DNA: AI की एक चूक और टल गया तीसरा विश्वयुद्ध: चीन के जहाज पर अमेरिकी एक्शन से कैसे बची दुनिया?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के एक गलत इनपुट और तत्काल मानवीय हस्तक्षेप ने दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की दहलीज से कैसे बचाया? जानिए चीनी जहाज पर अमेरिकी स्ट्राइक की योजना और उस तकनीकी चूक की पूरी इनसाइड स्टोरी.
ट्रंप को AI तस्वीरें बहुत पसंद है. वो अक्सर अपनी तस्वीरों के साथ AI प्रयोग करते रहते हैं. लेकिन यही AI..उनके हाथों परमाणु युद्ध की शुरुआत कराने वाला था. जी, AI को लेकर अमेरिका में ही ये बड़ा खुलासा हुआ है. ये खुलासा बताता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एक गलती की वजह से दुनिया की दो बड़ी शक्तियों के बीच युद्ध शुरु हो सकता था. AI से जुड़े इस खतरे को समझने के लिए आपको अमेरिका से आई एक न्यूज़ रिपोर्ट बेहद गौर से देखनी और समझनी चाहिए .
इस न्यूज रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी सेना ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए चीन के एक जहाज का आकलन किया था . ये आकलन ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध के दौरान किया गया था . AI से किए गए इस एनालिसिस के शुरुआती हिस्से ने बताया था, कि चीन से आ रहे एक जहाज में न्यूक्लियर हथियारों को बनाने के लिए जरूरी उपकरण मौजूद हैं . AI के आकलन ने ये भी बताया था कि चीन का ये जहाज ईरान की तरफ जा रहा है.
ईरान को चीन के जहाज से हथियारों की सप्लाई!
ईरान को परमाणु हथियारों से जुड़ी सामग्री की सप्लाई, और वो भी चीन के जहाज से . इस अलर्ट ने पूरी अमेरिकी सेना को अलर्ट मोड में डाल दिया था . इस जहाज को रोकने के लिए अमेरिकी वायुसेना के जेट उड़ने के लिए तैयार थे . अमेरिकी स्पेशल फोर्स यानी अमेरिकी मरींस के दस्तों ने भी जहाज पर उतरने के लिए तैयारी और तैनाती कर दी थी . यानी अमेरिकी सेना ने चीन के जहाज को कब्जा करने का पूरा प्लान बना लिया था.
तो दुनिया एक बड़े जंग की आग में फंस जाती
आप बस कल्पना भर कीजिए...अगर अमेरिकी सेना चीन के जहाज को अपने कब्जे में ले लेती तो कितना बड़ा तनाव पैदा होता . चीन और अमेरिका पारंपरिक प्रतिद्वंदी हैं . ताइवान से लेकर इंडो पैसेफिक के समुद्री क्षेत्र पर दबदबे के लिए दोनों ही देश सालों से जोर लगा रहे हैं . अगर चीन से आते जहाज को कब्जा लिया जाता, तो यकीनन चीन भी सैन्य कार्रवाई करता और दोनों देश एक बड़े युद्ध के मुहाने पर आ जाते या शायद एक दूसरे पर हमला भी कर देते . दो शक्तिशाली परमाणु ताकतों का आमने-सामने आना ना सिर्फ चीन और अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया को बड़ी जंग में झोंक सकता था. इस हाई वोल्टेज सिचुएशन के बीच अमेरिकी नेवी के वरिष्ठ अधिकारियों ने एक बार फिर AI से तैयार किए गए आकलन की जांच की, और दोबारा जांच करने में एक बड़ी गलती सामने आई . एक ऐसी गलती जो अमेरिका को शायद तीसरे विश्वयुद्ध का हिस्सा बनने पर मजबूर कर देती.
वरिष्ठ अधिकारियों की जांच में सामने आया कि आकलन तैयार करने वाली सैन्य यूनिट ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एक चैटबॉट का इस्तेमाल किया था . दरअसल चैटबॉट एक कंप्यूटर प्रोग्राम होता है जो डिजिटल सहायक की तरह कंप्यूटर का इस्तेमाल करने वाले शख्स की मदद करता है . अमेरिकी सेना के जवानों ने चैटबॉट को अमेरिकी इंटेलिजेंस के डाटाबेस से जुड़ी जानकारी दी थी . इस जानकारी और चीन के जहाज पर मौजूद कथित कार्गो यानी सामान का आकलन करके AI ने उसे परमाणु हथियारों के उपकरण बता दिया था, लेकिन दोबारा जांच में ये सामने आया कि चैटबॉट का आकलन गलत था . यानी चीन के जहाज पर परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी कोई सामग्री मौजूद नहीं थी.
अर्थशास्त्र में क्यों महत्वपूर्ण है आचार्य चाणक्य का वो सिद्धांत
अमेरिका जहाज पर कब्जा करने के लिए पूरी तरह तैयार था. अगर ऐन मौके पर कुछ वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी खुफिया आकलन की जांच नहीं करते तो सैन्य कार्रवाई घातक साबित हो सकती थी. प्राचीन भारत के महान विद्वान आचार्य चाणक्य भी गुप्त सूचना यानी इंटेलिजेंस को बहुत महत्व देते थे, लेकिन साथ ही साथ आचार्य चाणक्य जानकारी के सही होने पर भी जोर देते थे. अर्थशास्त्र में चाणक्य ने त्रिकोणीय सत्यापन का सिद्धांत दिया है . ये सिद्धांत कहता है - किसी भी गुप्तचर की सूचना पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं किया जा सकता . जब तक कम से कम तीन गुप्तचर एक ही किस्म की जानकारी नहीं दे, तब तक उस जानकारी को सच नहीं मानना चाहिए .
पिछले कुछ वक्त से अमेरिकी इंटेलिजेंस यानी खुफिया तंत्र काफी हद तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित हो गया है . वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को कथित तौर पर गिरफ्तार करने के लिए भी अमेरिकी सेना ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लिया था . मादुरो के मामले में AI का आकलन सटीक बैठा था, लेकिन इस बार AI ने अमेरिकी सूचना तंत्र को ही धोखा दे दिया . ये पहली बार नही है जब अमेरिकी खुफिया तंत्र ने मूलभूत सिद्धांतों को ताक पर रखकर जानकारी जुटाई हो...और जंग के मुहाने पर पहुंच गए हों . इससे पहले भी अमेरिकी खुफिया तंत्र ऐसी बड़ी गलती कर चुका है.
जब अमेरिकी कंप्यूटरों पर अचानक दिखीं थी हजारों मिसाइलें
इतिहास में इस घटना को नोराड ट्रेनिंग ग्लिच का नाम दिया गया है. वर्ष 1979 में अमेरिकी सेना के कंप्यूटरों पर अचानक हजारों मिसाइलों के निशान दिखने लगे थे . कंप्यूटर के स्क्रीन पर आ रही जानकारी बता रही थी कि तत्कालीन सोवियत संघ ने अमेरिका पर हजारों मिसाइल दाग दी हैं . जानकारी का पता चलते ही अमेरिकी एयरफोर्स और नेवी हाई अलर्ट पर चली गई थी . अमेरिकी एयरफोर्स के सैकड़ों फाइटर जेट हवा में उड़ने लगे थे, लेकिन इसी बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने सोवियत संघ के प्रतिनिधियों से बात भी थी . सोवियत प्रतिनिधियों ने मिसाइल दागने की जानकारी को सरासर गलत करार दिया था . जब जांच की गई तो पता चला कि एक अमेरिकी कंप्यूटर ऑपरेटर ने ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले वीडियो को सभी कंप्यूटर पर अपलोड कर दिया था, जिसकी वजह से अमेरिकी सेना को लगा कि असली हमला होने वाला है . इतिहास का ये अध्याय बताता है कि तकनीक आधारित खुफिया जानकारी को लेकर अमेरिकी कार्रवाई दागनुमा रही है.
अमेरिकी खुफिया जानकारी गलत साबित हुई
अमेरिका की खुफिया जानकारी तो गलत साबित हुई, लेकिन अमेरिका के खिलाफ एक कथित खुफिया ऑपरेशन कामयाब हो गया है. अमेरिकी मीडिया के मुताबिक पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट F-35 के संवेदनशील हिस्से गायब हो गए हैं . इन उपकरणों में पायलट को ढकने वाला ढांचा यानी कैनोपी भी शामिल है . अमेरिकी मीडिया के मुताबिक इन उपकरणों को मरम्मत के लिए मिडिल ईस्ट से अमेरिका लाया जा रहा था, लेकिन हॉन्गकॉन्ग में जब अमेरिकी जहाज रुके तो F-35 के कुछ हिस्से गायब हो गए . अमेरिकी वायुसेना ने इस घटना पर जांच बैठा दी है और शक जाहिर किया जा रहा है कि F-35 के ये हिस्से तस्करी के जरिए चीन भेजे गए हैं.