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Delhi News: दिल्ली में जुलाई में प्रदर्शन हुए थे. इस मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ ली है. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इस मामले को लेकर नई FIR दर्ज की है. ऐसे में क्राइम ब्रांच हिंसा की पूरी घटना, इसमें शामिल लोगों और उनकी भूमिका की जांच करेगी. इसके साथ ही जल्द ही प्रदर्शन करने वाले लोगों को नोटिस भेजकर जांच में शामिल होने के लिए बुलाया जा सकता है.
हिंसा वाले दिन संबंधित लोग कहां थे
पुलिस जांच के दौरान Facial Recognition System (FRS) के माध्यम से पहचान किए गए लोगों के बयान को दर्ज कर सकती है. साथ ही ये भी पता लगाया जाएगा कि हिंसा वाले दिन संबंधित लोग कहां थे. पुलिस प्रदर्शन के दौरान उनकी पूरी गतिविधियों और वहां उन्होंने क्या किया हर एक चीज में उनकी भूमिका की भी जांच करेगी.
दोबारा FIR दर्ज?
दरअसल, जुलाई के महीने में दिल्ली के जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में CJP का प्रदर्शन हुआ था. इस दौरान हिंसा की घटना सामने आई थी. इसे लेकर पहले भी कई FIR दर्ज किए गए थे, जिसमें 17 FIR बाद में रद्द कर दिए गए थे. अब दोबारा से नई FIR पुलिस दर्ज कर जांच को फिर से शुरू करेगी.
20 से 26 जुलाई को क्या हुआ था?
जुलाई में 20 से 26 के आसपास पुलिस ने प्रदर्शन वाली जगह पर और उसके आसपास Facial Recognition System का इस्तेमाल किया था. पुलिस ने बताया कि इसके जरिए प्रदर्शन वाली जगह पर मौजूद ऐसे लोगों की पहचान की गई थी, जिनका पहले भी आपराधिक रिकॉर्ड था.
कैसे की गई थी लोगों की पहचान?
पुलिस ने 24 जुलाई को शुरुआत में लगभग 400 लोगों की पहचान होने की जानकारी दी थी. बाद में ये संख्या बढ़कर 2873 बताई गई. पुलिस ने बताया कि इनमें 2402 लोगों की पहचान क्राइम रिकॉर्ड के आधार पर किया गया था. साथ ही 471 लोगों की पहचान डोजियर रिकॉर्ड के माध्यम से की गई थी.
सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?
वहीं 17 अगस्त को दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के सामने हलफनामा दाखिल किया था, जिसमें 2,873 FRS पहचान का विवरण दिया गया था. वहीं एक दिन बाद 18 अगस्त को पुलिस ने कोर्ट के सामने बोला कि FRS का इस्तेमाल पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले लोगों की पहचान के लिए किया गया था.
क्यों उठ रहे थे FRS की कार्यवाई को लेकर सवाल?
4 सितंबर को FRS की कार्यवाई को लेकर सवाल खड़े हुए थे. वहीं एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पुलिस ने लगभग 25 ऐसे लोगों को प्रदर्शन वाली जगह पर मौजूद बताया है, दो उस समय जेल के अंदर थे. इसके बाद से ही FRS से हुई पहचान की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे थे.