शून्य से शिखर तक...कैसे एक गुजराती किसान ने अमेरिका में खड़ा किया मोटेल साम्राज्य! पूरी अनसुनी दास्तान
गुजरात के एक साधारण किसान कांजीभाई मंचू देसाई ने प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़कर अमेरिका में अपनी कड़ी मेहनत के दम पर मोटेल साम्राज्य की नींव रखी और कई भारतीय प्रवासियों को आगे बढ़ने में मदद की.
'लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती' प्रसिद्ध कवि सोहनलाल द्विवेदी की ये पक्तियां कांजी मांचू देसाई पर बिलकुल सटीक बैठती हैं. उनकी गरीबी के अंधेरे को चीरकर अपनी मेहनत के दम पर सफलता के शिखर को छूने की दास्तानें हमेशा से दिलों को झकझोर देती हैं. एक साधारण गुजराती किसान की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसने अपनी जेब में चंद पैसे और आंखों में बड़े-बड़े सपने लिए अमेरिका की सरजमीं पर कदम रखा था.
गुजरात के एक किसान, जो बहुत कम पैसे लेकर अमेरिका गए थे. उन्होंने आगे चलकर एक ऐसा मोटेल साम्राज्य खड़ा किया जिसने वहां के हॉस्पिटैलिटी (आतिथ्य) उद्योग को ही बदल दिया. उनका नाम कांजीभाई मंचू देसाई था और उनके सफर की शुरुआत कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो में 32 कमरों वाले एक छोटे से होटल से हुई है.
देसाई गुजरात के सूरत जिले के दिगास गांव से थे. अमेरिका पहुंचने से पहले वे त्रिनिदाद गए थे. अमेरिका में उन्होंने शुरुआत में कैलिफोर्निया के खेतों में एक मजदूर के तौर पर काम किया. उस दौर में जब भारतीय प्रवासियों के लिए मौके बहुत सीमित थे, तब होटल व्यवसाय में उनके कदम रखने से गुजरात के कई अन्य लोगों के लिए भी रास्ते खुल गए.
कांजीभाई मंचू देसाई होटल व्यवसाय में कैसे आए?
देसाई के लिए बड़ा मौका 1942 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आया. उन्होंने और उनके साथ काम करने वाले दो अन्य गुजराती मजदूरों, नानालाल पटेल और डी. लाल ने मिलकर सैक्रामेंटो में 32 कमरों वाला 'फोर्ड होटल' ले लिया. इस सौदे के लिए 350 डॉलर का शुरुआती भुगतान और 75 डॉलर का मासिक किराया तय हुआ था.
'फाइनेंशियल एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, देसाई ने 15 अक्टूबर 1942 को इस होटल का काम संभाला. देसाई का योगदान सिर्फ एक होटल चलाने तक ही सीमित नहीं था. उन्होंने गुजरात से आए अन्य प्रवासियों को रहने की जगह दिलाने, हॉस्पिटैलिटी का काम सिखाने और अमेरिका में खुद को स्थापित करने में मदद की.
1947 में वे सैन फ्रांसिस्को चले गए और 'होटल गोल्डफील्ड' को लीज पर ले लिया. ये जगह गुजरात से आने वाले उन लोगों के लिए (जो काम या व्यापार के मौके तलाश रहे थे) एक अहम मिलने वाली जगह बन गई.
देसाई ने उनमें से कई लोगों को रहने की जगह, खाना और व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया. उन्होंने उन्हें काम करने, पैसे बचाने और आगे चलकर खुद के होटल लीज पर लेने के लिए प्रोत्साहित किया. जो लोग बहुत कम संसाधनों और न के बराबर जान-पहचान के साथ अमेरिका आए थे, उनके लिए ये मदद बहुत मायने रखती थी.
उनकी सोच एक बहुत ही सरल विचार
जो लोग इस व्यवसाय को समझते हैं. वे दूसरों को भी इसमें आने में मदद कर सकते हैं. उन्होंने अपना ज्ञान अपने तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रॉपर्टी मैनेज करने, ग्राहकों से निपटने और होटल चलाने के बारे में जो कुछ भी सीखा था. उसे दूसरों के साथ साझा किया. होटल इतिहासकार महेंद्र के. दोषी द्वारा संकलित लेखों के मुताबिक, देसाई ने 1940 और 1950 के दशक के दौरान दो दर्जन से अधिक गुजराती उद्यमियों को होटल व्यापार में प्रवेश करने में मदद की. रिपोर्ट में कहा गया है कि उनके प्रयासों ने समुदाय के नेतृत्व वाले व्यापार नेटवर्क के लिए आधार तैयार किया जो अगले दशकों में विकसित होगा.
कांजी मांचू देसाई का क्या हुआ?
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, देसाई को संयुक्त राज्य अमेरिका से निर्वासित कर दिया गया और 1965 में लंदन में उनकी मृत्यु हो गई. खेतिहर मजदूरी से लेकर 32 कमरों वाले होटल का प्रबंधन करने तक की उनकी यात्रा अमेरिका में भारतीय प्रवासियों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बनी हुई है.