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Fuel Crisis Relief: अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग से दुनियाभर में तनाव बना हुआ है. इसका असर ग्लोबल मार्केट में डीजल और कच्चे तेल की कीमत में तेजी के रूप में देखा जा रहा है. डीजल और क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमत के बीच G7 देशों एक अहम फैसला लिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति की तरफ से कड़ा रुख अख्तियार किये जाने के बाद दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों के ग्रुप G7 ने अपने इमरजेंसी रिजर्व से 10 करोड़ बैरल डीजल और क्रूड ऑयल जारी करने का ऐलान किया है. इसके अलावा G7 देशों ने यह भी कहा कि वे आपस में एनर्जी एक्सपोर्ट पर किसी भी तरह का बैन नहीं लगाएंगे. इस फैसले का मकसद ग्लोबल लेवल पर एनर्जी क्राइसिस को कम करना और आम ग्राहकों को महंगाई से राहत देना है.
इस पूरे मामले के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक रुख माना जा रहा है. ट्रंप प्रशासन पिछले कुछ हफ्तों से यूरोपीय यूनियन (EU) पर इमरजेंसी डीजल स्टॉक यूज करने का लगातार दबाव बना रहा था. अमेरिका ने चेतावनी दी थी कि यदि यूरोप अपना इमरजेंसी स्टॉक रिलीज नहीं करता तो अमेरिका से यूरोप को होने वाले डीजल एक्सपोर्ट पर पूरी तरह से बैन लगाई जा सकती है.
दरअसल, यूरोप पिछले कुछ समय से अमेरिकी डीजल पर काफी निर्भर हो गया है. ऐसे में यदि अमेरिका ने बैन लगा दिया तो यूरोप में डीजल की किल्लत हो जाती. इस दौरान फ्रांस ने प्रस्ताव रखा था कि यूरोपीय देश 50 मिलियन बैरल डीजल जारी करें और IEA सदस्य इतना ही क्रूड ऑयल रिलीज करें. 50 मिलियन बैरल डीजल यूरोप के कुल इमरजेंसी स्टॉक का करीब 17% और सालाना खपत का 3% है. बाद में G7 देश इस पर सहमत हो गए. इसके बाद ट्रंप ने भी एक्सपोर्ट बैन का विचार पूरी तरह खारिज कर दिया.
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के जरिये 100 मिलियन बैरल तेल जारी किया जाएगा. G7 देशों की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि यह प्रोसेस तुरंत शुरू होगा और अगले चार महीने तक चलेगा. इसमें राहत की बात यह है कि अगले 20 दिन के अंदर ही डीजल की बहुत बड़ी मात्रा बाजार में मुहैया करा दी जाएगी. इससे पहले भी मार्च में ईरान जंग के कारण उपजे संकट के दौरान 400 मिलियन बैरल का इमरजेंसी स्टॉक रिलीज किया गया था.
आईईए चीफ फतिह बिरोल के अनुसार उस 400 मिलियन बैरल में से करीब दो-तिहाई हिस्सा पहले ही उपयोग किया जा चुका है. ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पोस्ट में भी लिखा कि यूरोप अपने डीजल स्टॉक से एक बड़ा हिस्सा जारी करने पर सहमत हो गया है और यह प्रोसेस तुरंत शुरू हो रहा है. डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से अचानक उठाए गए सख्त कदम के पीछे अमेरिका की अंदरूनी राजनीति को भी कारण माना जा रहा है. अमेरिका में नवंबर में मिडटर्म इलेक्शन होना है. हाल ही में आंकड़ों में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 32 प्रतिशत पर आ गई है, जो उनके करियर का सबसे निचला लेवल है.
अमेरिकी जनता महंगाई और कॉस्ट ऑफ लिविंग से बेहद परेशान है. सर्वे के अनुसार 17 प्रतिशत अमेरिकी ही महंगाई से निपटने के ट्रंप के तरीकों से संतुष्ट दिखे. ऐसे में चुनाव से पहले फ्यूल और डीजल के दाम को नीचे लाना ट्रंप प्रशासन के लिए जरूरी हो गया था. अमेरिका में एग्रीकल्चर और ट्रक ट्रांसपोर्टेशन जैसे अहम सेक्टर पूरी तरह से डीजल पर निर्भर हैं. यदि डीजल की कीमतें बढ़ती हैं तो खाने-पीने की चीजों से लेकर तमाम जरूरी सामान महंगे हो जाएंगे. महंगाई पर लगाम लगाने के लिए अमेरिकी सरकार की तरफ से हर संभव कदम उठाया जा रहा है.
G7 देशों की तरफ से लिये गए फैसला का असर इंटरनेशनल फ्यूल मार्केट पर तेज गिरावट के रूप में देखा गया. अमेरिकी डीजल फ्यूचर्स में 3.25 प्रतिशत की गिरावट आई है. दूसरी ओर यूरोपीय डीजल फ्यूचर्स में करीब 83 डॉलर प्रति मीट्रिक टन की गिरावट देखी गई. एनर्जी एक्सपर्ट्स का मानना है कि G7 का यह बयान अहम राजनीतिक कदम है. इसका मकसद अमेरिका को डीजल एक्सपोर्ट बैन लगाने से रोकना था. इस फैसले के बाद ग्लोबल ऑयल मार्केट में छाई अनिश्चितता खत्म हो गई है. इसका असर यह हुआ कि ब्रेंट क्रूड गिरकर 102 डॉलर प्रति बैरल पर और WTI क्रूड करीब 2 डॉलर प्रति बैरल की गिरावट के साथ 91.11 डॉलर प्रति बैरल पर देखा गया.