दिल्ली इमारत हादसे में 27 घंटे चला रेस्क्यू, कौन सी तकनीक और कैसे काम करती है NDRF?
NDRF Building Collapse Rescue Operations: दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके पांच मंजिला इमारत गिर गई, जिसके बाद से राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं. इस हादसे में अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है
Delhi News: दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार, 6 सितंबर को पांच मंजिला इमारत भरभराकर गिर गई. इस घटना ने राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. हादसे के बाद करीब 27 घंटे तक लगातार रेस्क्यू अभियान जारी रहा. इस हादसे में अब तक 7 लोगों की जान जा चुकी है. वहीं कुछ लोग घायल हैं. लोगों के बचाव में NDRF के साथ दिल्ली पुलिस, दिल्ली फायर सर्विस और दिल्ली डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी की टीमें भी शामिल रहीं.
दिल्ली यूनिवर्सिटी साउथ कैंपस के नजदीक स्थित ये इमारत 1990 के दशक में बनाई गई थी. यहां पर एक प्राइवेट हॉस्टल चलाया जा रहा था. इमारत के गिरने के बाद मलबे में लोगों के फंसे होने की आशंका को देखते हुए बड़े स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया था. ऐसे में आइए जानते हैं मलबे के अंदर फंसे लोगों को खोजने के लिए कौन-कौन से उपकरण इस्तेमाल किए जाते हैं और रेस्क्यू टीम किस तरह यह तय करती है कि किसी हिस्से में जाना सुरक्षित है या नहीं?
NDRF का खास ऑपरेशन क्या होता है?
जब कहीं इमारत गिरने की घटना होती है, तो NDRF की टीम विशेष अभियान चलाती है, जिसे कोलैप्स स्ट्रक्चर सर्च एंड रेस्क्यू यानी CSSR कहा जाता है. अगर इसे आसान भाषा में समझे तो इसका मतलब होगा गिरी हुई इमारत के मलबे में फंसे लोगों की तलाश करना. लोगों तक सुरक्षित तरीके से पहुंचना और उन्हें बाहर निकालना. इस तरह के ऑपरेशन में सबसे बड़ी चुनौती ये होती है कि मलबा कभी भी दोबारा खिसक सकता है. यही वजह है कि रेस्क्यू टीम तेजी से काम करती है. साथ ही हर कदम सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाती है. उसका मेन उद्देश्य कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचाना होता है.
NDRF की टीम मौके पर कैसे पहुंचती है?
CSSR टीम को कई परिस्थितियों में मौके पर भेजा जा सकता है. इसको लेकर NDRF मुख्यालय की तरफ से भी निर्देश मिल सकते हैं. इसके अलावा जिस राज्य में ये हुआ है या केंद्र शासित प्रदेश की सरकार, स्थानीय प्रशासन या प्रभावित अधिकारी भी NDRF से मदद मांग सकती है. इतना ही नहीं जरूरत पड़ने पर संबंधित बटालियन के कमांडेंट के आदेश पर भी टीम को रवाना किया जा सकता है.
NDRF के पूर्व महानिदेशक अतुल करवाल ने बताया कि NDRF की बटालियन अपने जिम्मेदारी वाले इलाके में होने वाली घटनाओं पर लगातार नजर बनाए रखती हैं. उन्होंने ये भी बताया कि किसी बड़ी घटना के बाद टीम केवल परमिशन का इंतजार नहीं करती, बल्कि जरूरत पड़ने पर खुद भी तुरंत कार्रवाई शुरू कर सकती है. बता दें कि आपदा के समय शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं.
अगर मांग होती है तो बटालियन मुख्यालय में दो SAR यानी सर्च एंड रेस्क्यू टीम और प्रत्येक रीजनल रिस्पॉन्स सेंटर यानी RRC में एक टीम जरूरी सामान के साथ तैयार होती है. इन टीमों को तुरंत रवाना होने की स्थित में रखा जाता है. कोशिश यही रहती है कि टीम करीब 30 मिनट के अंदर घटना वाली जगह के लिए निकल जाए.
मौके पर सबसे पहले क्या होता है?
रेस्क्यू टीम जैसे ही घटना वाली जगह पर पहुंचती है सबसे पहले इलाके का जायजा लेती है. टीम आमतौर पर घटना वाली जगह के पास अपना ऑपरेशन बेस तैयार करती है. इसके बाद टीम का कमांडर मौके पर मौजूद खतरों की पहचान करता है. बता दें कि जो इमारत गिर जाती है उसमें कई तरह के खतरे हो सकते हैं. मलबे के नीचे गैस पाइपलाइन, बिजली के तार, कमजोर दीवारें या टूटे हुए कंक्रीट के हिस्से हो सकते हैं.
इसलिए रेस्क्यू शुरू करने से पहले ये देखना जरूरी होता है कि बचावकर्मियों के लिए कौन सा रास्ता सुरक्षित है. इसके अलावा घटना वाली जगह के आसपास सुरक्षा घेरा बनाया जाता है, जिससे आम लोग या बिना सुरक्षा उपकरण के वहां पहुंचने वाले लोग रेस्क्यू ऑपरेशन में बाधा न डालें और खुद भी खतरे में न पड़ें.
कई एजेंसियां मिलकर करती हैं काम
इमारत गिरने वाले हादसे में एक एजेंसी के लिए पूरा ऑपरेशन संभालना आसान नहीं होता. इसमें NDRF को स्थानीय पुलिस, फायर सर्विस, मेडिकल टीम और प्रशासन के साथ मिलकर काम करते हैं. इस तरह के मामलों में एक तरह का इंसिडेंट कमांड सिस्टम काम करता है. घटना वाली जगह पर मौजूद बड़े अधिकारी अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल बनातें हैं. इसके बाद NDRF अपनी विशेष उपकरणों के जरिए रेस्क्यू में मदद करती है, लकिन वो अपने स्तर पर पूरा प्रशासनिक कमांड अपने हाथ में नहीं लेती.
मलबे में जाने से पहले बिल्डिंग की जांच
सबसे पहले रेस्क्यू टीम ये पता लगाती है कि बची हुई इमारत या मलबे का हिस्सा कितना सुरक्षित है. इसको लेकर प्रशिक्षित स्ट्रक्चरल इंजीनियर और विशेषज्ञ मौके का निरीक्षण करते हैं. इस प्रोसेस को स्ट्रक्चरल ट्राइएज कहा जाता है. इसमें से देखा जाता है कि कौन सा हिस्सा सही है और कौन सा गिर सकता है.
इसके साथ ही गैस लीक, बिजली के तार और दूसरे संभावित खतरों की भी जांच की जाती है. वहीं अगर कोई हिस्सा असुरक्षित लगता है वहां रेस्क्यू टीम सीधे एंट्री नहीं करती है. पहले उस हिस्से को मजबूत किया जाता है. फिर इसके लिए लकड़ी या हाइड्रोलिक शोरिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है. पहले कमजोर दीवर और ढांचे को सहारा देने के बाद ही बचावकर्मी अंदर जाने की कोशिश करते हैं.
मलबे में फंसे लोगों तक कैसे पहुंचती है टीम?
बड़ी इमारत गिरने पर एक ही जगह से अंदर जाना सही नहीं होता है. ऐसे में रेस्क्यू टीम अलग-अलग जगहों से अंदर जाती है और रास्ता खोजती है. अगर किसी व्यक्ति तक पहुंचने के लिए दीवार, फर्श या छत का हिस्सा काटना जरूरी हो, तो टीम इस बात का ध्यान रखती है कि बिल्डिंग के मुख्य सहारे यानी लोड-बेयरिंग हिस्से को नुकसान न पहुंचे. वहीं मलबा को हटाते समय भी कुछ सावधानी बरती जाती है. सबसे पहले उन जगहों का ध्यान दिया जाता है, जहां लोगों के फंसे होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है. भारी मशीनरी का इस्तेमाल भी किया जाता है जब ये पता लग जाए कि मलबे के अंदर मौजूद व्यक्ति को अतिरिक्त नुकसान नहीं होगा.
घायलों को कैसे बचाया जाता है?
वहीं जब कोई व्यक्ति मलबे के अंदर जिंदा होता है तो उसे निकालने का प्रोसेस बहुत सावधानी से किया जाता है. पहले रेस्क्यू टीम स्थिति का आकलन करती है. ये तय किया जाता है कि किस तरीके से बाहर निकाला जाए. बाहर निकालते ही सबसे पहले घायल व्यक्ति का इलाज किया जाता है. इसके बाद अस्पताल ले जाया जाया जाता है. अगर घायल व्यक्ति की स्थिति गंभीर हो तो रेस्क्यू के दौरान ही मेडिकल टीम को उसके पास रखा जा सकता है.
मलबे में जिंदगी तलाशने वाली तकनीक
ऐसे में ऑपरेशन में आधुनिक तकनीक की भूमिका काफी अहम मानी जाती है. सत्य निकेतन में भी NDRF की टीम ने मलबे से कंक्रीट के स्लैब हटाने और ढांचे को स्थिर करने के लिए कई विशेष उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था. जैसे कि ब्रीचिंग और कटिंग उपकरण, लिफ्टिंग मशीनरी, इन्फ्लेटेबल बैग, हाइड्रोलिक शोरिंग और लकड़ी के सपोर्ट सिस्टम शामिल हैं. इसके जरिए कमजोर हिस्सों को सहारा दिया जा सकता है.
कैसे काम करते हैं लाइफ डिटेक्टर?
लाइफ डिटेक्शन सेंसर होते हैं, जो मलबे के नीचे दबे व्यक्ति की हलचल या आवाज को पकड़ने में मदद करते हैं. जैसे किसी व्यक्ति की आवाज, हलचल या मलबे को खरोंचने जैसी गतिविधि का पता लगाया जा सकता है. इस तरह के उपकरणों का इस्तेमाल करते समय घटना वाली जगह पर शोर कम रखना भी जरूरी होता है. यही वजह है कि रेस्क्यू ऑपरेशन में अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल बहुत महत्वपूर्ण होता है.