छत्तीसगढ़ का विश्व-प्रसिद्ध 75 दिनों तक चलने वाला 'बस्तर दशहरा' इस वर्ष अपनी परंपरा और संस्कृति में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जोड़ रहा है. इस 75 दिवसीय उत्सव की एक अनूठी विशेषता यह है कि इसमें बस्तर क्षेत्र के सुदूर कोनों से देवी-देवता शामिल होने आते हैं. रियासती काल की परंपरा के अनुसार, बस्तर का राजपरिवार इस क्षेत्र की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को जगदलपुर आने का निमंत्रण देता है. इसके बाद देवी की पालकी दंतेवाड़ा से जगदलपुर लाई जाती है. इस वर्ष नक्सलवाद के खात्मे के बाद बस्तर दशहरा के आयोजन में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है.
इस साल की सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक घटना यह है कि बस्तर के सुदूर ग्रामीण इलाकों में स्थित गुड़ियों (मंदिरों) को भी अब निमंत्रण भेजे गए हैं. परंपरा के अनुसार बस्तर के ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद ऐसी सभी गुड़ियों को निमंत्रण दिया जाता है. इसके बाद, संबंधित पुजारियों द्वारा लाए गए 'छत्र' के रूप में देवता बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए आते हैं. अंगा भी लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र होती हैं. बस्तर में नक्सलवाद के कम होने की वजह से इस साल उन मंदिरों तक भी निमंत्रण पहुंचाना संभव हो पाया है, जो सबसे भीतरी और दुर्गम ग्रामीण इलाकों में स्थित हैं.
बस्तर राजपरिवार के प्रमुख सदस्य, कमलचंद भंजदेव का कहना है कि इस क्षेत्र से नक्सलवाद के खत्म होने के साथ ही इस साल के बस्तर दशहरा में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है. मावली परघाव रस्म पूरी हो चुकी है और अब कुटुंब जात्रा रस्म में बस्तर दशहरा में शामिल होने आए देवी देवताओं को राज परिवार के सदस्यों द्वारा विधि विधान से पूजा पाठ कर विदाई दी जाती है.
मावली परघाव रस्म के दौरान देवी के स्वागत के लिए सड़कों पर फूल बिछाए गए. रास्ते में कई जगहों पर भक्तों ने देवी का स्वागत करने के लिए उन पर फूल बरसाए और साथ ही शानदार आतिशबाजी भी की गई. देवी की पालकी और उनके पारंपरिक छत्र की एक झलक पाने के लिए हजारों भक्त इकट्ठा हुए. कई लोग देवी का स्वागत करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए अपने घरों की छतों पर भी जमा हुए. दंतेवाड़ा जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक (SP) भी पालकी और छत्र के साथ जगदलपुर तक आए.