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Stock Market Crash: शेयर बाजार में निवेशकों का धन-संहार चल रहा है कहना तो गलत नहीं होगा. 14 करोड़ रिटेल निवेशकों का मेहनत से कमाया पैसा मिट्टी में मिल रहा है और वो चुपचाप दर्शक की तरह देखने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे.
आज बाजार ने गिरावट का वो रिकॉर्ड बनाया जो पिछले 25 साल में कभी नहीं हुआ था. सवाल ये है कि शेयर बाजार की गिरावट कहां जाकर थमेगी और सवाल ये भी है कि क्या सिर्फ अमेरिका की नीतियों की वजह से बाजार डूब रहा है या इसकी कोई और वजह है. अक्टूबर का पहला दिन भी बाजार के लिए नुकसान वाला रहा. IT को छोड़ दें तो सभी बड़े सेक्टर लाल निशान में बंद हुए.
सेंसेक्स 571 प्वाइंट की गिरावट के साथ 71,910 पर बंद हुआ. एक वक्त तो सेंसेक्स 1,000 प्वाइंट से ज्यादा गिर गया था. लेकिन कारोबार के आखिरी घंटे में थोड़ा सुधार आया. इसी तरह निफ्टी 199 प्वाइंट की गिरावट के साथ 22,422 पर बंद हुआ. बाजार में मचे इस हाहाकार के कारण निवेशकों के करीब 4 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए.
भारत का शेयर बाजार.. इतना क्यों गिर रहा है? 8 हफ्ते से गिरावट.. टूटा 25 साल पुराना रिकॉर्ड #DNA #DNAWithRahulSinha #India #ShareMarket @rahulsinhatv pic.twitter.com/CkqppBhGKx
— Zee News (@ZeeNews) October 1, 2026
2 दिन पहले बाजार 70,000 की तरफ बढ़ रहा है. आम बोलचाल में कहा जाता है कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था का बैरोमीटर है यानी बाजार अर्थव्यवस्था की सेहत के बारे में बताता है. शेयर बाजार की हलचल से पता चलता है कि इकोनॉमी आगे बढ़ रही है या नहीं. लेकिन, 2026 अभी तक शेयर बाजार के निवेशकों के लिए मनहूस साल साबित हुआ है. जनवरी की शुरुआत में ये जहां था. वहां से काफी नीचे पहुंच गया है. साल के पहले दिन यानी 1 जनवरी को सेंसेक्स 85,189 पर बंद हुआ था और आज ये 72 हजार के नीचे पहुंच गया. इस तरह सेंसेक्स में 13,000 प्वाइंट से अधिक की गिरावट आई है.
2026 में सेंसेक्स अब तक 16% के करीब गिर गया है. इसका ये अर्थ है कि देश की सबसे बड़ी 30 कंपनियों के वैल्यूएशन में जोरदार गिरावट आई है. अगर आपने इन कंपनियों में 1 लाख रुपये लगाए थे तो उसकी वैल्यू अब 84,000 रुपये ही रह गई है. इसी तरह निफ्टी साल के पहले दिन 26,147 पर बंद हुआ था और आज ये 22,422 पर बंद हुआ. 3,700 प्वाइंट से ज्यादा की गिरावट के साथ इसमें 14% से अधिक गिरावट आई है.
सिर्फ पिछले 1 महीने के दौरान सेंसेक्स में 5 हजार प्वाइंट से ज्यादा की गिरावट आई है. शेयर बाजार में गिरावट का ये लगातार आठवां हफ्ता है. पिछले 8 हफ्ते से निफ्टी और सेंसेक्स में लगातार गिरावट आ रही है. ये पिछले 25 साल में यानी 2001 के बाद सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट है. 2008 की वैश्विक मंदी हो या 2020 का कोविड काल, उस समय भी लगातार 7 हफ्ते तक ही गिरावट देखी गई थी. लेकिन, इस बार बाजार ने लगातार गिरावट का नया रिकॉर्ड बना दिया है.
आखिर दलाल स्ट्रीट गिरावट की इस चपेट में क्यों है. हर हफ्ते निवेशकों को लाखों करोड़ रुपये का नुकसान क्यों हो रहा है. इसके लिए अलग-अलग थ्योरी बताई जा रही है. सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों यानी FII की भारतीय बाजार से दूरी बताई जा रही है. इस साल विदेशी निवेशकों ने 30 सितंबर तक बाजार से करीब 28 अरब डॉलर निकाले हैं यानी 2 लाख 70 बाजार करोड़ रुपये के करीब भारतीय बाजार से निकल गया है. सिर्फ सितंबर के महीने में विदेशी निवेशकों ने 46 हजार करोड़ रुपये भारतीय बाजार से निकाले. इतना पैसा आज तक किसी साल में विदेशी निवेशकों ने भारत से बाहर नहीं निकाला था.
इसकी वजह ये बताई जा रही है कि अमेरिका के सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला ब्याज ज्यादा हो गया है. ये पिछले 24 सालों में सबसे ज्यादा है. अमेरिकी बॉन्ड पूरी तरह से सुरक्षित निवेश है. शेयर बाजार की तरह इसमें कोई जोखिम नहीं है. जब बिना किसी रिस्क के रिकॉर्ड ब्याज मिल रहा है तो विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. रुपये की कमजोरी भी एक कारण है क्योंकि रुपया कमजोर होने से FII के निवेश की वैल्यू डॉलर में कम हो जाती है.
इसके अलावा अमेरिका-ईरान के बीच तनाव की वजह से कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी भी एक फैक्टर है. ये वो कारण हैं जिनके बारे में ज्यादा लोगों को पता है. लेकिन यहीं ये सवाल पैदा होता है कि आखिर अमेरिका में बॉन्ड पर ब्याज क्यों बढ़ रहा है. आखिर अमेरिका में ऐसी क्या स्थिति हो गई है कि बॉन्ड से कमाई 2 दशकों में सबसे ज्यादा हो गई है.
मौजूदा समय में अमेरिका सबसे अधिक कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है. अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गया है. अमेरिकी सरकार का ये कर्ज उसकी सालाना GDP का लगभग 123% हो चुका है यानी अमेरिका की जितनी बड़ी अर्थव्यवस्था है, उस पर उससे भी ज्यादा कर्ज हो गया है और इसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है. अमेरिकी संसद की ज्वाइंट इकोनॉमिक कमेटी के मुताबिक, हर सेकेंड इसमें 85,000 डॉलर की बढ़ोतरी हो रही है यानी हर सेकेंड अमेरिका का कर्ज 81 लाख रुपये से ज्यादा बढ़ रहा है.
कर्ज इतना अधिक होने के कारण अमेरिकी सरकार को हर साल सिर्फ ब्याज चुकाने पर 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च करना पड़ रहा है यानी भारत की GDP का लगभग एक-चौथाई हिस्सा. अमेरिका सिर्फ कर्ज का ब्याज चुकाने पर खर्च कर रहा है. इस तरह अमेरिका कर्ज के एक जाल में फंस चुका है. कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए अमेरिका को और अधिक कर्ज लेना पड़ रहा है. इसके लिए अमेरिका का ट्रेजरी विभाग लगातार नए-नए बॉन्ड जारी कर रहा है. जब बाजार में सरकारी बॉन्ड की सप्लाई बढ़ जाती है तो बॉन्ड की कीमत गिर जाती है जबकि ब्याज बढ़ जाता है. यही वजह है कि 10 साल के बॉन्ड पर ब्याज बढ़कर 5.34% हो गया है जबकि 30 साल के बॉन्ड पर 5.67%.
ब्याज में ये बढ़ोतरी निवेशकों को अमेरिकी बॉन्ड की तरफ खींच रही है. ये भारत और दुनिया के कई और देशों में शेयर बाजार की गिरावट का एक बड़ा कारण है. लेकिन इतना महंगा कर्ज लेना अमेरिकी सरकार पर भी बोझ की तरह साबित हो रहा है. अगर यही ब्याज लंबे समय तक बना रहेगा तो अमेरिका का खर्च काफी बढ़ जाएगा यानी अमेरिका का भारी-भरकम कर्ज भारत के शेयर बाजार पर तो बोझ बन ही रहा है. लेकिन ये लंबे समय में अमेरिका के लिए भी मुसीबत साबित होगा.