CPI और CPI(ML) समेत 16 दलों के नेता शामिल हुए. बैठक में विपक्षी नेताओं ने करीब एक घंटे तक आंदोलन को लेकर आगे की रणनीति पर चर्चा की. इसके बाद सभी नेता एक साथ मीडिया के सामने आए. विपक्षी दलों के नेताओं का एक साथ आना यह संदेश देने की कोशिश थी कि इंडिया गठबंधन एकजुट है और सभी सहयोगी दलों की राय का सम्मान किया जा रहा है.
चाय पार्टी के बाद सभी दलों के नेताओं ने अपनी-अपनी बात रखी. कांग्रेस नेताओं ने कहा कि लोकतंत्र को बचाने के लिए एकजुट होकर लड़ाई जारी रहेगी. CPI ने सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की, जबकि RJD ने आरोप लगाया कि लोकतंत्र को कुचलने की साजिश हो रही है. ममता बनर्जी की पार्टी TMC ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार के रहते निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते. सुप्रिया सुले ने SIR को संविधान की हत्या बताया. वहीं, समाजवादी पार्टी ने दोहराया कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और वोट चोरी के मुद्दे पर विपक्षी एकजुटता अटूट है.
सभी विपक्षी नेताओं ने एकजुट होकर आगे भी प्रदर्शन जारी रखने की घोषणा की. इस तरह विपक्ष ने स्पष्ट कर दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आंदोलन के साथ-साथ SIR और वोट चोरी के आरोपों को भी राजनीतिक मुद्दा बनाए रखा जाएगा.
विपक्ष के आरोपों के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी सरकार का रुख स्पष्ट किया. उन्होंने विपक्ष के आरोपों का बिंदुवार जवाब दिया और खास तौर पर गुजरात निकाय चुनाव के नतीजों का जिक्र किया. अमित शाह ने कहा कि गुजरात में निकाय चुनाव बैलेट पेपर से हुए, इसके बावजूद कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस को बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को SIR का नाम देकर खारिज करने के बजाय आत्ममंथन करना चाहिए. अमित शाह ने हाल में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में हुए उपचुनावों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इन उपचुनावों में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई. असम की नौगांव लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी बीजेपी ने कांग्रेस को हरा दिया. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस कई दशकों से सत्ता से बाहर है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर सरकार के रुख में नरमी के संकेत नहीं दिख रहे हैं. अब यह मामला संवैधानिक के साथ-साथ राजनीतिक लड़ाई का रूप ले चुका है. इसी बीच इंडिया गठबंधन ने कानूनी मोर्चे पर भी कदम बढ़ाया है. विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है.
10 विपक्षी दलों के 11 नेताओं की ओर से 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई. इस याचिका में चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को पक्षकार बनाया गया है.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने याचिका में 14 खामियां बताई हैं. इन त्रुटियों को ठीक करने के लिए विपक्षी नेताओं को आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी.
1. केस की लिस्टिंग के फॉर्म में नाम गलत
केस की लिस्टिंग के लिए भरे गए फॉर्म में प्रतिवादी यानी याचिका दायर करने वालों का नाम गलत दर्ज था.
2. नौ याचिकाकर्ताओं ने वकालतनामे पर हस्ताक्षर नहीं किए
याचिका में शामिल नौ याचिकाकर्ताओं ने वकालतनामे पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. इसका मतलब है कि उन्होंने वकीलों को अपनी ओर से मुकदमा लड़ने का औपचारिक अधिकार नहीं दिया था.
3. मल्लिकार्जुन खरगे के पहचान पत्र की कॉपी धुंधली
याचिकाकर्ताओं की पहचान सत्यापित करने के लिए पहचान पत्र का प्रमाण देना जरूरी होता है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पहचान पत्र की जो फोटोकॉपी लगाई गई थी, वह धुंधली थी. सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने इसकी नई फोटोकॉपी जमा कराने को कहा है.
4. दस्तावेजों के पन्ने गायब और कुछ पन्नों का आकार छोटा
याचिका के साथ लगाए गए दस्तावेजों के कुछ पन्ने गायब थे. वहीं, कुछ पन्नों का आकार बहुत छोटा था. कुछ महत्वपूर्ण मूल दस्तावेजों की रंगीन प्रतियां भी जमा नहीं की गई थीं. कानूनी प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट में दस्तावेज जमा करने के लिए निर्धारित फॉर्मेट, फॉन्ट साइज और रंगों से जुड़े नियमों का पालन करना होता है.
5. कोर्ट फीस में 220 रुपये की कमी
याचिका दाखिल करने के लिए आवश्यक कोर्ट फीस भी पूरी नहीं चुकाई गई थी. रजिस्ट्री ने याचिका में 220 रुपये की कोर्ट फीस कम पाई.
6. चुनाव आयुक्तों को व्यक्तिगत रूप से पक्षकार बनाने पर सवाल
याचिका में चुनाव आयोग के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य दो चुनाव आयुक्तों को व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी बनाया गया था. सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने इस पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका में चुनाव आयुक्तों को व्यक्तिगत रूप से क्यों शामिल किया गया है. विपक्षी नेताओं का कहना है कि याचिका में बताई गई इन गलतियों को जल्द ठीक कर लिया जाएगा.