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इस्लामिक दुनिया इजरायल को दुश्मन नंबर 1 मानती है. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में कई मुस्लिम देशों ने गाजा नरसंहार का दोषी बताया. इसके बावजूद खाड़ी के ताकतवर मुस्लिम देश UAE ने अपनी राजधानी में उनकी अगवानी क्यों की. इसका ईरान वॉर और मिडिल ईस्ट के मुस्लिम देशों में चल रही आपसी होड़ से क्या संबंध है.
आज आपको ये भी समझना चाहिए, जिस वक्त इस्लामिक देश मिलकर NATO जैसा गठबंधन बना रहे हैं, उस वक्त UAE इजरायल के साथ अपना गठबंधन क्यों मजबूत कर रहा है. और हमारे देश भारत पर इजरायल और UAE के मजबूत संबंधों का क्या असर पड़ेगा. लेकिन सबसे पहले देखिए नेतन्याहू और नाहयान की ये सीक्रेट मुलाकात कहां हुई और कैसे ये सारी दुनिया के सामने आ गई.
नेतन्याहू 27 सितंबर के दिन इजरायल से निकले और दोपहर करीब 3 बजकर 10 मिनट पर वो अबू धाबी पहुंचे. UAE में उन्होंने करीब 6 घंटे बिताए. इजरायल के मुताबिक नेतन्याहू UAE के राष्ट्रपति के निमंत्रण पर अबू धाबी पहुंचे थे.
इजरायल-UAE की दोस्ती..भारत के हित में कैसे? नेतन्याहू की UAE यात्रा का विश्लेषण
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इस दौरे में नेतन्याहू के साथ उनकी पत्नी सारा, इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के चीफ रोमन गोफमैन भी शामिल थे. इसके अलावा इजरायल के नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल प्रमुख, मिलिट्री सेक्रेटरी और विदेश नीति सलाहकार भी नेतन्याहू के साथ UAE गए थे. ये पूरी टीम सीधे तौर पर इजरायल की खुफिया, सैन्य रणनीति और कूटनीति का संचालन करती है, यानी हर बड़ा फैसला लेती है.
सबसे पहले इजरायल के चैनल 12 ने नेतन्याहू के UAE दौरे की खबर ब्रेक की. इसका मतलब इस दौरे की जानकारी पहले इजरायल से निकली. UAE की सरकारी एजेंसी WAM ने सोमवार को नेतन्याहू के दौरे की जानकारी दी. इसके बाद इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इसकी आधिकारिक सूचना दी.
इससे पहले मई 2026 में इजरायल ने ईरान युद्ध के दौरान दोनों नेताओं की एक गुप्त मुलाकात का दावा किया था, जिसे UAE ने पूरी तरह नकार दिया था. लेकिन इस बार UAE ने खुद नेतन्याहू के UAE आने और राष्ट्रपति नाहयान से उनकी मुलाकात को स्वीकार किया. यानी अब UAE इजरायल के साथ अपने मजबूत रिश्तों को खुलकर स्वीकार करने में हिचकिचा नहीं रहा. इसे मिडिलईस्ट में बड़ा बदलाव माना जा रहा है.
इजरायल के मुताबिक नेतन्याहू का UAE दौरा पहले से तय नहीं था. और नेतन्याहू अचानक UAE पहुंचे. इस दौरे के असली मकसद को जानने से पहले आप इस दौरे की टाइमिंग को समझिए. जिस वक्त नेतन्याहू का विमान अबू धाबी में लैंड हुआ, उससे ठीक पहले अमेरिका और ईरान ने ऐसे बयान दिए, जिसमें युद्ध के फिर से छिड़ने के संकेत छिपे थे.
ट्रंप ने कहा वो बहुत जल्दी ईरान से युद्ध जीत लेंगे. ट्रंप ने अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन से पहले ईरान पर नए हमलों के संकेत दिए. ईरान ने अमेरिका को युद्धविराम और होर्मुज खोलने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन ट्रंप ने उसे भी खारिज कर दिया.
इसका जवाब ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दिया. पेजेश्कियन ने कहा होर्मुज के प्रबंधन में अमेरिका ने दखल दिया तो ईरानी सेना जोरदार तमाचा मारेगी. जबकि अराघची ने कहा ईरान युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार है. अगर कयामत का युद्ध हो, तो भी ईरान डटा रहेगा. अब फैसला ट्रंप को करना है.
अमेरिका और ईरान के बीच इस बयानबाजी के कुछ घंटों बाद नेतन्याहू UAE में राष्ट्रपति नाहयान के सामने बैठे थे. इस मुलाकात की सबसे बड़ी वजह भी ईरान को ही बताया जा रहा है. इजरायल और UAE दोनों ने दौरे की आधिकारिक जानकारी देते हुए बताया, इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करना और क्षेत्रीय चुनौतियों पर चर्चा करना था.
इजरायल और खाड़ी देशों की मीडिया के मुताबिक दोनों देशों को आशंका है कि ईरान पर अमेरिकी हमले फिर शुरू हो सकते हैं. इसीलिए दोनों देशों ने चर्चा की कि ईरान के पलटवार की स्थिति में इजरायल और UAE कैसे एक दूसरे को सुरक्षित रखने में सहयोग दे सकते हैं.
दोनों नेताओं ने मंथन किया कि ईरान और उसके प्रॉक्सी नेटवर्क के कारण मिडिल ईस्ट की सुरक्षा पर जो संकट मंडरा रहा है, उससे मिलकर कैसे निपटा जाए. इस यात्रा में नेतन्याहू अपने साथ इजरायल के सबसे बड़े सुरक्षा अधिकारियों को लेकर गए थे, जिससे साफ है कि दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और रक्षा तंत्र को और मजबूत करने पर ठोस बातचीत हुई है.
इसके अलावा अब्राहम समझौते के बाद से दोनों देशों के बीच बने राजनयिक, व्यापारिक और तकनीकी रिश्तों को और अधिक मजबूत बनाने पर भी मंथन हुआ.
इस दौरे से लौटने के फौरन बाद नेतन्याहू ने ईरान को बगैर नाम लिए धमकाया भी है. जो ईरान के खिलाफ सामूहिक रणनीति का संकेत है.
नेतन्याहू इजरायल की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, लेकिन UAE यात्रा के दौरान खुद उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ गई थी. इजरायल की सिक्योरिटी एजेंसी शिन बेट ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की UAE यात्रा से जुड़ी रिपोर्टिंग को लेकर इजरायल के चैनल 12 के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है.
चैनल 12 ने नेतन्याहू की UAE यात्रा की खबर उनके इजरायल वापस लौटने से पहले ही प्रसारित कर दी. शिन बेट का कहना है कि रिपोर्ट के समय और उसमें दी गई जानकारी से प्रधानमंत्री, पूरे ऑपरेशन और जमीन पर मौजूद सुरक्षा बलों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई.
इजरायल की सुरक्षा एजेंसी ने नेतन्याहू की जान पर खतरे का दावा किया. वहीं तेल अवीव के अखबार इजरायल हायोम ने इस दौरे को लेकर एक और चौंकाने वाला खुलासा किया. अखबार का दावा है, नेतन्याहू-नाहयान की मुलाकात में सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देशों के प्रतिनिधि भी शामिल थे.
इन रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कतर सरकार का एक विमान भी UAE की राजधानी में आते हुए ट्रैक किया गया. UAE ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद से भी किसी को लाने के लिए एक सरकारी विमान भेजा था. इसके अलावा मोरक्को वायु सेना का एक C-130 सैन्य विमान नेतन्याहू से ठीक पहले UAE में लैंड हुआ था. मोरक्को इजरायल के साथ अब्राहम अकॉर्ड में शामिल है.
रिपोर्ट के मुताबिक नेतन्याहू का विमान लैंड होने के 20 मिनट बाद पूर्वी लीबिया के खलीफा हफ्तर के बेटे सद्दाम हफ्तर का विमान अबू धाबी में लैंड हुआ. सद्दाम हफ्तर ने नेतन्याहू से मुलाकात की. सद्दाम ने नेतन्याहू से लीबिया की राष्ट्रपति दौड़ के लिए राजनीतिक समर्थन भी मांगा.
इजरायल हायोम अखबार ने कम से कम दो और खाड़ी देशों के प्रतिनिधियों के इस मीटिंग में शामिल होने का दावा किया है. इन देशों के इजरायल से संबंध नहीं हैं. इस मीटिंग को ईरान के खिलाफ खाड़ी देशों और इजरायल की सामूहिक रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है.
आज मिडिल ईस्ट में ये सवाल भी उठ रहे हैं कि ईरान वॉर के बीच UAE ने इस्लामिक NATO के बजाय इजरायल से गठबंधन पर क्यों भरोसा किया. आज आपको इसकी वजह भी समझनी चाहिए.
UAE ने इजरायल को इसलिए चुना क्योंकि दोनों के बीच 2020 से सक्रिय रणनीतिक साझेदारी है, जिसमें व्यापार, तकनीक, साइबर, सुरक्षा और रक्षा सहयोग शामिल हैं. जबकि सऊदी और UAE यमन में विरोधी गुटों को समर्थन और रणनीतिक बंदरगाहों पर वर्चस्व की होड़ के कारण आमने-सामने हैं.
UAE-इजरायल के बीच व्यापार 20 करोड़ डॉलर से बढ़कर 3 अरब डॉलर सालाना से ज्यादा हो चुका है, जबकि मक्का गठबंधन में शामिल तुर्किए उस मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन करता है, जिसे UAE अपने लिए खतरा मानता है.
इसके अलावा ईरान के मिसाइल-ड्रोन खतरे के बीच इजरायल ने UAE को एयर-डिफेंस और खुफिया सूचनाएं तुरंत उपलब्ध कराईं, जबकि सऊदी पर हूती के हमलों के खिलाफ मक्का समझौता कागजी गठबंधन साबित हुआ.
UAE को ये भी पता है कि ईरान जैसे खतरे के खिलाफ आर्थिक रूप से कंगाल पाकिस्तान जैसे देश सिर्फ निंदा और संयम रखने की बात करते हैं, जबकि इजरायल जैसे मजबूत देश सीधे ईरान पर हमला करने का साहस रखते हैं.
यानी UAE के लिए पाकिस्तान-तुर्किए-सऊदी गठबंधन धर्म के आधार पर विकल्प बन सकता है, लेकिन इजरायल फौरन सुरक्षा क्षमता उपलब्ध कराने वाला भरोसेमंद साझेदार है.
मिडिल ईस्ट में बन रहे नए समीकरणों पर सारी दुनिया की नजर है. आज आपको भारत पर UAE और इजरायल की दोस्ती के असर के बारे में जानना चाहिए. भारत के लिए इजरायल और UAE की दोस्ती को ट्रिपल इंजन' कूटनीति माना जा रहा है, जिससे भारत का फायदा ही फायदा है.
UAE और इजरायल की नजदीकी से ही इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर की कल्पना को मजबूती मिली है. यह कॉरिडोर भारत को सीधे UAE, सऊदी अरब, इजरायल के रास्ते यूरोप से जोड़ेगा.
इस रूट के पूरी तरह शुरू होने पर एशिया से यूरोप के बीच कार्गो आवाजाही का समय और परिवहन लागत में लगभग 30% से 40% तक की भारी बचत होने का अनुमान है, जिससे भारतीय निर्यातकों को ग्लोबल मार्केट में बड़ा फायदा मिलेगा.
इजरायल भारत को अत्याधुनिक हथियार, ड्रोन, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और रडार तकनीक मुहैया कराता है, जबकि UAE भारत को ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी में बड़ा रणनीतिक स्पेस देता है.
जब ये दोनों देश आपस में मिलते हैं, तो भारत विरोधी ताकतों, समुद्री लुटेरों और आतंकवाद के खिलाफ खुफिया सूचनाओं का एक मजबूत त्रिपक्षीय नेटवर्क तैयार होता है.
इसके अलावा UAE में लगभग 35 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं, जो भारत को सालाना अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा भेजते हैं. UAE और इजरायल के बीच रणनीतिक साझेदारी से मिडिल ईस्ट में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और आर्थिक हितों को सीधी मजबूती मिलती है.
इजरायल और UAE दोनों भारत के नेचुरल पार्टनर हैं. इनके हित भी एक दूसरे से जुड़े हैं. यही वजह है, पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी के बीच इस्लामिक NATO बनने के बाद पाकिस्तान में इस बात की आशंका जाहिर की जाने लगी थी. इस्लामिक NATO के खिलाफ भारत-इजरायल और UAE भी गठबंधन बना सकते हैं.
हालांकि तीनों देशों के बीच ऐसी किसी चर्चा की खबर नहीं है. लेकिन इजरायल और UAE के मजबूत होते रिश्तों के बाद तीनों देशों के साझा दुश्मनों की चिंता बढ़ सकती है.