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कॉकरोच जनता पार्टी के लीडर्स सौरव दास और आशुतोष रांका को आखिरकार रिहाई मिल गई है. वो 8 दिन बाद मिली जमानत पर बाहर निकल रहे हैं. दिल्ली में SEM कोर्ट ने दोनों को रिहा करने का आदेश दिया है. दोनों नेताओं को न्यायिक हिरासत पूरी होने के बाद SEM कोर्ट में पेश किया गया था. वे 8 दिनों से न्यायिक हिरासत में थे. दिल्ली पुलिस ने दोनों की हिरासत तीन दिन बढ़ाने की मांग की थी. ये मांग खारिज हो गई. फिलहाल उन्हें कुछ शर्तों के साथ जमानत मिल गई है.
Delhi: The SEM Court has ordered the release of CJP leaders Saurav Das and Ashutosh Ranka. They were produced before the SEM Court after 2 days of judicial custody. https://t.co/jEakL8FlOe
— ANI (@ANI) October 21, 2026
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इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में आशुतोष रांका और सौरव दास की याचिका पर सुनवाई हुई. इस दौरान अदालत ने प्रदर्शन, शांति व्यवस्था और बॉन्ड की शर्तों से जुड़े कई सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पहले संबंधित एसईएम यानि कि सब-डिविजनल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने होने वाली सुनवाई का इंतजार करने को कहा था. अदालत ने यह भी सवाल किया था कि जब मामला उसी दिन दोपहर दो बजे एसईएम के सामने सुनवाई के लिए आने वाला है तो हाई कोर्ट में तत्काल सुनवाई पर जोर देने की इतनी जल्दी क्यों है. फिलहाल इन दोनों ने अपनी अर्जी दिल्ली हाई कोर्ट से वापस ले ली थी.
दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश वकील अभिक चिमनी ने 14 और 19 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट SEM की तरफ से पारित आदेशों को रद्द करने की मांग की थी. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि जब कानून में अपील और दूसरे वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद हैं, तो याचिकाकर्ता सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अदालत क्यों आए हैं. अदालत ने याचिकाकर्ताओं को पहले SEM के सामने होने वाली सुनवाई का इंतजार करने की सलाह दी थी. कोर्ट ने कहा था कि यदि फैसला उनके पक्ष में आता है, तो विवाद खत्म हो सकता है. वहीं, राहत नहीं मिलने पर वे रिवीजन कोर्ट और उसके बाद हाईकोर्ट का रुख कर सकते हैं.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आशुतोष रांका और सौरव दास की उम्र पूछी. उन्हें बताया गया कि सौरव की उम्र 27 साल और आशुतोष की उम्र 31 साल है. इस पर अदालत ने टिप्पणी की थी कि इसका मतलब है कि वे खुद जेन-जी (Gen Z) नहीं हैं. कोर्ट ने कहा कि शुरुआत में यह छात्रों का प्रदर्शन था, जिसमें बच्चे और छात्र शामिल थे, लेकिन अब प्रदर्शन का मुद्दा बदल गया है. लोग वही हैं, लेकिन उनकी मांगें और प्रदर्शन का उद्देश्य बदल गया है.
साथ ही हाईकोर्ट ने प्रदर्शन करने वाले समूहों की पहचान और उनके उद्देश्यों को लेकर भी सवाल उठाए थे. कोर्ट ने कहा कि यह जानना महत्वपूर्ण है कि प्रदर्शन करने वाले लोग वास्तव में कौन हैं, उनकी पहचान क्या है, उनका संगठन कौन-सा है और उसका वास्तविक मकसद क्या है. अदालत के मुताबिक, जब शांति भंग होने की आशंका हो, तो इन सवालों का महत्व और बढ़ जाता है. यदि किसी समूह के लोग बार-बार अलग-अलग मुद्दों को लेकर प्रदर्शन करते हैं, तो उनके प्रदर्शन के उद्देश्य पर विचार करना भी जरूरी हो सकता है.
हाई कोर्ट की सुनवाई में बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने की स्थिति पर भी चर्चा हुई थी. हाई कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने के बाद उसकी शर्तों का उल्लंघन करता है और दोबारा प्रतिबंधित स्थान पर जाता है, तो उसके खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. अदालत ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से हटाने से संबंधित अधिसूचना का भी जिक्र किया. कोर्ट के मुताबिक, इस अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, लेकिन उस पर अभी तक रोक नहीं लगी है. ऐसे में प्रतिबंधों का उल्लंघन कर वहां जाने पर गिरफ्तारी का आधार बनता है या नहीं, यह विचार का विषय है.
कोर्ट ने बैरिकेड तोड़ने जैसी स्थिति के संभावित असर पर भी सवाल उठाया. अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बैरिकेड तोड़ता है, तो दूसरे लोग भी प्रतिबंधों का उल्लंघन कर सकते हैं. इससे कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा पैदा हो सकता है. अदालत की टिप्पणियां इस बात पर केंद्रित रहीं कि शांति बनाए रखने के लिए लागू की गई शर्तों का उल्लंघन होने पर उसके कानूनी परिणाम क्या हो सकते हैं.