Gold Reserve: सोने को हर देश अपनी ताकत के तौर पर देखता है. वैश्विक उथल-पुथल के बीच सोना देश की अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन का काम करता है. आज-कल ये सोना फिर से चर्चा में है. इसबार चर्चा उसकी कीमत या केंद्रीय बैंकों की ताबड़तोड़ खरीदारी को लेकर नहीं हो रही, बल्कि अमेरिका से अपना-अपना सोना निकालने की होड़ को लेकर हो रही है. बीते साल फ्रांस ने अमेरिका के न्यूयार्क वॉल्ट में रखा अपना 127 टन सोना निकाल लिया. अब नीदरलैंड ने भी अमेरिका को झटका दिया है. नीदरलैंड्स ने अमेरिका में रखा अपना 86 टन सोना दूसरे देश में शिफ्ट कर दिया है.
नीदरलैंड्स ने अमेरिका से निकाला अपना सोना
नीदरलैंड्स के केंद्रीय बैंक 'डच सेंट्रल बैंक' (DNB) ने अमेरिका और कनाडा में रखा अपना करीब 86 टन सोना वहां से निकालकर लंदन शिफ्ट कर दिया है. कहा जा रहा है कि बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन को देखते हुए डच बैंक ने ये फैसला लिया है, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और बयां करती है. जिस अमेरिका की पहचान दुनिया के सुपरपावर और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर होती है, उसकी छवि में सेंध लगती दिख रही है. फ्रांस और नीदरलैंड के इस कदम ने अमेरिका की आर्थिक क्षमता पर भरोसे को घटा दिया है. नीदरलैंड्स ने अमेरिका के बजाए लंदन पर भरोसा दिखाया है. नीदरलैंड्स के गोल्ड रिजर्व का 25% हिस्सा अब बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास है.
अमेरिका से अपना सोना क्यों निकाल रहे हैं अलग-अलग देश?
नीदरलैंड के केंद्रीय बैंक का कहना है कि अमेरिका में रखे सोने का जल्द इस्तेमाल करना मुश्किल है. अमेरिका के बजाए ब्रिटेन के Bank of England के पास रखा सोना इस्तेमाल करना आसान है. बैंक ऑफ लदंन में रखे सोने को ट्रेडेबल गोल्ड की पहचान मिलती है. भले ही नीदरलैंड ये दावा कर रहा हो कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और इमरजेंसी में सोने के आसान इस्तेमाल की वजह से उसने फैसला लिया है, लेकिन अंदर की कहानी कुछ और है.

अमेरिका के बजाय लंदन पर यूरोप का भरोसा क्यों बढ़ रहा है?
साल 2025 के आंकड़ों के मुताबिक नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 मीट्रिक टन सोना था. कुल रिजर्व का 31.3% सोना न्यूयॉर्क में जमा था. नवंबर 2014 में डच सेंट्रल बैंक ने न्यूयॉर्क से 122.5 टन सोना वापस एम्स्टर्डम मंगाया था. अब साल 2026 में उसने 86 टन सोना न्यूयार्क से लंदन ट्रांसफर कर दिया है. न्यूयार्क में अब नीदरलैंड्स के गोल्ड का मात्र 18.5% ही रह गया है. जबकि लगभग 30.8 फीसदी सोना नीदरलैंड के जीस्ट में बने सेंट्रल बैंक के कैश सेंटर में रखा है. जबकि लंदन में नीदरलैंड्स के सोने का रिजर्व 18.1 फीसदी से बढ़कर 32.1 फीसदी पर पहुंच गया है. बता दें कि जियोग्राफिकल डायवर्सिफिकेशन करते हुए देश छोटे-छोटे टुकड़ों में अपना गोल्ड रिजर्व करते हैं. डच बैंक के मुताबिक बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा सोना दुनिया के सबसे ज्यादा ट्रेड होने वाले गोल्ड मार्केट तक तेजी और आसानी से पहुंचा है, इसलिए लंदन गोल्ड मार्केट की पहली पसंद बन रहा है. लंदन दुनिया का सबसे बड़ा गोल्ड मार्केट है, जहां सोने की खरीद-बिक्री तेजी से होती है.
क्या अमेरिका पर यूरोपीय देशों का भरोसा कम हो रहा है ?
डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच अंदरूनी खींचतान बढ़ गई है. जिस अमेरिका को दशकों तक यूरोप ने सुरक्षा कवच माना और अपना रणनीतिक गारंटर माना.अब वो उसके खिलाफ है. ग्रीनलैंड पर ट्रंप की लालच ने यूरोप और अमेरिका की दूरी बढ़ा दी है.ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति के साथ-साथ ‘अमेरिका फर्स्ट’ के एजेंडा ने दोनों के बीच के भरोसे को कम कर दिया है. ट्रंप के आने के बाद से यूरोपीय देश अमेरिका पर भरोसा खो रहे हैं. वहीं जिस तरह से ईरान युद्ध में ट्रंप की रणनीति दिख रही है, यूरोप अमेरिका से दूरी बनाने लगा है. ईरान जंग ने व्यापारिक अनिश्चितता को बढ़ा दिया है. अमेरिका के जिद ने पूरे विश्व को आर्थिक संकट के सामने खड़ा कर दिया है. होर्मुज की नाकेबंदी के चलते यूरोपीय देशों को तेल और गैस संकट का सामना करना पड़ रहा है. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जोखिम बढ़ गया है और आयात का खर्च लगातार बढ़ रहा है. यूरोपीय देशों को इस बात का डर सता रहा है कि भविष्य में किसी राजनीतिक मतभेद के कारण अमेरिका में जमा उनकी संपत्तियां ट्रंप कभी भी फ्रीज कर सकते हैं. ऐसे में वो अमेरिका से अपना पैसा, सोना निकाल रहे हैं.
देश अपना सोना विदेश में क्यों रखते हैं?
वैश्विक बुलियन मार्केट तक आसान पहुंच, ग्लोबल ट्रेड में लेने-देन की सरलता, विषम परिस्थितियों में सोने की सुरक्षा जैसे कई कारण हैं, जिसकी वजह से कई देशों में सोना रखा जाता है. युद्ध या हमले की स्थिति में विदेशों में रखा सोना सुरक्षित रहता है. प्रकृतिक आपदा के दौरान भी वो सोना सेफ रहता है.

अमेरिका से शुरू हुई सोना जमा करने की कहानी
अक्सर ये सवाल उठता है कि आखिर ये देश अपने यहां सोना रखने के बजाए विदेशों में क्यों रखते हैं? क्या उसके पास सोना रखने की जगह नहीं है ? क्या अपने देश में उनका सोना सुरक्षित नहीं है ? विदेशों में सोना रखने की परंपरा द्वितीय विश्व युद्ध से शुरू हुई थी. 1950 से ही जर्मनी समेत दर्जनों यूरोपीय देशों ने अमेरिका के पास अपना सोना जमा करना शुरू कर दिया था.अमेरिका -यूरोप के बीच बड़ा व्यापार होता था.यूरोप से अमेरिका को निर्यात होता था, जिसका भुगतान सोना और डॉलर में होता था.सोना को जहाजों से लाना आसान नहीं था.खर्चा और सुरक्षा दोनों चिंताजनक थे, ऐसे में यूरोपीय देशों को अमेरिका के तरफ से ऑफर मिला कि वो अमेरिकी रिजर्व वॉल्ट में अपना सोना सुरक्षित रखें. उस वॉल्ट के इस्तेमाल पर उन्हें कोई शुल्क भी नहीं देना पड़ता था.अमेरिका के इसके साथ ही ब्रेटन वुड्स सिस्टम तैयार कर दिया, जहां डॉलर को गोल्ड के साथ जोड़ दिया गया. इस तरह से धीरे-धीरे यूरोपीय देशों का सोना अमेरिका के रिजर्व वॉल्ट में पहुंचने लगे.
Gold आखिर रखा कहां जाता है?
सोने को हाई सिक्योरिटी वाली तिजोरी में रखा जाता है. दुनिया की सबसे बड़ी तिजोरी न्यूयार्क में है. फेडरल रिजर्व के इस गोल्ड वॉल्ट में 4 लाख 97 गोल्ड बार रखे हैं. इस तिजोरी में अमेरिकी सरकार के साथ-साथ विदेशों का करीब 6190 टन सोना रखा है. मैनहटन में जमीन के 80 फीट नीचे बने इस गोल्ड वॉल्ट को 1920 में तैयार किया गया था. अमेरिका के वॉल्ट में जर्मनी, इटली, नीदरलैंड्स , बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, लेबनान यहां तक कि आईएमएफ (IMF) जैसे संगठनों का सोना रखा है.
भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का गुप्त और उच्च सुरक्षा वाले वॉल्ट में सरकारी सोने को सुरक्षित रखा जाता है. मुंबई के मिंट रोड स्थित आरबीआई भवन, नागपुर में स्थित तिजोरियों में देश का सोना सुरक्षित रखा जाता है.लंदन के गोल्ड वॉल्ट में 60 से अधिक देशों का सोना सुरक्षित रखा है. जिसकी कीमत 250 अरब डॉलर से अधिक की है.
दूसरे देश में रखा सोना असल में किसका होता है? उसका मालिकाना हक किसके पास रहता है?
दूसरे देश में रखा गया सोना पूरी तरह से उसी देश का होता है जो उसका असली मालिक है. यानी नीदरलैंड का सोना चाहे अमेरिका में हो या लंदन में , सोने का मालिकाना हक नीदरलैंड का ही है. उसकी ownership (स्वामित्व) उसी देश के केंद्रीय बैंक की होती है. जिस बैंक के वॉल्ट में वो सोना जमा है, वो कस्टोडियन (संरक्षक) होता है. सोने को अपने वॉल्ट में सुरक्षित रखने के बदले ये बैंक सोना रखने वाले देशों से Custodial फीस वसूलते हैं.
क्या कोई देश जब चाहे अपना सोना वापस मंगा सकता है? इसके लिए क्या प्रक्रिया होती है?
ऐसा नहीं है कि जब चाहा, जिस देश के वॉल्ट में सोना जमा कर लिया, जब चाहा निकाल लिया. इसके लिए नियम, कानून, एग्रीमेंट तय है. सोना जमा करने या निकालने के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय नियम तय नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच समझौते पर निर्भर करता है. जैसे अगर RBI को बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास अपना सोना जमा करना है, तो टर्म और कंडीशन इन दोनों के बीच तय होता. दोनों देशों के बैंकों के बीच Bilateral Custodial Agreements के आधार पर सोना निकाला जा सकता है. सोना वापस निकालने से पहले केंद्रीय बैंक के गवर्निंग बोर्ड की औपचारिक मंजूरी लेनी पड़ती है. सोना भेजने लाने से पहले उसे कड़ी जांच से गुजरना पड़ता है. ये तय किया जाता है कि सोने की मात्रा और शुद्धता के साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया गया हो.
अगर अमेरिका नहीं, तो फिर कहां अपना सोना रखेंगे यूरोप के देश ?
अगर यूरोपीय देश अमेरिका से अपना सोना निकाल रहे हैं, तो अगला सवाल ये है कि आखिर वो अपना सोना कहां रखेंगे. उनके पास कई विकल्प हैं. वो अपना सोना अपने देश की तिजोरी में रख सकते हैं. अमेरिका के अलावा दूसरा विकल्प यूनाइडेट किंगडम का बैंक ऑफ लंदन है. इसके अलावा स्विट्जरलैंड और फ्रांस जैसे देश भी कुछ हद तक दूसरे देशों के स्वर्ण भंडार को सुरक्षित रखने की सेवा देते हैं.