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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव चर्चा में है. 18 सितंबर को चुनाव है. नतीजे 19 सितंबर को आएंगे. हर साल की तरह इस बार भी उम्मीदवार मेट्रो पास, वाई-फाई, प्लेसमेंट और खेल सुविधाओं जैसे वादों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में हैं. लेकिन इस बार नामांकन की प्रक्रिया के बीच ही एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने चुनावी बहस की दिशा बदलने की संभावना पैदा कर दी है.
असल में सत्य निकेतन में जो दुखद हादसा हुआ उसने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा है. एक बिल्डिंग गिरने से सात छात्रों की जान चली गई है. कई घायल भी हुए हैं. यह इलाका नॉर्थ और साउथ कैंपस के आसपास पीजी और हॉस्टल में रहने वाले हजारों छात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. सवाल यह है कि क्या यह हादसा डीयू चुनाव में 'सेफ पीजी और हॉस्टल' को असली मुद्दा बना पाएगा.
सैकड़ों छात्रों ने पीजी खाली कर दिए
सत्य निकेतन हादसे के बाद डर का माहौल इतना बढ़ा कि सैकड़ों छात्रों ने पीजी खाली कर दिए. कई छात्र घर वापस लौट गए. कुछ अलग जगहों पर शिफ्ट हो गए. यह हादसा सिर्फ एक इमारत गिरने की घटना नहीं रहा. बल्कि इसने डीयू के आसपास बने अवैध और असुरक्षित पीजी-हॉस्टल नेटवर्क की पूरी सच्चाई सामने ला दी.
उधर सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाए हैं. मगर हर बार ये कदम घटना होने के बाद ही उठाए जाते हैं. घटना की न्यायिक जांच के आदेश हुए. इमारत मालिक के खिलाफ FIR दर्ज हुई अरेस्ट भी किया गया.
लापरवाही के आरोप में MCD के दक्षिण जोन के उपायुक्त समेत पांच अधिकारियों को निलंबित किया गया. इस बीच दिल्ली भर में अवैध पांच मंजिला इमारतों के खिलाफ एक्शन शुरू हो गया. ऐसी इमारतों की सूची तैयार कर प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई की जा रही है.
मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच चुका है
इसके अलावा सत्य निकेतन में हादसे वाली बिल्डिंग के ठीक पीछे बनी एक और असुरक्षित इमारत को पूरी तरह खाली कराकर एहतियातन गिराने का फैसला लिया गया. वहां से निकाले गए छात्रों के रहने की वैकल्पिक व्यवस्था भी की गई है. फिलहाल मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच चुका है.
कोर्ट ने डीयू से बाहरी छात्रों की संख्या और यूनिवर्सिटी/कॉलेजों के हॉस्टलों का डेटा मांगा है. साथ ही MCD से PG संचालन को नियंत्रित करने वाले नियमों पर भी जवाब तलब किया है.
कभी भी हॉस्टल या पीजी चुनावी नैरेटिव के केंद्र में नहीं
छात्र संगठनों की मांग है कि सिर्फ जांच और मुआवजे तक बात सीमित ना रहे बल्कि पूरे इलाके में इमारतों का सुरक्षा ऑडिट हो और डीयू प्रशासन व दिल्ली नगर निगम इस पर जवाबदेही तय करें. अगर पिछले दो डीयू चुनावों को देखें तो 2024 में मुख्य मुकाबला ABVP और NSUI के बीच ही रहा है. जैसा कि हमेशा रहता है. इसमें पेपर लीक और फीस वृद्धि जैसे मुद्दे छाए रहे.
मतदान के दिन एक उम्मीदवार और शिक्षक के बीच झड़प भी सुर्खियों में रही थी. 2025 के चुनाव में भी ABVP के आर्यन मान अध्यक्ष चुने गए थे. इनका प्रचार सब्सिडी वाले मेट्रो पास, मुफ्त वाई-फाई और बेहतर खेल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे वादों पर केंद्रित था.
वहीं NSUI की उम्मीदवार जोसलिन नंदिता चौधरी हारने के बावजूद महिला सुरक्षा, यौन उत्पीड़न और पीरियड लीव जैसे मुद्दों को लेकर चर्चा में रहीं. लेकिन इन दोनों सालों में कभी भी हॉस्टल या पीजी सेफ्टी चुनावी नैरेटिव के केंद्र में नहीं आया.
इस बार हादसे के बाद ABVP ने छात्र सुरक्षा मार्च निकालकर हॉस्टलों की संख्या बढ़ाने की मांग रखी, तो NSUI ने प्रशासन के इस्तीफे, सुरक्षा ऑडिट और क्लास बहिष्कार का आह्वान किया. दोनों संगठन फिलहाल प्रदर्शन और बयानबाजी के स्तर पर सक्रिय दिख रहे हैं. मगर उनकी असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह मुद्दा उनके मेनिफेस्टो में ठोस वादे के तौर पर शामिल होता है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर अंकुर शांडिल्य ने बताया कि अगर इस बार चुनाव संगठनों की तरफ से ऐसा मुद्दा कैंपेन में आता है और इस पर काम होता है तो ये कैंपस के लिए अच्छी बात होगी.
मगर उन्होंने ये जरूर जोड़ा कि इसमें सभी स्टेकहोल्डर्स को मिलकर काम करना होगा. फिलहाल ये मामला कोर्ट में पहुंचने की वजह से उन्होंने यूनिवर्सिटी की तरफ से कोई ज्यादा बयान उचित नहीं समझा.
दुनिया में हाल में छात्र राजनीति ने क्या कोई बदलाव किया? उनकी यूनिवर्सिटीज में छात्रसंघ और वहां के छात्र क्या कर रहे हैं..
छात्र राजनीति में सुरक्षा और रहन-सहन जैसे मुद्दे अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं हैं. अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूस्टन में स्टूडेंट गवर्नमेंट एसोसिएशन ने 2026-27 सत्र के लिए कैंपस सेफ्टी और स्टूडेंट अफोर्डेबिलिटी को अपने एजेंडे में शामिल किया है. वहां तो छात्रों के लिए ट्यूशन-फीस-हाउसिंग खर्च समझने का एक ऐप तक लॉन्च किया.
वहीं कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव में 2028 ओलंपिक से पहले संभावित हाउसिंग डिसप्लेसमेंट को लेकर प्रशासन की जवाबदेही तय करने की मांग प्रमुख कैंपेन मुद्दा बनी है.
हार्वर्ड की अपनी हाउसिंग रिपोर्ट (JCHS, जून 2026) के मुताबिक छात्र कर्ज और महंगे किराए की वजह से अपना घर नहीं लेने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. वहां भी हाउसिंग अफोर्डेबिलिटी प्रभावित कर रहा है.
उधर ब्रिटेन में भी तस्वीर मिलती-जुलती है. कैंब्रिज ग्रैजुएट यूनियन ने एक रिपोर्ट में चेताया कि 2026 तक कैंब्रिज को करीब नौ हजार नए स्टूडेंट रूम्स की जरूरत होगी और मांग रखी कि कॉलेज किराया घटाएं. ऑक्सफोर्ड में छात्र संघ की Class Act कैंपेन कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए महंगे किराए और गारंटर जैसी दिक्कतों में मदद करती है. राष्ट्रीय स्तर पर NUS UK कहता है कि कई छात्र भीड़भाड़ और असुरक्षित आवास में रहने को मजबूर हैं.
फ्रांस में तो मार्च 2026 में सैकड़ों यूनिवर्सिटी स्टाफ और छात्रों ने उच्च शिक्षा मंत्रालय के बाहर सेक्टर की लगातार होती फंडिंग कमी के खिलाफ प्रदर्शन किया. यूरोपियन स्टूडेंट्स यूनियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी से मार्च 2026 के बीच 13 यूरोपीय देशों में 31 छात्र प्रदर्शन दर्ज हुए और इनमें किराया व महंगाई जैसे आर्थिक और रहन-सहन से जुड़े मुद्दे पिछली अवधि के मुकाबले 27 फीसदी बढ़े.
पड़ोसी पाकिस्तान में भी छात्र राजनीति फिलहाल गुस्से के दौर से गुजर रही है. कराची यूनिवर्सिटी में परीक्षाओं में रुकावट, फीस बढ़ोतरी और प्रशासनिक संकट को लेकर छात्रों, शिक्षकों और स्टाफ ने अलग-अलग लेकिन एक साथ प्रदर्शन किए हैं. इसे इस्लामी जमीयत तुलबा और एक छात्र गठबंधन ने संगठित किया था.
इस्लामाबाद के पास सरहद यूनिवर्सिटी (SUSIT) में भी एक वरिष्ठ अधिकारी को हटाए जाने और संस्थान से जुड़े दूसरे मुद्दों को लेकर चल रहे छात्र प्रदर्शन के दौरान सुरक्षाकर्मी और छात्रों के बीच झड़प हो गई, जिसमें फायरिंग तक की खबरें आईं.
यूरोपियन स्टूडेंट्स यूनियन (ESU) की मॉनिटरिंग रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी-मार्च 2026 के बीच 13 देशों (फ्रांस, बेल्जियम, आयरलैंड, इटली, नीदरलैंड्स, रोमानिया समेत) में 31 अलग-अलग छात्र प्रदर्शन दर्ज किए गए. इनमें 5 बड़े प्रदर्शन 1000 से ज्यादा छात्रों वाले थे.
खास बात ये रही कि 'इकोनॉमिक एंड लिविंग कंडीशंस' से जुड़े मुद्दे ही ट्रेंड में रहे. यानी किराया, महंगाई, रहने की लागत शामिल है. European Students Union, Student Protests Monitoring Report जनवरी-मार्च 2026 में इसका जिक्र किया गया है.

तो दुनिया भर में छात्र राजनीति अब किताबी वैचारिक नारों से हटकर सुरक्षा, किराया और बुनियादी सुविधाओं जैसे रोजमर्रा के मुद्दों की तरफ शिफ्ट हो चुकी है. अब इंतजार है कि भारत की टॉप यूनिवर्सिटीज में ऐसा कब देखने को मिलेगा खासकर दिल्ली यूनिवर्सिटी को लेकर अभी ये मुद्दा काफी चर्चा में बना हुआ है. बस इसे जवाबदेही से जोड़ने की जरूरत है.
जेएनयू में तो एक बार खटमल भी बन चुका है चुनावी मुद्दा
ऐसा भी नहीं है कि छात्रों से जुड़े इन मामलों को मुद्दा नहीं बने जा सकता है. दिल्ली में ही जेएनयू में तो एक बार खटमल का मामला खूब चर्चा में रहा था. हुआ यह था कि 2011-12 में जेएनयू में हॉस्टलों में खटमलों का भारी प्रकोप था. छात्रों को पुराने गद्दे तक फेंकने पड़े और कई लोग बिना गद्दे के फर्श पर सोने को मजबूर हुए.
उनका आरोप था कि लंबे समय से कीटनाशक का छिड़काव नहीं हुआ था. मामला इतना बढ़ा कि खटमलों का मुद्दा जेएनयू छात्रसंघ चुनाव के एजेंडे में शामिल हो गया. दबाव के बाद प्रशासन को बड़े स्तर पर पेस्ट कंट्रोल कराना पड़ा. तो अगर छात्र संगठन रोजमर्रा की परेशानी को सही तरीके से उठाएं तो वह वैचारिक मुद्दों से आगे बढ़कर चुनाव का बड़ा मुद्दा बन सकती है.