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पिछले कुछ महीनों से टाटा ग्रुप के अंदर चल रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. देश के सबसे बड़े कारोबारी घराने की बात आती है तो हर किसी की नजर इसके बोर्ड रूम पर लगी रहती है कि आखिर अंदर चल क्या रहा है? रतन टाटा जी के इस दुनिया से जाने के बाद टाटा ट्रस्ट की कमान नोएल टाटा के हाथों में है. कमान संभालने के बाद उनकी तरफ से ऐसा कदम उठाया गया, जिसने टाटा संस के पूरे बोर्ड रूम में हलचल कर दी. जरा सोचिए, यदि कोई आपसे कहे कि 23,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड बिना पूरे बिजनेस प्लान और रिस्क एनालिसिस के अप्रूव नहीं होगा तो आप क्या कहेंगे?
नोएल टाटा ने भी ठीक यही किया है. उन्होंने साफ-साफ कहा कि अब टाटा संस का एक रुपया बिना हिसाब और गारंटीड रिटर्न के दांव पर नहीं लगेगा. टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस की तरफ से अलग-अलग ऑपरेटिंग कंपनियों में इन्वेस्टमेंट किया जाता है. अब खबर यह आ रही है कि नोएल टाटा ने टाटा संस की तरफ से किये जाने वाले बड़े इन्वेस्टमेंट पर गहरी छानबीन (Scrutiny) की मांग की है.
नोएल टाटा का तर्क है कि मैनेजमेंट को जब भी कोई बड़ा कैपिटल इन्वेस्टमेंट का प्रस्ताव लाना हो तो उससे पहले बोर्ड के सामने पूरी डिटेल रिपोर्ट पेश करनी चाहिए. रिपोर्ट में बिजनेस से जुड़ी पूरी जानकारी, उससे मिलने वाला संभावित फाइनेंशियल रिटर्न और रिस्क की पूरी जानकारी होनी चाहिए. इसके बिना डायरेक्टर्स को किसी भी प्रपोजल पर साइन नहीं करने चाहिए.
यह पूरा मामला मौजूदा फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत में गर्माया था. जून में हुई टाटा संस की बोर्ड मीटिंग के दौरान कम्पोजिट इन्वेस्टमेंट प्लान का प्रपोजल पेश किया गया. यह 23,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का प्रपोजल था. इस रकम को टाटा की कई बड़ी ऑपरेटिंग कंपनियों में डाला जाना था-
23,000 करोड़ रुपये का यह प्रपोजल अप्रूवल के लिए सामने आया तो नोएल टाटा ने इसको लेकर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा-इतने बड़े फंड की मंजूरी को महज बोर्ड की सहमति के लिए टेबल पर रख देना काफी नहीं है. इसके साथ एक फॉर्मल असेसमेंट होना चाहिए, जिसमें यह साफ किया जाए कि भारी-भरकम इन्वेस्टमेंट के बाद कंपनी को कितना फायदा होगा और क्या खतरा हो सकता है?
आप भी सोच रहे होंगे कि क्या नोएल टाटा के कहने से बोर्ड के फैसले बदल सकते हैं? इसका जवाब है हां, उनके पास जबरदस्त लेवरेज और पावर है. टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुसार यदि कंपनी 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का कोई भी निवेश करना चाहती है तो उसे टाटा ट्रस्ट की तरफ से नॉमिनेट किये गए डायरेक्टर्स के बहुमत से मंजूरी लेनी जरूरी है. नोएल टाटा टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट की तरफ से नामित दो प्रमुख डायरेर्क्स में से एक हैं. दूसरे नॉमिनेटेड डायरेक्टर टीवीएस मोटर कंपनी के चेयरमैन एमेरिटस वेणु श्रीनिवासन हैं. यानी बिना उनकी रजामंदी के कोई भी बड़ा फंड ट्रांसफर होना पॉसिबल नहीं है.
जून की मीटिंग के बाद सितंबर में हुई टाटा संस की बोर्ड मीटिंग के दौरान नोएल टाटा ने अपनी मांग को फिर से दोहराया. उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि किसी भी तरह के प्रपोजल के साथ उसका डिटेल बिजनेस केस जरूर होना चाहिए. सितंबर में होने वाली मीटिंग के दौरान किसी नए या पेंडिंग इन्वेस्टमेंट प्लान पर चर्चा नहीं हुई. उस मीटिंग में पूरा फोकस टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के री-अपॉइंटमेंट पर और आरबीआई के नए नियमों पर चर्चा के लिए होना चाहिए था. लेकिन इस दौरान मामला गरमा गया. इस मीटिंग के दौरान चंद्रशेखरन के एक्सटेंशन पर मतभेद खुलकर सामने आ गए. बाद में नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन बनाने के फैसले पर ही सवाल उठा दिये.
टाटा संस के अंदर चल रही खींचतान के पीछे बड़ा कारण आरबीआई के नियम भी हैं. आरबीआई ने टाटा संस को 'अपर लेयर' कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में कैटेगराज किया हुआ है. आरबीआई के नियम के अनुसार इस कैटेगी में आने वाली कंपनियों को शेयर मार्केट में लिस्ट होना जरूरी होता है. टाटा संस ने आरबीआई से यह भी अपील की कि उन्हें रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की मंजूरी दी जाए ताकि उन्हें शेयर बाजार में लिस्ट नहीं होना पड़े. लेकिन आरबीआई ने साफ इंकार कर दिया. इसके बाद नोएल टाटा ने पब्लिक लिस्टिंग से बचने के लिए टाटा संस को दो बड़ी सब्सिडियरी कंपनियों में मर्ज करने का प्रपोजल दिया. इस पर भी आरबीआई गवर्नर ने सहमति नहीं जताई और कहा कि लिस्टिंग से जुड़े नियमों का पालन करना ही होगा.